mumbai high court
मुंबई। कस्टम अधिकारियों (customs officers) के विरोध को दरकिनार करते हुये मुंबई उच्च न्यायालय (Mumbai High Court) ने जवेरी बाजार (Zaveri Bazaar) के तीन बुलियन कारोबारियों के बैंक खातों की प्रोविजन जब्ती को हटा दिया। अदालत (court) ने माना कि कस्टम एक्ट (custom act) के तहत प्रक्रिया के अनुसार उनके खातों की जब्ती की कार्यवाही गैरकानूनी और विसंगत है।
अदालत के मुताबिक, अनुमान या संभावना के आधार पर इस तरह से जब्ती कानून में निहित आवश्यकताओं की पूर्ति के अनुपालन में ही होनी चाहिये। इसकी आड़ में महज संभावना के नाम पर मनमाने तरीके से जब्ती कार्यवाही को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इससे पीड़ित व्यक्ति और उनके कानूनी व्यवसाय कार्य निरंकुश शक्ति के अधीन हो जायेगी। उच्च न्यायालय के जस्टिस गिरीश कुलकर्णी और फिरदोश पूनीवाला ने बुधवार को अपने आदेश में स्पष्ट एवं कठोर शब्दों में इस तरह की कार्यवाही पर अपना एतराज जताया है।
कस्टम आयुक्त (प्रतिबंधात्मक) कार्यालय, जोधपुर (Jodhapur) ने जनवरी में चोकशी अरविंद ज्वेलर्स, पल्लव गोल्ड और मैक्सिस बुलियन के मुंबई में उनके बैंक खातों को जब्त् करने का आदेश दिया था। कस्टम अधिकारी भारत में गोल्ड स्मगलिंग के मामले में जांच कर रहे थे और उन्होंने इस मामले में इस आदेश के बाद जूलरी कारोबारियों के कारोबारी परिसरों में छापेमारी भी की थी। चोकशी अरविंद ज्वेलर्स, पल्लव गोल्ड और मैक्सिस बुलियन ने इस आदेश के विरुद्ध मुंबई उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता ने इस आदेश को निरस्त करने और प्रोविजनल जब्ती को हटाने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता बुलियन कारोबारियों की ओर से उनके वकील सुजय कांटावाला ने उच्च न्यायालय में पक्ष प्रस्तुत करते हुये कस्टम विभाग की इस कार्रवाई को गैरकानूनी बताया था। कांटावाला के मुताबिक, इस तरह की प्रोविजनल जब्ती कार्यवाही के लिये लिखित आदेश होना आवश्यक है। जबकि अधिकारियों ने मौखिक तौर पर बैंक को पीड़ितों के बैंक खाते जब्त करने के निर्देश दिये थे।
उधर कस्टम विभाग की ओर से वकील जीतेंद्र मिश्र ने अपने जवाब में दलील दी थी कि इस तरह से लिखित आदेश की कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं है। बैंक को जारी पत्र को आदेश माना जा सकता है। साथ ही, खाताधारक को इसकी सूचना देना भी आवश्यक नहीं है।
अदालत ने दोनों तरफ की दलीलें सुनने के बाद अपने फैसले में कानूनी प्रावधानों की इस तरह से व्याख्या को असंगत करार देते हुये इसे याचिकाकर्ता को उनके कानूनी बचाव के अधिकार से वंचित किया जाना माना था।
अदालत ने साफ कर दिया कि इस तरह की कार्यवाही के लिये प्रत्यक्ष तथा ठोस कानूनी आधार होना चाहिये जिसके लिये समुचित साक्ष्य होना आवश्यक है और इसे लिखित में दर्ज किया जाना भी आवश्यक है जिससे कि इस तरह की प्रतिबंधात्मक प्रोविजनल जब्ती कार्यवाही की वैधता और आवश्यकता स्पष्ट हो। इसके साथ यह भी आवश्यक है कि इस तरह के प्रभावी अधिकार का प्रयोग करते समय खाताधारक को भी इसकी जानकारी दी जानी चाहिये। अदालत ने कस्टम विभाग के जब्ती आदेश को रद्द कर दिया और बैंक को निर्देश दिये कि वे खाताधारकों को उनके खाते संचालित करने दें। अदालत ने कहा है कि कस्टम विभाग कानूनी प्रावधानों और प्रक्रिया का पूर्णत: अनुपालन करते हुये बैंक खाते प्रोविजनल तौर पर जब्त करने की अपनी कार्यवाही कर सकता है।
Editorial

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