ratan tata
महाराष्ट्र, झारखंड व गुजरात सरकार ने किया एक दिन के राजकीय शोक का ऐलान
मुंबई (कार्यालय संवाददाता)। टाटा संस (Tata Sons) के मानद चेयरमैन (Chairman) रतन नवल टाटा (Ratan Naval Tata) का गुरूवार को मुंबई के वर्ली श्मशान घाट पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हुआ। इससे पहले पार्थिव शरीर नरीमन पॉइंट स्थित नेशनल सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स (एनसीपीए) में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था। यहां से उनकी अंतिम यात्रा वलों के श्मशान घाट पहुंची। कोलाबा स्थित टाटा के आवास से लेकर एनसीपीए और फिर श्मशान घाट तक लोगों की भारी भीड़ देखने को मिली। उनके अंतिम दर्शन के लिए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से लेकर राजनीतिक, कारोबारी, खेल, मनोरंजन जगत के कई बड़े नाम पहुंचे। अंतिम संस्कार के पहले उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल और अन्य नेता मुंबई में दिग्गज उद्योगपति रतन टाटा के अंतिम संस्कार में मौजूद हैं। महाराष्ट्र और झारखंड व गुजरात सरकार ने टाटा के निधन पर एक दिन के राजकीय शोक का ऐलान किया है।
इससे पहले रतन टाटा के पार्थिव शरीर को दक्षिण मुंबई स्थित राष्ट्रीय कला प्रदर्शन केंद्र (एनसीपीए) में जनता के अंतिम दर्शन के लिए सुबह 10.30 बजे से अपराह्न 3.55 बजे तक रखा गया था जहां विभिन्न वर्गों के हजारों लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे। रतन टाटा ने 86 साल की उम्र में बुधवार देर रात करीब 11 बजे अंतिम सांस ली। वे मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल की इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में एडमिट थे और उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे।
पारसी परंपराएं निभाई
पारसियों के पारंपरिक दखमा की बजाय उनका दाह संस्कार हुआ। सबसे पहले पार्थिव शरीर को प्रेयर हॉल में रखा गया। वहां पारसी रीति से 'गेह-सारनू' पढ़ा गया। रतन टाटा के पार्थिव शरीर के मुंह पर एक कपड़े का टुकड़ा रख कर 'अहनावेति' का पहला पूरा अध्याय पढ़ा गया। ये शांति प्रार्थना की एक प्रक्रिया है। इसके बाद वर्ली श्मशान घाट के इलेक्ट्रिक अग्निदाह से अंतिम संस्कार किया गया।
शवदाह गृह में मौजूद एक धर्म गुरू ने बताया कि अंतिम संस्कार के बाद दिवंगत उद्योगपति (Industrialist) के दक्षिण मुंबई के कोलावा स्थित बंगले में तीन दिन तक अनुष्ठान किए जाएंगे।
Editorial

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