Malviya
उदयपुर। कांग्रेस (Congress) से भाजपा (BJP) में आए बांसवाड़ा (Banswara) के वरिष्ठ नेता महेन्द जीत सिंह मालवीय (MahendraJeet Singh Malviya) ने इस सभा में कहा कि ये मेरी घर वापसी है और मैने विद्यार्थी परिषद और आरएसएस (RSS) में काम कर अपनी नींव बनाई थी और अब में बांसवाड़ा के साथ- साथ मध्यप्रदेश और गुजरात के सीमावर्ती जिलों में जाकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं को भाजपा से जोड़ने का काम करूंगा।
कांग्रेस से भाजपा में आने के बाद महेन्द्र जीत सिंह मालवीय ने पहली बार सार्वजनिक मंच से सम्बोधित कर रहे था। मालवीय ने कहा कि जल्दी घर वापसी का अवसर मिला है और यह पहला मौका है कि भाजपा की सार्वजनिक सभा में मै अपने लाईसेंस को रिन्यू करवा रहा हूँ। सभी ने कहा कि सभी के आशीर्वाद और सहयोग से भाजपा को उंचाई पर लेकर जाएंगे और 400 पार सीटे दिलवाएंगे। मालवीय ने कहा कि देश के वातावरण के अनुसार राजस्थान की सभी 25 सीटें जीत रहे है। मालवीय ने कहा कि मेरा राजस्थान के साथ-साथ गुजरात, मध्यप्रदेश की सीमाओं में भी दखल है। मैं अपने डिविजन में तो काम करूंगा ही साथ-साथ गुजरात और मध्यप्रदेश में भी जाउंगा और वहां पर भाजपा की ताकत को बढ़ाउंगा। मालवीय ने कहा कि कई आदिवासी भाई कांग्रेस पार्टी में घूम रहे है उन्हें सही रास्ते पर लाने की कोशिश करूंगा। मालवीय ने कहा कि मेरे 77 से 85 तक विद्यार्थी जीवन में में विद्यार्थी परिषद, आरएसएस में काम कर अपनी नींव बनाई है।
मैं स्कूल अध्यक्ष, कॉलेज उपाध्यक्ष, कॉलेज अध्यक्ष, लैंपस चैयरमेन, 2 बार प्रधान, एक बार सांसद और चार बार विधायक रहा हूँ। पांच बार की जिला प्रमुख मेरे घर में है मैं पूरी ताकत लगाकर लोगों को भाजपा की सदस्यता दिलवाउंगा। मालवीय ने कहा कि मैं बांसवाड़ा से आने वाले कार्यकर्ताओं से कहूंगा कि मेने भाजपा की सदस्यता ले ली है और कोई यह ना सोचे कि वरिष्ठ व्यक्ति है और हमें तवज्जों मिलेगी या नहीं मिलेगी, में भाजपा कार्यकर्ता के रूप में काम करूंगा। भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए सुख-दुख में खड़ा रहूंगा।
घर वापसी नहीं सुबह का भूला घर आया - खराड़ी
बांसवाड़ा में अपनी धाक रखने वाले महेन्द्र जीत सिंह मालवीय द्वारा भाषण में अपने आप को घर वापसी कहने पर राजस्थान सरकार में कैबिनेट मंत्री बाबूलाल खराड़ी (Babulal Kharadi) ने कहा कि इसे घर वापसी नहीं कहते है। इसे कहते है कि सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते है।
Editorial

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