असम में फिर नई उम्मीद
चंदन कुमार शर्मा… विगत 29 दिसंबर को केंद्र, असम सरकार (Assam Government) और यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट (United Liberation Front) (उल्फा) के वार्ता समर्थक गुट के बीच एक त्रिपक्षीय शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और असम के मुख्यमंत्री हिमंत विस्व शर्मा ने समझौते को 'ऐतिहासिक' बताया और कहा कि यह राज्य में दशकों से चल रही हिंसा खत्म करेगा और विकास एवं समृद्धि के एक नए युग की शुरूआत होगी।
एक संप्रभु असम की मांग के साथ भारत राष्ट्र के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष की घोषणा करते हुए 1979 में उल्फा का गठन किया गया था। तब से, इस सशस्त्र संघर्ष में दस हजार से अधिक लोगों की जान गई है, अनेक लोग जीवन भर के लिए अपंग हो गए और कई लोगों को अन्य प्रकार के अत्याचारों का सामना करना पड़ा है। इसलिए असम की जनता लंबे समय से समस्या का राजनीतिक समाधान चाहती रही है।
ऐसी ही एक पहल 2005 में हुई थी, जब उल्फा नेतृत्व द्वारा पीपुल्स कंसल्टेटिव ग्रुप (पीसीजी) नामक एक समूह का गठन किया गया था, जिसमें केंद्र सरकार के साथ परामर्श करने के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता डॉ. इंदिरा गोस्वामी के नेतृत्व में असमिया नागरिक समाज के सदस्य शामिल थे। समूह ने केंद्र सरकार के साथ कई दौर की चर्चा की। लेकिन 2009 में उल्फा प्रमुख अरविंद राजखोवा सहित संगठन के शीर्ष नेताओं को बांग्लादेश में गिरफ्तार कर असम लाए जाने के बाद घटनाओं ने अलग मोड़ ले लिया। संगठन के कई महत्वपूर्ण नेता या तो सुरक्षा बलों द्वारा मारे गए या उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। गिरफ्तार नेतृत्व ने 2011 में पीसीजी को मध्यस्थ न रखने और केंद्र सरकार के साथ सीधे वार्ता करने का फैसला किया। जबकि म्यांमार स्थित उल्फा के कमांडर इन चीफ और कट्टरवादी परेश बरूआ ने इसे 'असांविधानिक' करार दिया। हालांकि इस बीच उल्फा नेतृत्व ने, जिसे वार्ता समर्थक समूह कहा जाता है, असम के नागरिक समाज से कहा कि वे समस्या के समाधान के लिए उनका मार्गदर्शन करें। उसके बाद मई, 2011 में प्रमुख बुद्धिजीवी हिरेन गोहेन के नेतृत्व में गुवाहाटी में नागरिक समाज ने सम्मेलन कर उल्फा नेतृत्व को केंद्र सरकार के समक्ष उठाई जाने वाली मांगों का एक चार्टर सौंपा। मांगों के चार्टर में राज्य में उत्पन्न राजस्व, प्राकृतिक संसाधनों, योजना प्रक्रिया को नियंत्रित करने के लिए राज्य की शक्ति मजबूत करने और एक सुरक्षित जनसांख्यिकीय स्थिति के साथ-साथ त्वरित और संतुलित विकास सुनिश्चित करने के माध्यम से असम (इसके लोगों) को अपने भविष्य पर अधिक नियंत्रण देने के लिए साविधानिक संशोधन का प्रावधान शामिल था।
हालांकि, परेश बरूआ ने केंद्र सरकार के साथ चर्चा के महत्व को खारिज नहीं किया, लेकिन वह इस बात पर अड़े रहे कि चर्चा संगठन की मूल मांग-राजनीतिक संप्रभुता और आर्थिक स्वायत्तता पर होनी चाहिए। कई दौर की चर्चा के बाद हालिया संधि पर हस्ताक्षर किए गए हैं। बेशक यह समझौता स्वदेशी समुदायों के हितों की रक्षा कर उन्हें सुरक्षा प्रदान करने का वादा करता है, लेकिन यह कैसे किया जाएगा, यह बहुत स्पष्ट नहीं है। लगता है कि बाकी के अधिकांश प्रावधान, जैसे मतदाता सूची से