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नई दिल्ली (एजेंसी)। सुप्रीम कोर्ट (supreme court) ने बुधवार को कहा कि अजन्मे बच्चे और मां के हितों का ख्याल रखना भी अदालतों की एक ड्यूटी है। इसके साथ ही सर्वोच्च अदालत ने 26 वर्षीय एक विधवा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें 32 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की मांग की - गई थी। पीड़ित महिला, जो मानसिक आघात और - अवसाद के कारण गर्भावस्था को आगे नहीं बढ़ाना चाहती थी, की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए - सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। हाई कोर्ट ने इस मामले में पहले ही एम्स के डॉक्टरों का एक मेडिकल बोर्ड गठित कर जांच करवाई थी, जिसमें पाया गया था कि अजन्मा बच्चा सामान्य है। चिकित्सा विशेषज्ञों की राय के आधार पर हाई कोर्ट ने 23 जनवरी को महिला की याचिका खारिज कर दी थी। उसके बाद उस आदेश के खिलाफ महिला ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, भ्रूण में कोई गड़बड़ी या असामान्यता नहीं है बल्कि बच्चा बिल्कुल सामान्य शरीर वाला है। इसलिए इस याचिका पर हम विचार नहीं कर सकते हैं। इस पर याचिकाकर्ता के वकील राहुल शर्मा ने कहा, हमें मां के बारे में सोचना चाहिए न कि अजन्मे भ्रूण के बारे में। वह एक विधवा है और वह इस सदमे के साथ जीना नहीं चाहती। यह गर्भावस्था उसकी पसंद और इच्छा के विरुद्ध है जो और अधिक आघात का कारण बनेगी। याचिकाकर्ता के वकील की दलीलों पर खंडपीठ के दूसरे जज जस्टिस प्रसन्ना बी वराले ने कहा, हमें सिर्फ एक की नहीं बल्कि भ्रूण और मां दोनों की देखभाल करनी है।
Editorial

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