Movement
विभूति नारायण राय । हर बड़े जनांदोलन (mass movement) के बाद पूरे अस्त- हर व्यस्त माहौल में सिर्फ एक छवि हमारा स्मृतियों में बची रह जाती है, और वह होती है, थके-हारे पुलिसकर्मियों (policemen) की, जिनकी पूरे घटनाक्रम की शुरूआत में आमतौर से कोई भूमिका नहीं होती, मगर अंत में ठीकरा उन्हीं के सिर पर फूटता है। पिछले कुछ दिनों से जारी किसान आंदोलन के हर दिन शाम को इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया (electronic and print media) की छवियां भी लगभग ऐसी ही हैं। किसान (farmers) जिन मांगों को लेकर आंदोलित हैं, उनका पुलिस से कोई रिश्ता नहीं हो सकता। न तो मांगें उनके किसी दुराचरण से उपजी हैं, और न ही उनके पूरा होने या न होने में पुलिस की कोई भूमिका हो सकती है, मगर राज्य की सबसे दृश्यमान और दमनकारी भुजा होने के कारण आंदोलनकारियों से पहला मुचेहटा उन्हें ही लेना पड़ा है। किसानों के मामले में एक औसत पुलिसकर्मी की सहानुभूति भी आंदोलन के साथ थी, क्योंकि उनमें से ज्यादातर गांवों से खेती किसानी की पृष्ठभूमि से आते हैं, पर सिखलाई और अनुशासन के चलते वे अपने भाई-बंधुओं से कई दिनों से मोर्चा ले रहे हैं।
आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच के रिश्ते एक पराधीन समाज में निर्धारित हुए थे और काफी हद तक अब भी वैसे ही बने हुए हैं। इसका प्रमुख कारण 1947 के बाद आए नए शासकों द्वारा औपनिवेशिक कानूनों से स्थापित पुलिस के चरित्र में कोई बुनियादी सुधार न करना है। भीड़ में शामिल व्यक्ति पहले की ही तरह अब भी उसका 'शत्रु' ही है, और अभी भी उसे निपटने के लिए शक्ति का अधिकतम प्रयोग करने में हिचक नहीं होती। यह अधिकतम शक्ति आमतौर से फायरिंग होती है, जिसके चलते दुनिया की सबसे बहुमूल्य किसी ऐसी जान का नुकसान होता है, जिसे थोड़ा धैर्य दिखाकर बचाया जा सकता था याद करने की जरूरत है कि देश के एक बड़े राजनेता ने आजाद भारत में जनता पर गोली चलाने का विरोध किया भी था। वह डॉक्टर राममनोहर लोहिया थे, जिन्होंने पुलिस फायरिंग के बाद साठ के दशक में केरल की अपनी ही पार्टी की पट्टमथानु पिल्लई सरकार से इस्तीफे की मांग की थी। उनके अनुसार, आजाद मुल्क की पुलिस को अपनी ही जनता पर गोली नहीं चलानी चाहिए। उनकी आवाज नक्कार खाने में तूती बनकर रह गई।
पुलिस बल के प्रयोग के चरण और उसकी सीमाएं भारतीय संविधान और देश के विभिन्न कानूनों में निर्धारित हैं। अगर उनका पालन किया जाए, तो अधिकांश मामलों में जान-माल के गंभीर नुकसान से बचा जा सकता है। यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं होता? पुलिस बल के प्रयोग के दौरान गोली चलाने की नौबत आने के पहले गैर घातक विकल्पों का इस्तेमाल होना चाहिए, ऐसा प्रशिक्षण के दौरान सिखलाया जाता है। इनमें मुख्य रूप से लाठीचार्ज, आंसू गैस, वाटर कैनन, रबर बुलेट, पेलेट गन या स्टन ग्रिनेड जैसे विकल्प हो सकते हैं। कई देशों में वाटर कैनन से फेंके जाने वाले पानी में कुछ ऐसे तत्व भी मिलाए जाते हैं, जिनसे शरीर में खुजली पैदा होती है। इन सारे विकल्पों के इस्तेमाल से किसी मनुष्य की जान जाने की आशंका काफी हद तक न्यूनतम हो सकती है, फिर क्योंकर ऐसा होता है कि ज्यादातर मामलों में शुरू ही और अनियंत्रित मात्रा में पुलिस फायरिंग करती है, और बेशकीमती जानों का नुकसान होता है?
