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मनीष पालीवाल मुंबई। इंडिया गेट (India Gate) से लगाकर विरार और ठाणे से लेकर सीएसटी (CST) तक मुंबई (Mumbai) के तमाम आलीशान इलाकों और सामान्य उपनगरों में सड़क की टपरी व दुकान में बिकने वाली कडक मीठी चाय बेचने के व्यापार में मेवाड़-वागड़ के प्रवासी व्यापारियों का दबदबा पिछले 110 वर्ष से है। लेकिन पिछले 5 साल से मुंबई में चाय (strong sweet tea) इंडस्ट्री ने हाईटेक तरीका अख्तियार किया है और जगह-जगह अलग-अलग ब्रांड की चाय की दुकानें किसी शोरूम के माफिक खुलनी शुरू हुई हैं। ग्राहकों का रुझान इन दुकानों की ओर तेजी से बढ़ा है। साफ-सफाई वाली इन चाय की दुकानों पर अलग-अलग फ्लेवर की चाय-कॉफ़ी उपलब्ध है जिसके चलते युवा पीढ़ी खिंची चली आ रही है। लेकिन समय के साथ इस बदलाव ने राजस्थान के मेवाड़ वागड़ के चाय बेचने वाले व्यापारियों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। जबसे मुंबई में चाय के शोरूम खुलने शुरू हुए हैं, उनके व्यापार में गिरावट दर्ज की गई है, जिससे वे अपने भविष्य के लिए सोचने को मज़बूर हो गए हैं।
पेश है व्यापार के इन्हीं उतार चढ़ावों पर मनीष पालीवाल की एक रिपोर्ट :
मुंबई में बिकने वाली कड़क मीठी चाय के व्यापार में सबसे ज्यादा लोग राजस्थान के वागड़ क्षेत्र के बांसवाड़ा (Banswara) और डूंगरपुर (Dungarpur) जिले के हैं। अनुमानों के अनुसार अकेले डूंगरपुर जिले के हज़ारों लोग चाय बेचने का व्यापार कर रहे हैं। जिले के लोग ज्यादातर सड़क किनारे या बिल्डिंग के खोपचे (छोटी जगह) पर थडी या टपरी बांधकर व्यापार करते हैं। इनका रहना खाना उसी स्थान पर होता है। मुंबई के मिरा रोड स्टेशन के बाहर थड़ी लगाकर चाय बेचने वाले सागवाड़ा के जेठाना गांव के निवासी रमेश भाई बुनकर दावा करते हैं कि चाय के व्यवसाय में वागड़ के लोग सर्वाधिक रूप से इसलिए जुडे हैं, क्योंकि वहां उद्योग धंधों की कमी है। रमेश भाई का कहना है कि बांसवाड़ा में माही बांध बनने और पानी की बेहतर उपलब्धता से वहां से लोगों का आंशिक रूप से ज़रूर कम हुआ है, लेकिन अन्य क्षेत्रों से लोगों का आना जारी है।
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जानिए चाय की कीमत के आंकड़े-
इन टपरी व सामान्य दुकानों पर मिलने वाली चाय व अन्य पदार्थों की कीमत वर्तमान समय 2024 में निम्न है। सामान्य कटिंग चाय 6 रुपया, स्पेशल कटिंग चाय 10, स्पेशल फुल चाय 20 रुपये, दूध का उकाला फुल 20 रुपये, केशरी दूध उकाला 14 रुपये कटिंग, फुल कॉफ़ी 20 रुपयेl वहीं अगर हाल ही में शुरू हुए चाय के स्टार्टअप की दुकानों की रेट लिस्ट देखें तो उसमें 10 से लगाकर 70 रुपये तक की चाय उपलब्ध है। कॉफी 30 से लेकर 150 रुपये तक की है।
इतिहास न बन जाए भट्टजी की चाय-
वागड़ सेवा जन जागृति संस्थान के गजेन्द्र मेहता का मानना है कि पूरे मुंबई में चाय उद्योग में 80 प्रतिशत राजस्थानी समाज
(Rajasthani society)
