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अबू धाबी में हिंदू मंदिर के मायने
By EditorialPublished on
बलबीर पुंज : बिठात 14 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में स्वामीनारायण मंदिर का भव्य उद्घाटन किया। इसके बाद बहरीन ने भी स्वामीनारायण समाज को हिंदू मंदिर हेतु जमीन आवंटित कर दी।

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बलबीर पुंज : बिठात 14 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में स्वामीनारायण मंदिर का भव्य उद्घाटन किया। इसके बाद बहरीन ने भी स्वामीनारायण समाज को हिंदू मंदिर हेतु जमीन आवंटित कर दी। अबू धाबी में नवनिर्मित मंदिर, अरब प्रायद्वीप का कोई पहला मंदिर नहीं है। दुबई में 1958 से हिंदू मंदिर स्थापित है। बहरीन में भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित 200 वर्ष पुराना श्रीनाथ मंदिर, तो ओमान में सवा सौ साल पुराना मोतिन्नर मंदिर है। परंतु यूएई के मंदिर पर भारत का एक समूह, जिसमें वाम-उदारवादी भी शामिल है- अयोध्या में पुनर्निर्मित श्रीरामजन्मभूमि मंदिर का संदर्भ देकर भारत को यूएई सहित अन्य अरब देशों से बहुलतावाद-पंथनिरपेक्षता सीखने का सुझाव दे रहा है। यह अपने आप में ही विरोधाभास है कि भारत की तुलना इस्लामी देशों से की जाए।
सबसे बड़ी बात है कि यूएई सहित किसी भी अरब देश का ऐसा कोई इतिहास नहीं है, जहां भारत के किसी हिंदू-बौद्ध शासक ने जाकर उन पर हमला किया हो या उनके धर्मस्थलों को ध्वस्त किया हो या फिर जबरन उनके किसी भूखंड पर कब्जा करके अपने धर्मस्थल का निर्माण किया हो। इस पृष्ठभूमि में मध्यकालीन भारत में अरब आक्रांताओं सहित अन्य विदेशी आक्रमणकारियों का क्रूर वृत्तांत, रक्त और सांस्कृतिक संहार से भरा है। इसके असंख्य निशान अब भी प्रत्यक्ष हैं। इसी में से एक राजधानी दिल्ली स्थित कुतुब मीनार परिसर में निर्मित कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद है, जहां भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा स्थापित तख्ती में स्पष्ट लिखा है कि यह मस्जिद 27 हिंदू - जैन मंदिरों को तोड़कर बनाई गई है। ऐसे सैकड़ों ऐतिहासिक उदाहरण हैं।
जबकि भारत में पैगंबर मुहम्मद साहब के जीवनकाल में अरब के बाहर विन्न की पहली मस्जिद 'चेरामन जुमा मस्जिद' का निर्माण वर्ष 629 में केरल के तत्कालीन हिंदू राजा चेरामन पेरूमल भास्करा रविवर्मा और स्थानीय हिंदुओं के सहयोग से कोडुंगल्लूर में हुआ था। यह इसलिए संभव हुआ, क्योंकि समावेशी भारतीय वैदिक दर्शन न तो 'काफिर कुफ्र' अवधारणा जैसा असहिष्णु है और न ही संकुचित। भारत पंथनिरपेक्ष है, तो वह संविधान की वजह से ही नहीं, अपितु अपने शान्त हिंदू चरित्र और वैदिक परंपराओं के कारण भी। विगत सहस्राब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप के जिन क्षेत्रों में 'एक ही ईन्नर सच्चा है, शेष झूठे हैं' रूपी दर्शन का वर्चस्व हुआ, वहां अन्य धर्म के स्थानीय अनुयायी या तो समाप्त हो गए या फिर दोयम दर्जे का जीवन बिताने को विवश हैं। इस भूखंड में बहुलतावाद और लोकतंत्र केवल उन्हीं स्थानों पर जीवित है, जहां आज भी भारतीय सनातन संस्कृति की प्रधानता है।