इसे समझने के लिए मैं अपने दो अनुभव रखना चाहता हूं। इलाहाबाद में 1990 में एक उत्तेजित और उपद्रवी भीड़ पर जब आंसू गैस के गोले छोड़ने का आदेश दिया गया, तो हमने पाया कि तीन उपलब्ध टीयर गैस गन में से दो तो वर्षों से इस्तेमाल न होने से जंग खाई हुई हैं और तीसरी से जिन गोलों को फायर किया गया, वे इतने दिनों से गोदाम में पड़े थे कि किसी काम लायक नहीं रह गए थे। ऐसा इसलिए था कि घातक बुलेट की जगह उनके इस्तेमाल का महत्व हमारी सोच का हिस्सा नहीं बन सका था। न तो सरकार नए गोलों के लिए धन अवमुक्त कर रही थी और न ही पुलिस नेतृत्व जरूरी प्रशिक्षण में दिलचस्पी दिखा रहा था। कुछ वर्षों पूर्व दिल्ली के उत्तर-पूर्व जिले में हुई सांप्रदायिक हिंसा को समझने के लिए अवकाश प्राप्त नौकरशाहों के एक दल के सदस्य के रूप में मैं मौके पर गया, तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि एक सज्जन, जो आईएएस के वरिष्ठतम पद पर सेवा करने के अलावा उप राज्यपाल भी रह चुके थे सबसे ज्यादा इस बात से चकित थे। कि तमाम अखबारों में दिल्ली पुलिस के ऐसे चित्र छपे थे, जिनमें पुलिसकर्मी भीड़ पर पत्थर फेंक रहे थे। वह मुझसे जानना चाहते थे कि क्या पुलिस की सिखलाई में पत्थर फेंकना भी शामिल है? उन्हें यह समझाने में मुझे कुछ समय लगा कि वहां मौजूद पुलिसकर्मियों के पास सिर्फ दो हथियार थे- डंडा और रायफल। चूंकि बलवाई इतनी दूर थे कि लाठी उन तक पहुंच नहीं सकती थी और गोली चलाने का हुक्म नहीं था, इसलिए पुलिसकर्मियों के पास सबसे आसान विकल्प यही था कि वे भीड़ द्वारा फेंके गए पत्थर उठाकर वापस उन्हीं पर फेंके। यदि उनके पास लाठी और गोली के बीच के विकल्प होते, तो शायद वे उनका उपयोग करते।
हालिया किसान आंदोलन के दौरान जमकर आंसू गैस के गोलों का इस्तेमाल हुआ और पहली बार वे ड्रोन से भी छोड़े गए, जिससे उनकी पहुंच बढ़ी। इनके अतिरिक्त, पानी की बौछारें छोड़ी गई और बीच-बीच में रबर बुलेट भी फायर किए गए। इन सबसे पुलिस फायरिंग से बचा जा सका। जितने दृढ़-प्रतिज्ञ और जिस संख्या में किसान पंजाब-हरियाणा सीमा पर मौजूद थे, उसे देखते हुए यह कानून लागू करने वालों की सफलता ही कही जाएगी कि बिना जान-माल की बड़ी क्षति के उन्हें रोका जा सका। कारण बड़ा स्पष्ट है कि चुनावी वर्ष में सरकार जमीन पर लाशें गिराने का नतीजा समझती थी और उसने पुलिस को गोली न चलाने के स्पष्ट निर्देश दे रखे थे।
यही व्यवस्था आम दिनों में क्यों नहीं की जा सकती? लोकतंत्र में जनता सड़कों पर निकलेगी ही और कई बार उसे नियंत्रित करने के लिए राज्य पुलिस का प्रयोग भी करेगा। पुलिस के दिमाग में यह भरने की जरूरत है कि प्रदर्शनकारी शत्रु नहीं हैं, जिनके खिलाफ उसे अधिकतम बल का इस्तेमाल करना ही है। राज्य को भी उसे गैर घातक विकल्प प्रदान करने चाहिए, जिनसे स्थिति नियंत्रित भी हो जाए और बेशकीमती जानों का नुकसान भी न हो।
Editorial

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