Pratahkal-Acharya Mahashraman-आचार्य महाश्रमण-Kharghar
मुंबई । आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) 200 से अधिक दिनों की यात्रा प्रवास के माध्यम से मुंबई (Mumbai) में आध्यात्मिक ज्योति जलाकर अब इस महानगरी के बाहरी भाग में विचरण करते हुए औरंगाबाद की ओर बढ़ चले हैं। शुक्रवार प्रातःकाल वे अपनी धवल सेना के साथ सीबीडी बेलापुर से खारघर के लिए गतिमान हुए। उनका अनुगमन करते हुए श्रद्धालु भी चल पड़े।

Pratahkal-Kharghar

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लगभग दस किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री खारघर की सीमा में पहुंचे तो उपस्थित श्रद्धालुओं ने भावभीना अभिनंदन किया। वे खारघर स्थित बीडी सोमानी इंटरनेशनल स्कूल में पहुंचे। यहां से लगभग 900 मीटर दूर स्थित रामशेठ ठाकुर कॉमर्स कॉलेज में मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि धर्म शास्त्रों में आत्मयुद्ध की बात बताई गई है। दुनिया में बाहर में भी युद्ध चलते हैं। बाहर का युद्ध भी बाहर होने से पहले आदमी के दिमाग में युद्ध के भाव आते हैं, उसकी योजना बनती है और फिर वह बाहर प्रकट होता है। बाहर का युद्ध तो किस प्रकार विराम को प्राप्त हो अथवा न हो, भीतर की चेतना में अहिंसा और अपरिग्रह की ऐसी चेतना का विकास हो कि युद्ध की आवश्यकता ही नहीं पड़े। युद्ध का कारण कहीं परिग्रह की चेतना और भी कोई कारण हो सकता है, जिसके वशीभूत होकर आदमी युद्ध प्रारम्भ करता है।

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अपने आपसे लड़ना अर्थात् अपने में रहने वाली कमियों, दोषों को निकालने का प्रयास करना चाहिए। उनकी जड़ें इतनी गहरी होती हैं तो उन्हें निकालना कठिन होता है। उसके लिए आत्मयुद्ध के द्वारा उन बुरे संस्कारों को बाहर निकालने का प्रयास किया जाता है। जैन भाषा में संवर और निर्जरा आत्मा युद्ध के दो आवश्यक हथियार हैं। संवर से अपने आपको सुरक्षित करना और पूर्वकृत कर्मों को निर्जरा के द्वारा क्षीण किया जाता है। आदमी का मुख्य युद्ध मोहनीय कर्म के साथ होता है। मोहनीय कर्म आदमी की चेतना को विकारयुक्त बनाने वाला होता है। गुस्सा, अहंकार, माया, लोभ, राग-द्वेष, घृणा आदि विकृतियां मोहनीय कर्म से संबंधित हैं। इसलिए मोहनीय कर्म को कमजोर करने के लिए आत्म युद्ध होता है। इस धर्मयुद्ध के मुख्य हथियारों का भी वर्णन धर्मशास्त्रों में किया गया है। मोहनीय कर्म की मुख्य चार जड़े होती हैं-गुस्सा, अहंकार, माया व लोभ। गुस्से पर विजय प्राप्त करने के लिए उपशम की साधना या उसका अभ्यास किया जाता है। अहंकार को जीतने के लिए मार्दव का प्रयोग होता है। माया को जीतने के लिए आर्जव अर्थात ऋजुता का अभ्यास किया जाए और लोभ को जीतने के लिए संतोष की साधना होती है।

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साध्वी प्रमुखा ने भी खारघरवासियों को उद्बोधित किया। महिला मण्डल ने स्वागत गीत का संगान किया। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने प्रस्तुति दी। किशोर मण्डल ने गीत का संगान किया। कन्या मण्डल ने शासनमाता साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा के जीवन पर प्रस्तुति दी। स्थानीय विधायक प्रशांत ठाकुर ने स्वागत किया। स्थानीय सभाध्यक्ष सुरेश पटवारी, कार्याध्यक्ष प्रताप बाबेल, मंत्री कुंदन मेहता, कोषाध्यक्ष चंद्रेश भंडारी, सहमंत्री जयप्रकाश वागरेचा, युवक परिषद अध्यक्ष शैलेंद्र सोनी, उपाध्यक्ष प्रकाश मेहता, मंत्री कल्पेश वागरेचा, कोषाध्यक्ष विवेक मेहता, संगठन मंत्री मयंक लोढा, सहमंत्री अनिल मेहता, विमल सिंघवी, ज्ञानशाला प्रभारी पारस मेहता, अर्पित बाबेल, संरक्षक भेरुलाल सोनी, पवन दुग्गड़, मुकेश सोनी, परेश मेहता, शैलेंद्र पटवारी, शीतल सोनी, प्रशांत दुग्गड़, लोकेश चोरडिया, चेतन गुंदेचा, चंद्रेश गुंदेचा, दिनेश परमार, आशीष गुंदेचा, राहुल बाफना, किशोर मंडल के जिमीत भंडारी, निहाल सोनी, मयंक मेहता, धीरज मेहता, युग मेहता, दर्शन कोठारी, महिला मंडल अध्यक्ष मंजुला बाबेल, अरुणा सोनी, रेखा श्रीश्रीमाल, भाविका मेहता के साथ विशेष सहयोग अशोक बाफना, गौरव मेहता का रहा।
Editorial

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