अरब सहित मध्यपूर्व एशिया में एक करोड़ से अधिक भारतीय प्रवासी (गैर मुस्लिम सहित) बसते हैं। इस भूभाग में जिस देश के जो भी नियम-कानून हैं, वे उनका बिना किसी प्रतिकार के पालन करते हैं। उदाहरणस्वरूप, सऊदी अरब में सार्वजनिक रूप से मूर्ति पूजा या कोई भी गैर-इस्लामी पूजा-अर्चना प्रतिबंधित है। इसे भारतीय हिंदू उसी सम्मान के साथ स्वीकार करते हैं। क्या कभी विन के किसी घोषित इस्लामी या ईसाई देश में किसी हिंद ने इस प्रकार का भाव प्रचारित किया कि उसकी आस्था, परंपरा और मान्यताओं को स्थानीय कानून जा रहा है? इसके विपरीत भारत, अमेरिका और फ्रांस सहित कई यूरोपीय देशों में एक वर्ग द्वारा वहां के स्थानीय कानूनों और सांस्कृतिक परंपराओं के प्रतिकार की चर्चा आम रहती है।
क्या यह सच नहीं कि भारत में भी एक वर्ग अपनी मजहबी मान्यताओं को भारतीय कानून या संविधान से ऊपर रखने की कोशिश करता है? इसी में से एक वर्ष 1985-86 का शाहबानो मामला है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए प्रगतिशील निर्णय का भड़काऊ नारों के साथ हिंसक विरोध किया गया और इस कट्टरता के समक्ष आत्मसमर्पण करते हुए तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने संसद में अपने प्रचंड बहुमत के बल पर अदालत का फैसला पलट दिया था। वर्ष 2019-20 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) का विरोध, 2021-22 का कर्नाटक हिजाब प्रकरण और ज्ञानवापी परिसर मामले में नूपुर शर्मा को जान से मारने के फतवे के साथ निरपराध कन्हैयालाल (उदयपुर) और उमेश (अमरावती) की हत्या के मामले भी इसी किस्म की मानसिकता का विस्तार कहे जाएंगे।
बड़ा प्रश्न यह भी है कि अरब देशों विशेषकर यूएई और बहरीन के मुस्लिम शासकों को किस बात ने बहुदेववाद और सह-अस्तित्व को जगह देने के लिए प्रेरित किया? वह भी इस तरह कि वे न केवल मंदिरों के लिए भूमि दान कर रहे हैं, बल्कि मंदिर परियोजनाओं के साथ जुड़ भी रहे हैं। इसका उत्तर अरब प्रायद्वीप के सामाजिक-राजनीतिक घटनाक्रम में मिल जाता है। इस्लाम का उद्गम स्थल सऊदी अरब अपने युवराज मोहम्मद बिन सलमान के अधीन अब पूरी तरह शरीयत प्रदत्त देश नहीं रह गया है। बीते कुछ वर्षों से सऊदी अरब में ऐसे स्वागतयोग्य सामाजिक सुधार हुए हैं, जो पहले विशुद्ध इस्लामी दृष्टिकोण में वर्जित कहे जाते रहे थे। इनमें महिलाओं को बिना पुरूष संरक्षक के वाहन चलाने की अनुमति, कामकाज में उनकी भागीदारी बढ़ाने और अंतरिक्ष परियोजनाओं में उन्हें स्थान देने जैसे कई कदमों के साथ कई क्षेत्रों में सऊदी राजवंश द्वारा सुधार किए जा रहे हैं।
भविष्य में तेल-ईंधन पर वैन्निक निर्भरता समाप्त होने की आशंका और दुनिया में ई-वाहनों के बढ़ते चलन ने भी नई वास्तविकताएं पैदा की हैं। अरब देशों ने समयानुरूप वैत्रिक स्तर पर स्वयं को उदार, सहिष्णु और आधुनिक बनाने हेतु कदम उठाए हैं। उन नियम-कानूनों में सुधार हो रहा है, जो पुरानी मान्यताओं की जकड़ में थे और सह-अस्तित्व के लिए बड़ी बाधा हैं।
वास्तव में, अरब-मध्यपूर्व एशिया में हो रहे परिवर्तनों से भारत के तथाकथित सेक्युलरवादियों को सीखना चाहिए। मध्यकालीन 'काफिर-कुफ्र-शिर्क' की अवधारणा कालबाह्य हो चुकी है। तकनीकी युग में दुनिया छोटी हो रही है। ऐसे में कोई भी समाज कुएं का मेंढक बनकर नहीं रह सकता। आपसी सहयोग और सह-अस्तित्व समय की मांग है।

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