का कब्जा है। चाय बेचने वाले को मुंबई में सामान्यतः भट्ट या भट्टजी के नाम से पुकारा जाता है। इस नाम के पीछे भी एक दास्तान हैं, हालांकि इस पर शोध होना बाकी है। प्रात:काल टीम द्वारा किए गए शोध के अनुसार 19वीं शताब्दी के प्रारंभ से मेवाड़ के वागड़ क्षेत्र से बड़ी मात्रा में लोग व्यापार की तलाश में मुंबई आए, जो मुख्य रूप से ब्राह्मण समुदाय से ताल्लुक रखते थे। इन लोगों ने शुरुआती दौर में बड़े बड़े साहूकारों के यहाँ काम धंधा शुरू किया। साथ ही कुछ गुजराती व्यापारियों की चाय की दुकान पर भी काम करने लगे। इसी दौरान उन्होंने मिलों के बाहर कारखानों के पास कड़क मीठी चाय बेचने का व्यापार शुरू किया, जिससे जन सामान्य में चायवाला भट्ट या भट्टजी के नाम से जाना जाने लगा।
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परिवर्तन कर रही है युवा पीढ़ी-
दक्षिण मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस रेलवे स्टेशन के बाहर मुख्य बाजार में स्थित है जोशी टी हाउस। इसके मालिक और चौथी पीढ़ी के प्रतिनिधि प्रवीण भट्ट बताते हैं कि उनके दादा परदादाओं द्वारा शुरू किया गया व्यापार उनके लिए एक विरासत हैं। लेकिन वर्तमान समय में जिस तरीके से चाय के व्यवसाय में लोगों का रुझान बढ़ा है, यह हमारे जैसे लोगों के लिए किसी खतरे से कम नहीं है। हमें समय के साथ बदलना होगा इसलिए मैंने अपनी दुकान के आधुनिकीकरण की ओर कदम बढ़ाया है। जल्द ही मैं इसे एक शानदार टी शोरूम में तब्दील कर दूंगा। वे बताते हैं कि मेवाड़ राजस्थान के तमाम लोगों को अतिशीघ्र ही बदलाव करना होगा, नहीं तो निकट भविष्य में बहुत तकलीफ झेलनी पड़ सकती है।
सन 1920 में वागड़ मेवाड़ की 50 दुकानें थी दक्षिण मुंबई में-
आजादी के पहले सन 1920 के आसपास मुंबई के फोर्ट इलाके सहित शेयर बाजार, काला घोडा, नरीमन पॉइंट, बोरी बंदर, बजाज गेट, बोरा बाजार, फोर्ट मार्केट, कुलाबा, किला कोर्ट, आजाद मैदान में मेवाड़ की 50 से भी ज्यादा दुकानें खुल चुकी थी, जहां वागड़ क्षेत्र के ब्राह्मण समुदाय से जुड़े भट्ट, पुरोहित, जोशी, पंडित आदि गोत्रों के लोग चाय बेचने का व्यापार करते थे। कालांतर में मुंबई के विस्तार के साथ मेवाड़ वागड़ के चाय बेचने वाले व्यापारियों ने उपनगरों में भी अपनी दुकानें शुरू की। उस दौर तक उनकी दुकानों पर ब्राह्मण समाज के ही लोग कर्मचारी हुआ करते थे, लेकिन धीरे-धीरे जब इस समुदाय के लोगों ने अन्य व्यापार शुरू किये तब दुकान मालिकों ने वागड़ के डूंगरपुर बांसवाड़ा क्षेत्र के आदिवासी अंचल के युवाओं को लाना शुरू किया, जिसमें मुख्य रूप से पटेल, कटारा, भगोरा, रोत, खाट, भारीया, सरपोटा, डेडोर, बारिया, पारकी, डामोर, मीणा, टपरी जाति के लोग मुख्य रूप से थे। कालांतर में इन्हीं जातियों के लोगों ने मुंबई के उपनगरों में छोटे छोटे स्टाल लगाकर चाय बेचने का व्यापार शुरू कर दिया और आज बड़ी मात्रा में इस व्यवसाय को कर रहे हैं जिनका आंकडा लाखों में है।
अणी माँ ने बर्बाद थई गया.. चायो नु बाकडु हालतु नी-
नालासोपारा क्षेत्रों में चाय का स्टाल लगाकर व्यापार करने वाले डूंगरपुर क्षेत्र के एक युवा को जब व्यापार के बारे में पूछा गया तो उसने दुखी मन से वागडी भाषा में जवाब दिया अणी माँ ने बर्बाद थई गया.. चायो नु बाकडु हालतु नी गामडे जाआ नु हेके वेपार कईज नी घेरे थी रुपीया लावीन या पुरु पाडवु पढें। उसके अनुसार वर्तमान में चाय बेचने का व्यापार चल नहीं रहा है। बर्बादी की हालत पैदा हो गई हैं और घर से पैसा लाकर काम चलाना पड़ रहा है और उसके ऊपर कर्ज हो गया है। युवक का कहना था कि प्रशाशन व स्थानीय गुंडों को चाय या पैसा देकर संतुष्ट रखना पड़ता है। तभी वह व्यापार कर सकता है लेकिन वर्तमान हालातों में व्यापार दिन-प्रतिदिन गिर रहा है। साथ ही दुकानों पर काम करने वाले लोग भी नहीं मिलते हैं जिसके चलते निकट भविष्य में हमारे लिए बड़ी समस्या पैदा हो सकती है।
