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कांग्रेस के लिए कारगर नहीं गठबंधन
By EditorialPublished on
डा. एके वर्मा : लोकसभा चुनाव आसन्न हैं। वास्तविक अर्थों में कांग्रेस और भाजपा ही राष्ट्रीय पार्टियां हैं। बसपा आम आदमी पार्टी और माकपा आदि तो केवल तकनीकी आधार पर राष्ट्रीय दल हैं।

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डा. एके वर्मा : लोकसभा चुनाव आसन्न हैं। वास्तविक अर्थों में कांग्रेस और भाजपा ही राष्ट्रीय पार्टियां हैं। बसपा आम आदमी पार्टी और माकपा आदि तो केवल तकनीकी आधार पर राष्ट्रीय दल हैं। उनका अस्तित्व और जनाधार अखिल भारतीय नहीं । लोकसभा चुनावों में कांग्रेस सहित कुछ अन्य विपक्षी दल आइएनडीआइए जैसे राजनीतिक मोर्चे के माध्यम से भाजपा को चुनौती दे रहे हैं। यदि ये सभी दल सशक्त विपक्ष का स्वरूप लेते तो वह लोकतंत्र के लिए बेहतर होता। हालांकि आइएनडीआइए से ऐसी कोई अनुभूति नहीं हो रही। सीटों के बंटवारे, नेतृत्व और अन्य विषयों को लेकर घटक दलों में नित नए-नए विवाद जन्म लेते रहते हैं, जो जनता के मन में आशंकाएं उत्पन्न करते हैं। सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस का हो रहा है। बेहतर होता यदि कांग्रेस अपने बलबूते लोकसभा चुनाव लड़ती। भाजपा ने सत्ता में आने के लिए लंबी प्रतीक्षा की, लेकिन दक्षिणपंथी विचारधारा, संगठनात्मक सुदृढ़ता, परिवर्तनशील नेतृत्व तथा अपने मूल मुद्दों को कभी नहीं छोड़ा। अंततः 2014 में उसे देश की जनता का आशीर्वाद मिला, जो अभी तक कायम है।
कांग्रेस ने लंबी अवधि तक शासन किया है । वह क्यों प्रतीक्षा नहीं कर सकती? उसे सत्ता हासिल करने में हड़बड़ी की क्या जरूरत? क्या उसे अपनी विचारधारा, संगठन, नेतृत्व और नीतिगत कमजोरियों पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं? सपा ने उत्तर प्रदेश में, वाम दलों और तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में तथा दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से उसकी राजनीतिक जमीन छीन ली । बजाय अपनी जमीन वापस लेने के कांग्रेस आइएनडीआइए के माध्यम से उन्हीं पर आश्रित होने के लिए आमादा नजर आ रही है। क्या 'कांग्रेस मुक्त भारत' के भाजपाई संकल्प को सिद्ध करने में वह खुद योगदान नहीं कर रही है? वास्तव में कांग्रेस को आइएनडीआइए से अलग रहकर भावी राजनीति पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए । लोकतंत्र में कोई पार्टी सत्ता में स्थायी रूप से नहीं रहती। कांग्रेस को इंतजार करना चाहिए और स्वयं को उस समय के लिए तैयार करना चाहिए, जब जनता को भाजपा के विकल्प की तलाश होगी। कांग्रेस का गौरवशाली इतिहास है। आखिर क्यों उसे मोदी को अपशब्द कहने और उनकी हर बात की निंदा करनी चाहिए? यदि कांग्रेस मोदी सरकार की जनप्रिय नीतियों और निर्णयों की प्रशंसा नहीं कर सकती तो उसे उनकी निंदा से बचना चाहिए। कांग्रेस को मोदी सरकार की निंदा या आलोचना करने का अधिकार है, लेकिन क्या वह जनता के मनोभावों को छू रही है? कांग्रेस नेता राहुल गांधी के कार्य, कथन और चिंतन से उनकी अपनी और पार्टी दोनों की छवि धूमिल होती है। क्या कांग्रेस में कोई नहीं जो उन्हें इसके प्रति आगाह करे ?