अवैध विदेशियों के नाम हटाने के लिए मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया की पुनः जांच, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की पुनः जांच (जो सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है), भूमि संबंधी आंकड़ों का डिजिटलीकरण, अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय सीमा पर मजबूत निगरानी, भूमिहीन स्वदेशी लोगों को जमीन देना आदि कोई नई बात नहीं है। इनमें से कुछ और राज्य में नई रेलवे लाइनों और राष्ट्रीय राजमार्गों को स्थापना का जिक्र समझौते में किया गया है, जो सरकार के पहले से किए जा रहे कार्यों का ही विस्तार है।
परेश बरूआ ने इस त्रिपक्षीय समझौते को 'शर्मनाक' और राज्य के लोगों के साथ धोखा बताया है। उन्होंने कहा कि वह चर्चा के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन तब तक वार्ता की मेज पर नहीं बैठ सकते, जब तक असम की स्वायत्तता को मुद्दे पर चर्चा न हो। राज्य की जनता को प्रतिक्रिया भी बहुत ठंडी है। मीडिया और विपक्षी पार्टियां भी इसकी आलोचना कर रही है। उल्फा के वार्ता समर्थक गुट के कुछ लोगों ने कहा कि समझौते को शतों से अनभिज्ञ थे और खुश नहीं हैं। वास्तव में समझौते की आलोचना इसलिए हो रही है, क्योंकि यह उल्फा के राजनीतिक मुद्दों को कमजोर करने वाले कुछ आर्थिक पैकेज तक ही सीमित है। वार्ता समर्थक गुट ने भी स्वीकार किया है कि वे अपने सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद समझौते से अधिक कुछ हासिल नहीं कर सके। मौजूदा परिस्थितियों में वे अधिक सौदेबाजी करने की स्थिति में भी नहीं थे। इसलिए समझौते की सीमित सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि इसके मौजूदा प्रावधानों को कैसे लागू किया जाता है। सभी जानते हैं कि परेश बरूआ उल्फा की मुख्य ताकत बने हुए हैं। वह म्यांमार से ऑपरेशन चलाते हैं और हाल ही मीडिया में खबर आई कि असम के युवाओं में उनका साथ देने के लिए म्यांमार जाने का नया चलन शुरू हुआ है। वार्ता समर्थक गुट समेत सभी जानते हैं कि उल्फा समस्या का समाधान तभी होगा, जब परेश बरूआ चर्चा में शामिल होंगे। मुख्यमंत्री हिमंत विस्व शर्मा भी कई बार इसका संकेत दे चुके हैं। ताजा समझौते के पीछे मुख्यमंत्री को भूमिका स्पष्ट नजर आ रही है। इस समझौते ने परेश बरूआ की प्रासंगिकता को खत्म करने का अवसर दिया था। ऐसा क्यों नहीं किया गया, यह स्पष्ट नहीं है। इसलिए आलोचकों ने इस समझौते को लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर किया गया समझौता बताया है। लेकिन जनता की प्रतिक्रिया देखते हुए लगता नहीं है कि इससे सत्तारूढ़ दल को कोई लाभ होगा।
समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले ऊपरी असम में सुरक्षा बलों पर उल्फा के नए हमले हुए। कुछ उल्फा कैडर मारे गए और कुछ गिरफ्तार हुए। यह उल्फा (स्वतंत्र) के नाम वाले परेश बरूआ के विद्रोही गुट की ताकत का प्रदर्शन है या यह नियंत्रण में रखने के लिए सरकार की सक्रिय भूमिका का नतीजा है यह कहना कठिन है। मौजूदा समझौते को प्रकृति और समझौते के बाद हस्ताक्षर करने वाले उल्फा नेतृत्व एवं मुख्यमंत्री के बयानों से लगता है कि अभी भविष्य के गर्भ में बहुत कुछ है।
Editorial

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