✕
बढ़ते देश को चाहिए सुरक्षित सड़कें
By EditorialPublished on
ओ. पी. एस. मलिक: हमारा देश सड़कों पर मौत के मामले में पहले स्थान पर है। हजारों लोग सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं। कई मौतें दर्ज होती हैं और कुछ नहीं भी होती हैं।

x

ओ. पी. एस. मलिक: हमारा देश सड़कों पर मौत के मामले में पहले स्थान पर है। हजारों लोग सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं। कई मौतें दर्ज होती हैं और कुछ नहीं भी होती हैं। देश में रोज 450 से ज्यादा लोग सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं, जिसका नतीजा यह कि सड़क पर चलता हुआ कोई आदमी खुद को सुरक्षित नहीं समझता है। इसे मैं 'रोड टेररिज्म' कहता हूं। पता नहीं कब कौन किसके वाहन तले कुचल जाए या मर जाए। हम आए दिन अखबारों में पढ़ते हैं कि आदमी की कोई गलती नहीं होती, पर वह कुचल दिया जाता है। सड़क पर होने वाली 70 प्रतिशत मौतों के लिए तेज या रैश ड्राइविंग जिम्मेदार होती है। सड़क दुर्घटनाओं का असर व्यापक होता है। हो सकता है, दो ही मौतें हों, पर 12 लोग घायल जाएं और जिंदगी भर के लिए दिव्यांग भी । दुर्घटनाओं से बेहिसाब बर्बादी होती है और कोई भी सुरक्षित महसूस नहीं करता है।
सड़क दुर्घटनाओं के मामले में आज भारत दुनिया की राजधानी बना हुआ है। साल 2001 में मैं सड़क परिवहन प्रबंधन और पर्यावरण के संबंध में प्रशिक्षण के लिए स्वीडन गया था। तब स्वीडन की यह नीति थी कि यदि सड़क दुर्घटना में दो लोगों की भी मौत हो जाए, तो राष्ट्रीय आपदा घोषित हो जाती है और पूरा तंत्र निदान के लिए उसके अनुरूप ही काम करने लगता है । अपने देश में दो क्या, इससे कई गुना ज्यादा लोग भी मारे जाते हैं, किसको, कितना फर्क पड़ता है? भारत में जितने लोगों की हत्या होती है, उससे कई गुना ज्यादा लोग सड़क दुर्घटना में मरते हैं। ऐसे हालात में सुधार के लिए कानूनी बदलाव हुआ है, तो बहुत मुनासिब सा लगता है।
भारी वाहन चालक नाराज हैं, मगर ऐसा नहीं है कि मौतें सिर्फ भारी वाहनों से होती हैं। तमाम तरह के वाहन मौत का कारण बनते हैं। जो कानून बना है, वह केवल बसों या ट्रकों के लिए नहीं है, यह तो सभी के लिए है। कोई भी यह नहीं कहेगा कि ऐसी मौतों की संख्या घटनी नहीं चाहिए या लापरवाही से वाहन चलाने की प्रवृत्ति खत्म नहीं होनी चाहिए। हर कोई चाहेगा कि इस पर रोक लगे और रोक लगाने का सबसे कारगर तरीका दंड है। दंड से रोकथाम भी होती है और सबके लिए संदेश भी छिपा होता है। वैसे दंड का जो सिद्धांत है, दंड की अधिकता से ज्यादा जरूरी है, दंड का सुनिश्चित होना । बीस साल सुनवाई करके आप किसी को दस साल की सजा सुनाएं, यह ठीक नहीं है। यह ढर्रा बदलना चाहिए।
दक्षिण कोरिया में साल- डेढ़ साल में अपील, सुनवाई, सजा सुनाकर न्याय कर दिया जाता है, इससे समाज में कानून- व्यवस्था चाक-चौबंद रहती है। बेशक, कानून बनाने से भी ज्यादा जरूरी है दोषियों के लिए सजा सुनिश्चित करना । सजा भले पांच साल की रखिए, पर सुनिश्चित रखिए। सभ्य होते देश में सड़कों को दुर्घटना या मौत की जगह होने से बचाने के अलावा आपके पास कोई रास्ता नहीं है ।
