Marathi language
केंद्रीय मंत्री परिषद ने कल, नवरात्री के प्रथम दिन ही मराठी, पाली, प्राकृत (बिहार) आसामी (आसाम) , और बंगाली (पश्चिम बंगाल) भाषा को "अभिजात भाषा" ("Abhijat bhasha") की श्रेणी प्रदान करने का निर्णय लिया। इससे इन भाषाओं की समृद्धि पर राजमान्यता की मुहर लगती हैं।
अभी तक यह श्रेणी छह भाषाओं को प्राप्त हैं। तमिळ (2004 में घोषित), संस्कृत (2005), कन्नड (2008), तेलुगु (2008), मल्याळम (2013) और ओडिया (2014)।
अभिजात श्रेणी मिलनेवाली भाषाओं को क्या लाभ मिलते हैं?
1. ये भाषाएं और अधिक समृद्ध करने हेतु केंद्र सरकार से प्रतिवर्ष २५०-३०० करोड रुपयों का अनुदान मिलता हैं।
2. भाषा भवन बनाना।
3. उस भाषा के ग्रंथ एवं साहित्य का प्रसार करना। ग्रंथालय निर्माण करना।
4. देशभर के विश्वविद्यालयों में या अन्य संस्थाओ द्वारा भाषा प्रसार तथा अन्य प्रकल्प चलाने हेतु आर्थिक सहायता प्राप्त होती हैं।
5.अभिजात भाषा की श्रेणी मिलनेपर उस भाषा के विद्वानो के लिए प्रति वर्ष 2 राष्ट्रीय पुरस्कार घोषित किए जाते हैं।
6. सेंटर ऑफ एक्सलन्स फॉर स्टडिज की स्थापना की जाती हैं।
7. प्रत्येक विश्वविद्यालयों में उस भाषा के अध्ययन हेतु विशेष केंद्र खड़ा किया जाता हैं।8. भारत के सभी विश्वविद्यालयों में उस भाषा को (e.g.मराठी) पढ़ाए जाने की व्यवस्था की जाती हैं।
9. प्राचीन ग्रंथ अनुवाद हेतु विशेष सहायता दी जाती हैं।
किसी भी भाषा को ‘अभिजात श्रेणी’ प्राप्त करने के निकष क्या हैं ?
1. वह भाषा न्यूनतम डेढ़ या दो हजार वर्षे प्राचीन होनी चाहिए।
2. उस भाषा में अत्यंत समृद्ध ग्रंथ एवं अन्य साहित्य परंपरा होनी चाहिए।
3. वे ग्रंथ मूलत: उसी भाषा में लिखित चाहिए और अनुवादित न हो।
4. भाषा का प्रवास अखंडित, अक्षुण्ण होना चाहिए तथा प्राचीन और आज की भाषा में जीवमान संबंध सुस्पष्ट हो।
प्रक्रिया क्या है?
किसी भाषा को अभिजात श्रेणी मिले इसलिए राज्य सरकार द्वारा प्रस्ताव आना हैं। प्रस्ताव में उल्लेखित तथ्यों की जांच, परख साहित्य अकादमी द्वारा की जाती हैं। अगर कोई त्रुटी ध्यान में आई तो राज्य को बताया जाता हैं। उन त्रुटीयों की पूर्तता की जाने पर साहित्य अकादमी केंद्रीय सांस्कृतिक मंत्रालय को उस भाषा की अनुशंसा करती हैं। मंत्री परिषद के सामने प्रस्ताव सादर किया जाता हैं और मंत्री परिषद उसपर अपनी मुहर लगाती हैं।
Editorial

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