कांग्रेस की एक समस्या विचारधारा को लेकर है। पार्टी ने स्वयं को सदैव मध्यमार्गी वामपंथी राजनीतिक दल के रूप में पेश किया, लेकिन दक्षिणपंथी भाजपा के बढ़ते प्रभुत्व के कारण उसने ऐसे कई कदम उठाए, जो उसे 'मध्यमार्गी वामपंथी दक्षिणपंथी के रूप में पेश करते हैं। अत: कांग्रेस की 'खिचड़ी विचारधारा' हो गई है, जो प्रभावित नहीं करती। जनता को व्यापक रूप से प्रभावित करने का आधार विचारधारा ही होती है । वैचारिक स्पष्टता के अभाव में जनता उसके प्रति कैसे आकृष्ट हो ? आइएनडीआइए के जरिये कांग्रेस उस खिचड़ी विचारधारा और नया आयाम दे रही है, जो भविष्य में जनाधार बनाने में अवरोध बनेगा। एक समय पूरे देश में 'कांग्रेस- सिस्टम' था अर्थात केंद्र और राज्यों में कांग्रेस सरकारें हुआ करती थीं। क्या कांग्रेस को इस पर मंथन नहीं करना चाहिए कि किन गलतियों के कारण 'कांग्रेस सिस्टम' खत्म हो गया? आज देश 'भाजपा सिस्टम' की ओर बढ़ रहा है। केंद्र और राज्यों में तेजी से भाजपा का प्रभुत्व बढ़ने पर है।
सांगठनिक कौशल का अभाव कांग्रेस की तीसरी बड़ी समस्या है। कांग्रेस में केंद्रीकरण का बोलबाला है। लोकतंत्र की दुहाई देने वाली पार्टी आज तक आंतरिक लोकतंत्र की स्थापना नहीं कर पाई। छोटी से छोटी बात के लिए आलाकमान की ओर देखा जाता है। पूरा जीवन पार्टी के लिए खपा देने वाले कार्यकर्ताओं की पार्टी में कोई खास पूछ नहीं फिर नेतृत्व संरचना में समावेशी दृष्टि का न होना कांग्रेस की पुरानी समस्या रही है। जब तक समाज के विभिन्न घटकों को पार्टी अपने संगठन, सरकार, नेतृत्व और निर्णयन-प्रक्रिया में समुचित प्रतिनिधित्व नहीं देगी, तब तक वे आपके साथ कैसे जुड़ेंगे? जमीन पर लोग कांग्रेस समर्थक हैं, लेकिन कोई संगठन और नेतृत्व नहीं, जो उन्हें लामबंद कर अपना मतदाता बना सके । अतः वे लोग जातीय या अन्य आधारों पर दूसरे दलों की ओर खिसक गए हैं। आइएनडीआइए जैसी राजनीतिक पहल को हवा देकर कांग्रेस इस प्रवृत्ति को और सशक्त कर रही है।
सभी समस्याओं में कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या नेतृत्व को लेकर है। आखिर क्यों वह नेतृत्व को लेकर नेहरू-गांधी परिवार पर आश्रित है? सोनिया और राहुल गांधी द्वारा पार्टी संगठन की कमान संभालने के बाद अब मल्लिकार्जुन खरगे कांग्रेस अध्यक्ष हैं। पार्टी अध्यक्ष कोई भी हो, असली नेता के रूप में राहुल को ही आगे किया जा रहा है। इसके चलते पार्टी बैकफुट पर है, क्योंकि ममता बनर्जी ने राहुल का दावा कमजोर करने के लिए खरगे का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए आगे किया जो कांग्रेस की राजनीति और गेम प्लान से मैच नहीं खाता ।
ऐसे में, कांग्रेस को यह तय करना पड़ेगा कि 'मोदी- हटाओ' उसका प्राथमिक एजेंडा है या राहुल को पार्टी और सरकार बनने की स्थिति में उसका नेतृत्व देना। आइएनडीआइए में आकर कांग्रेस जनता का विश्वास अर्जित करने और देश की बागडोर संभालने के बजाय मोदी - हटाने को वरीयता दे रही है, जो राजनीतिक दृष्टि से अपरिपक्व रणनीति है। यदि कांग्रेस को लोकतांत्रिक स्पर्धा में सार्थक रूप से टिके रहना है तो उसे इन सभी गलतियों को सुधारना होगा और प्रतिस्पर्धी भाजपा की ही तरह विचारधारा, संगठन, नेतृत्व और नीतियों पर ध्यान देकर जनता से सतत संवाद एवं संपर्क साधने की कवायद करनी होगी।

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