अब रही बात कुछ वाहन चालकों की चिंता की, अगर वे दुर्घटना की जगह पर रूक जाएंगे, तो हमला हो जाएगा और जान भी जा सकती है। अव्वल तो बहुत कम मामलों में ऐसा होता है कि जब जिम्मेदार वाहन चालकों को भीड़ निशाना बनाती है। इस दिशा में अनेक संस्थाएं भी अच्छा काम कर रही हैं। ऐसी ही एक संस्था पीयूष तिवारी चलाते हैं, उनके संगठन का नाम ही 'सेव लाइव्स' है । सेव लाइव्स में इसी बात पर जोर दिया जाता है कि जो अच्छे लोग हैं, वे दुर्घटना के समय घायल की मदद के लिए आगे आएं और इसमें उन्हें सफलता भी मिली है। कोशिश यह है कि घायलों की मदद करने वाले को सहयोगी के रूप में देखा जाए, संदिग्ध दोषी के रूप में नहीं। पुलिस में कई जगह यह ढर्रा है कि मदद करने पहुंचे लोगों को भी संदेह की निगाह से देखा जाता है। फिर भी वाहन चालकों का भय स्वाभाविक है कि लोग दुर्घटना की स्थिति में उग्र हो जाते हैं और चालकों को अपने बचाव के साधन या प्रावधान चाहिए ।
हर जगह लोग ऐसे अराजक नहीं हैं कि वाहन से मदद करने के लिए उतरे व्यक्ति या चालक को ही मारने लगें। ऐसी संस्थाएं हैं, जो सड़क दुर्घटना की स्थिति में मददगारों के लिए काम करती हैं और उन्हें माहौल बदलने में सफलता भी मिल रही है। मैंने यह अनुभव किया है, मदद करने वालों के प्रति लोगों में सद्भावना होती है और जो समय के साथ बढ़ रही है। अगर हम समग्रता में देखें या जनहित में देखें, तो दोषियों के लिए दंड सुनिश्चित करना वाजिब होगा ।
वाहन चालकों की नाराजगी, हड़ताल और फिर सरकार के आश्वासन के बाद हड़ताल का टूटना महत्वपूर्ण है। वाहन चालकों की भी पीड़ा को एक बार सुन लेना चाहिए और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जरूरी है। कानून के तहत उनके साथ किसी भी प्रकार से अन्याय न होने पाए, यह भी सुनिश्चित करना होगा। नाराज वाहन चालकों को बताना होगा कि दुर्घटनाओं और मौतों के आंकड़े क्या बयान कर रहे हैं, एक विकसित और सुविधापूर्ण होते देश में सड़क सुरक्षा से अब कोई समझौता नहीं किया जा सकता। ट्रक और बस चालकों को समय के साथ बदलना चाहिए, आखिर भारतीय सड़कें सबसे ज्यादा असुरक्षित क्यों रहें? यह तो सबकी सुरक्षा से जुड़ा विषय है ।
वाहन चालकों को भी अपने हित में सजग होना चाहिए। जैसे यूरोपीय देशों में चालकों के बारे में तय है कि एक चालक कितने घंटे लगातार सेवा दे सकता है, जबकि भारत में चालक 48-48 घंटे तक वाहन चलाते रहते हैं। चालक बहुत दबाव व तनाव में रहते हैं। उनके हित में उपाय करने पड़ेंगे। मगर अभी न ट्रक मालिक को ज्यादा चिंता है और न चालकों ने अपने लिए सुविधाएं व सहूलियतें बढ़ाने के प्रयास किए हैं। दुर्घटना को बढ़ावा देने वाली वजहों को दूर करना ही चाहिए और चालकों को स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि उनकी वजह से अगर किसी की मौत हुई है, तो सजा जरूर मिलेगी, सरकार पर दबाव डालकर सजा भले कुछ घटा लीजिए। सजा मिलेगी, तभी लोग सड़क दुर्घटनाओं को गंभीरता से लेंगे और सड़कें सुरक्षित होंगी।
स्वीडन में मैंने देखा है, वहां सड़क दुर्घटनाओं के मामले में 'जीरो विजन' है। मतलब, इंसानी गलती से कोई भी दुर्घटना न हो, इसे शत-प्रतिशत सुनिश्चित किया जाता है। यह हर इंसान की जिम्मेदारी है कि वह सड़क पर सभी नियमों का पालन करे और अपनी ओर से किसी भी अपराध या लापरवाही की गुंजाइश न छोड़े। ऐसी ही कोशिश हम भारत में भी कर सकते हैं।

Editorial
Next Story
Related News
X
