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राजनीति के अपराधीकरण की बीमारी
By EditorialPublished on
ममता सरकार (Mamata Government) शाहजहां शेख के प्रति हद से ज्यादा नरमी बरत रही थी, इसका पता तब भी चला, जब कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश (high court orders) के बाद भी उसे सीबीआई (CBI) के हवाले करने से मना किया गया।

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संजय गुप्त : पश्चिम बंगाल (West Bengal) के संदेशखाली (Sandeshkhali) इलाके ने करीब दो माह पहले देश का ध्यान तब अपनी ओर खींचा था, जब राशन घोटाले (ration scam) के आरोपित और तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) के बाहुबली नेता शाहजहां शेख (Shahjahan Sheikh) के गुंडों ने प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) यानी ईडी (ED) की टीम पर हमला किया था। इस हमले में ईडी के कई अधिकारी घायल हो गए थे और उनके साथ गए सुरक्षाकर्मियों को भी जान बचाने के लाले पड़ गए थे। ईडी ने इसकी शिकायत कलकत्ता उच्च न्यायालय में की, क्योंकि पुलिस शाहजहां शेख को गिरफ्तार करने में शिथिलता दिखा रही थी। ममता सरकार ने उसकी गिरफ्तारी में दिलचस्पी लेने के बजाय यह दलील दी कि उच्च न्यायालय ने ही उसे गिरफ्तार करने पर रोक लगा रखी है। इस बीच शाहजहां शेख के फरार हो जाने से संदेशखाली में उसके सताए हुए लोग, विशेषकर महिलाएं, उसके खिलाफ खुलकर सामने आईं। आखिरकार उच्च न्यायालय की फटकार के बाद दो दिन के भीतर उसे गिरफ्तार किया गया। इससे यह संकेत मिला कि बंगाल पुलिस उसे जानबूझकर गिरफ्तार नहीं कर रही थी।
ममता सरकार (Mamata Government) की नरमी का अंदाजा तब भी लगा, जब कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश (High Court Orders) के बावजूद शाहजहां शेख को सीबीआई (CBI) के हवाले करने से इनकार कर दिया गया। इसके लिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का दरवाजा खटखटाया, लेकिन याचिका पर तुरंत सुनवाई से इनकार कर दिया गया। इसके बाद भी बंगाल पुलिस (Bengal Police) उसे सीबीआई को सौंपने को तैयार नहीं हुई। आखिरकार उच्च न्यायालय के कड़े निर्देश के बाद ही उसे सीबीआई के हवाले किया गया। न्यायालय को सख्ती इसलिए बरतनी पड़ी, क्योंकि सरकार के रवैये से ईडी पर हमले और महिलाओं के यौन उत्पीड़न की निष्पक्ष जांच के आसार नहीं दिख रहे थे।
यह पहली बार नहीं है जब बंगाल सरकार ने अपने किसी बाहुबली नेता को बचाने का प्रयास किया हो। तृणमूल कांग्रेस के कई नेता घोटालों और हिंसा भड़काने के गंभीर आरोपों से घिरे रहे हैं। इनमें वे नेता भी शामिल हैं, जो मंत्री पदों पर रह चुके हैं, जैसे राशन घोटाला और शिक्षा भर्ती घोटाला। विधानसभा चुनावों के बाद हुई हिंसा के मामलों में भी सरकार ने अपने कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई से परहेज किया। एक ओर सरकार भ्रष्ट और आपराधिक प्रवृत्ति वाले नेताओं पर कार्रवाई नहीं करती, और दूसरी ओर केंद्रीय एजेंसियों पर दुरुपयोग का आरोप लगाती है।
तृणमूल कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल केंद्र सरकार पर सीबीआई और ईडी के राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप लगाते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि न्यायपालिका इन नेताओं को राहत क्यों नहीं देती। अपराधी प्रवृत्ति के नेताओं को राजनीति का संरक्षण मिलना एक सच्चाई है। यही कारण है कि संसद और विधानसभाओं में गंभीर आरोपों वाले नेताओं की संख्या घट नहीं रही। हालांकि एमपी-एमएलए अदालतों द्वारा ऐसे नेताओं को सजा देने का सिलसिला जारी है, फिर भी मामलों के लंबे निपटारे के कारण अपराधीकरण पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही।
दागी नेताओं के खिलाफ समय पर कार्रवाई न होना एक गंभीर समस्या है। हर राजनीतिक दल सार्वजनिक रूप से ऐसे नेताओं से दूरी बनाने की बात करता है, लेकिन चुनावों में उनकी जीतने की क्षमता देखकर टिकट भी देता है। शाहजहां शेख का मामला दिखाता है कि किस तरह पुलिस सब कुछ जानते हुए भी कार्रवाई से बचती है। कई मामलों में बंगाल पुलिस तृणमूल कांग्रेस की शाखा की तरह काम करती दिखाई दी है। इस स्थिति में सुधार के लिए न्यायपालिका को और अधिक सतर्क होकर दागी नेताओं के मामलों का प्राथमिकता के आधार पर निपटारा सुनिश्चित करना होगा।

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