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जीवन को विशेष प्रसन्न बनाने का सूत्र है समता
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आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) पुणे शहर की ओर अग्रसर हैं। बुधवार प्रातः आचार्यश्री ने गोणवाड़ी ग्राम से प्रस्थान किया। लगभग 11 किमी विहार कर वे शेरे गांव के मामासाहेब मोहोल विद्यालय पहुंचे। यहाँ उपस्थित विद्यार्थियों व जनता को पावन पाथेय प्रदान करते हुए उन्होंने कहा कि अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियां जीवन में आ सकती हैं। उन परिस्थितियों में भी आदमी को समता रखने का प्रयास करना चाहिए। कभी लाभ हो जाए, कभी अलाभ रह जाए, कभी निंदा हो अथवा कभी खूब प्रशंसा भी प्राप्त हो जाए। ऐसे में ज्यादा लाभ हो जाए तो

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पुणे। आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) पुणे शहर की ओर अग्रसर हैं। बुधवार प्रातः आचार्यश्री ने गोणवाड़ी ग्राम से प्रस्थान किया। लगभग 11 किमी विहार कर वे शेरे गांव के मामासाहेब मोहोल विद्यालय पहुंचे।
यहाँ उपस्थित विद्यार्थियों व जनता को पावन पाथेय प्रदान करते हुए उन्होंने कहा कि अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियां जीवन में आ सकती हैं। उन परिस्थितियों में भी आदमी को समता रखने का प्रयास करना चाहिए। कभी लाभ हो जाए, कभी अलाभ रह जाए, कभी निंदा हो अथवा कभी खूब प्रशंसा भी प्राप्त हो जाए। ऐसे में ज्यादा लाभ हो जाए तो ज्यादा खुशी नहीं और अलाभ भी प्राप्त हो जाए तो आदमी को ज्यादा निराश नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार कभी खूब सुख मिल गया तो ज्यादा खुशी नहीं मनाना चाहिए और कभी जीवन में दुःख भी आ जाए तो दुःखी भी नहीं बनना चाहिए। आदमी को दोनों ही परिस्थितियों में समभाव में रहने का प्रयास करना चाहिए। यहां तक जीवन में कभी मृत्यु निकट भी दिखाई दे तो भी आदमी को शांति में रखने का प्रयास करना चाहिए। कभी आदमी की प्रशंसा हो, कभी खूब सम्मान की प्राप्ति हो तो भी आदमी अपने मन में शांति रखे और कभी अपमान की परिस्थिति में शांति में रहने का प्रयास करना चाहिए। समता की साधना जीवन को विशेष प्रसन्न बनाने का सूत्र है। रामचन्द्रजी की जीवन से प्रेरणा लें कि उनके जीवन में वनवास की स्थिति भी आई और राजा बनने की स्थिति भी आई, वे कैसे दोनों परिस्थितियों में समता भाव में रहे।

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