jain muni
मुंबई। आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) गुरुवार को विहार कर जैसे ही पेण गांव की सीमा में पहुँचे,तो श्रद्धालुओं ने उनका स्वागत किया। आचार्यश्री पेण गांव में स्थित लिटिल एंजल्स स्कूल में पहुँचे।
विद्यालय में अपने प्रवचन में उन्होंने कहा कि जैन वाङ्मय में कषाय शब्द का प्रयोग किया गया है। गुस्सा (anger), मान (ego), माया (illusion) व लोभ (greed)- ये कषाय हैं। इन्हीं कषायों के कारण ही पाप कर्मों का बंध होता है। यदि कषाय न हों तो आदमी की आत्मा निर्मल बनी रह सकती है और मोक्ष को भी प्राप्त कर सकती है।
इन चार कषायों में पहला कषाय है- गुस्सा। परिवार हो या समाज गुस्सा कहीं काम के लायक नहीं है। गुस्सा व्यवहार की दृष्टि और आत्मा की दृष्टि से भी बुरा होता है। गुस्से में आदमी कुछ बोलने लगे, हाथ उठा ले अथवा मारने का भी प्रयास करता है तो इससे व्यवहार तो बिगड़ ही जाता है, साथ ही आत्मा का भी नुक्सान हो जाता है। गुस्सा एक वृत्ति है, जो सभी में विद्यमान होती है। किसी-किसी को तीव्र रूप में गुस्सा आता है। आदमी को धैर्य, शांति और क्षमा का भाव रखने का प्रयास करना चाहिए।
गुस्से से प्रीति का नाश, अहंकार से विनय का नाश, माया से मित्रता का नाश और लोभ से सबकुछ का नाश हो जाता है। इसलिए आदमी को जहां तक संभव हो, इन कषायों से बचने का प्रयास करना चाहिए।
Editorial

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