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शंकर विलास हिंदू होटल से शुरू हुआ सफर-
चाय के व्यवसाय से जुड़े हुए एक बुजुर्ग बताते हैं कि मुंबई में सबसे पहले विधिवत रुप से दुकान खोलकर चाय बेचने का व्यापार गुजरात के भावसर बारोट ब्राह्मण समाज के लोगों ने किया था। तब इनकी दुकानों का नाम शंकर विलास हिंदू होटल नाम हुआ करता था जहां चाय व अल्पाहार मिलता था। एक जमाने में इस नाम की पूरे मुंबई में 1000 से भी ज्यादा दुकानें हुआ करती थीं। आज भी मुंबई में कहीं कहीं इस नाम की दुकानें देखी जा सकती हैं। इन्हीं शंकर विलास हिंदू होटलों पर वागड़ क्षेत्र के कुछ ब्राह्मण समुदाय के लोगों ने काम करना शुरू किया व हुनर सीखा। हालांकि एक पक्ष का यह भी कहना है कि शंकर विलास हिंदू होटल के पूर्व ही वागड़ के लोग चाय के व्यवसाय में आ चुके थे। यह तमाम बातें शोध का विषय है, लेकिन मूल बात तो यह है कि मुंबई में विधिवत रूप से चाय बेचने का व्यापार शंकर विलास हिंदू होटलों से ही शुरू हुआ था। इन होटलों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि अगर कोई चर्चगेट में चाय पी कर शंकर विलास हिंदू होटल बोरिवली में चाय पीने पहुंच जाता तो वहां पर भी उसे वैसा ही स्वाद मिलता था। इन होटलों पर एक ही स्वाद की चाय मिलती थी, जो इनकी खासियत थी। शंकर विलास हिंदू होटल इस टाइटल के पीछे तत्कालीन समय की छुआछूत प्रथा भी मुख्य थी। लोग इन होटलों को पसंद करते थे क्योंकि यहाँ शाकाहार की पूरी गारंटी थी।
राजपूत समाज के भी लोग हैं बड़ी मात्रा में-
मुंबई में चाय बेचने के कार्य में मेवाड़ के राजसमंद जिले के नाथद्वारा तहसील क्षेत्र के विभिन्न गावों के राजपूत समाज (Rajput society) के लोग भी बड़ी मात्रा में जुड़े हुए हैं। खरवड चदाणा उठड दशाणा आदी गोत्रों से संबंधित इनकी दुकानों का नाम ज्यादातर मेवाड़ टी हाउस या महाराणा प्रताप से संबंधित नामों से होता है। नाथद्वारा क्षेत्र के राजपूत बोरीवली से विरार क्षेत्र में दुकानों का संचालन बड़ी मात्रा में कर रहे हैं। इनका मानना है कि उपनगरों में भी चाय के आधुनिक हाउस बड़ी मात्रा में खुल रहे हैं जिसके चलते उनकी ग्राहकी पर असर दिख रहा है।
असंगठित है पूरा व्यवसाय-
मुंबई की चाय इंडस्ट्री पूरी तरीके से असंगठित है। कई जगह ऐसी दुकानें हैं जिनका नाम भी नहीं है और ऐसे ही व्यापार हो रहा है। इन तमाम कारणों के चलते मेवाड़ और वागड़ के चाय वालों की कोई भी ब्रांड विक्सित नहीं हो पाई है, जिसका खामियाजा व्यापारियों को भुगतना पड़ रहा है। चाय बेचने वालों का कोई संगठन भी नहीं है, जो उनके हितों पर हो रहे कुठाराघात या प्रशासनिक समस्याओं पर उनका साथ दे सके या आवाज उठा सके।
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दर्द भरी कहानी-
एक अनुमान के अनुसार मुंबई में बड़ी संख्या में लोग चाय बनाने के उद्योग से जुडे हैं। दुकानों पर काम करने वाले कई मजदूरों की दर्द भरी कहानी है। कोई स्कूल छोड़कर आया तो कोई मुंबई की चकाचौंध देखकर पहुंचा है। डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिलों सहित वागड़ के ग्रामीण इलाके के लगभग हर तीसरे घर से व्यक्ति मुंबई में चाय बनाने के काम में लगा है। वर्तमान में दुकानों पर काम करने वाले मजदूरों को अलग-अलग मजदूरी मिलती है। चाय की केतली लेकर सप्लाई करने वाले बच्चों को 5 से 8 हजार व चाय बनाने वाले कारीगर को 10 से 30 हजार तनख्वाह व खाना पीना दिया जाता है। खाने-पीने के नाम पर एक समय रोटी सब्जी व एक समय दाल भात बनाया जाता है। इन दुकानों पर काम करने वाले कुछ लोगों का कहना है कि इस व्यवसाय में ना तो हमारा भविष्य है, ना हमारे बच्चों का भविष्य है, लेकिन मजबूरी है कि इस शहर में कहां जाएं, गांव में मां बाप को क्या भेजें इसलिए मजबूरी में ये काम कर रहे हैं। वही इस मामले दूसरा पक्ष यह भी है कि जो थोड़े से समझदार होते हैं वह चाय की दुकान पर काम करने के बाद खुद का व्यवसाय शुरू कर इसी व्यवसाय में हर महीने 25 हज़ार से लेकर लाख रुपये तक भी कमा रहे हैं। चाय का व्यापार टपरी पर लगभग 15 हजार खर्च करके शुरू हो जाता है, वहीं बड़ी दुकान लेने पर उसी का खर्च डिपॉजिट आदि मिलाकर तीन से चार लाख रुपए आता है। दुकानों में मजदूरों के रुप में दामोर, नानोमा, मावथ, माल और कलासु समुदायों के पुरुष और युवा लड़के शामिल हैं, जो अक्सर दुकान मालिक के गांवों के पास रहते हैं। वागड़ के चायवाले अपने यहाँ जान पहचान वाले मजदूरों को रखते हैं, लेकिन अब राजस्थान के वागड़ इलाके में आई जन जाग्रति के चलते लोग शिक्षा की ओर मुडे हैं और स्थानीय स्तर पर ज्यादा अवसर मिल रहे हैं जिससे मजदूरों की संख्या कम होने लगी है। इन कारणों से नए सीज़न की शुरुआत से पहले आदिवासी इलाकों में स्थानीय एजेंट - ज्यादातर बुजुर्ग मजदूर - उन युवाओं को संगठित करने की जिम्मेदारी लेते हैं, जो एक निश्चित आय की तलाश में हैं और बड़े शहर में जीवन जीने की इच्छा रखते हैं। उन्हे इकठ्ठा कर मुंबई अहमदाबाद भेजा जाता है।
एक दुकान कई मालिक-
मुंबई में चाय की दुकानों पर पाली सिस्टम की अपनी गणित है। जैसे किसी व्यक्ति ने 1950 में चाय की दुकान शुरू की और अभी वर्तमान में उस के परिवार में 10 सदस्य हो गए हैं, तो उन सभी लोगों का शेयर दुकान मे रहता है। दस लोग आपस में दो अथवा तीन माह के लिए स्वतंत्र रूप से दुकान के मालिक के तौर पर दुकान का संचालन करते हैं। इस अवधि में प्राप्त होने वाली कमाई उसी की रहती है। जो लोग दुकान नहीं चलाना चाहते हैं या सरकारी-गैर सरकारी नोकरी में हैं, वे वार्षिक हिसाब में कमाई का हिस्सा लेते हैं। खास बात यह है कि इस तरह की पार्टनरशिप परिवार के सदस्यों के अलावा मासी/बुआ/मामा के लडकों के साथ भी देखी जाती है। जो परिवार संगठन में रहते हैं, उनके सदस्यों मे आपसी समझदारी के साथ यह समझौता होता है कि कुछ सदस्य खेतीबाड़ी के लिए गांव जाते हैं, तो कुछ सदस्य दुकान चलाने के लिए मुंबई आते हैं।
राजस्थानी प्रवासियों के जन-
जीवन से जुड़ा यह लेख आपको कैसा लगा, यह हमें ज़रूर बताएं। साथ ही प्रवासियों से जुड़े और किसी दिलचस्प पक्ष को आप प्रातःकाल के माध्यम से लाखों पाठकों के सामने लाना चाहते हैं तो मनीष पालीवाल को 9322940093 को फोन या व्हाट्सएप कर बता सकते हैं।
Editorial

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