West Bengal Opposition Alliance
प्रभाकर मणि तिवारी… विपक्षी गठबंधन (opposition alliance) में सीटों के बंटवारे का सबको इंतजार है। सबकी नजरें उत्तर प्रदेश (UP), बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और पंजाब पर टिकी हैं। इन दिनों सीटों के बंटवारे को लेकर पश्चिम बंगाल में स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई है कि सवाल खड़ा हो गया है, पश्चिम बंगाल में क्या इंडिया ब्लॉक टूट जाएगा या इतना मजबूत नहीं हो पाएगा कि वह बड़ी सफलता पा सके?
पश्चिम बंगाल में वर्ष 2021 के अहम विधानसभा चुनाव में रिकॉर्ड तोड़ जीत के बाद मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने विपक्षी दलों को एकजुट करने की दिशा में ठोस पहल की थी, पर अब लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उनके ही राज्य में इंडिया ब्लॉक के रथ के पहिए अविश्वास और आरोप-प्रत्यारोप के दलदल में धंसते लग रहे हैं। खुद ममता बनर्जी ने कहा है कि पूरे देश में इंडिया ब्लॉक लड़ेगा, पर बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ही भाजपा से मुकाबला करेगी। इसका संदेश साफ है। ममता बंगाल में दोनों सहयोगियों, यानी कांग्रेस और वामपंथी दलों के लिए एक इंच जमीन छोड़ने को भी तैयार नहीं हैं। अब ये तीनों पार्टियां एक-दूसरे पर भाजपा की मदद करने और विपक्षी गठबंधन को कमजोर करने के आरोप लगाने लगी हैं।
रअसल, बंगाल में इंडिया ब्लॉक के दलों के बीच सीटों के बंटवारे पर पेंच फंसता नजर आ रहा है। ममता बनर्जी ने कांग्रेस और सीपीआई (एम) पर भाजपा से मिलीभगत का आरोप भी लगा दिया है। उन्होंने कहा कि गठबंधन के बाद भी कांग्रेस व सीपीएम के नेता बंगाल में तृणमूल के खिलाफ अभियान चला रहे हैं।
उसके बाद पार्टी के महासचिव और प्रवक्ता कुणाल घोष ने सीपीएम पर भाजपा का दलाल होने का आरोप मढ़ दिया। घोष ने यहां तक कह दिया कि पश्चिम बंगाल के 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस को बड़ा नुकसान पहुंचाया था और उसका फायदा भाजपा को मिला था । घोष का आरोप है कि कांग्रेस राज्य में भाजपा के दलाल के तौर काम करती है। उन्होंने यह भी कहा था कि लेफ्ट के लोगों की औकात तृणमूल नेताओं के साथ बैठने की नहीं है।
राजनीतिक हलकों में इसके कई निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। तृणमूल नेताओं का कहना है कि ममता बनर्जी ने सीटों के बंटवारे के लिए 31 दिसंबर की समय-सीमा तय की थी, पर इसमें कोई पहल नहीं हो सकी है, इसलिए वह अकेले ही मैदान में उतरने का मन बना रही हैं। ममता के बयान के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने भी कह दिया कि ममता बनर्जी बंगाल में गठबंधन के पक्ष में नहीं हैं, इससे उनको नुकसान होगा और अब पार्टी अकेले अपने बूते मैदान में उतरने की तैयारी में जुटी है। चौधरी यहां तक कह चुके हैं कि वह राज्य में तृणमूल कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की कल्पना तक नहीं कर सकते। कांग्रेस ने पिछला लोकसभा चुनाव वाम दलों के साथ मिलकर लड़ा था और दो सीटें जीती थीं। उस चुनाव में वामपंथी दलों का खाता तक नहीं खुल सका था। बंगाल कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि पार्टी फिलहाल भाजपा और तृणमूल कांग्रेस से समान दूरी बनाकर चल रही है। वह राज्य में लोकसभा की कम से कम सात सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छुक है। प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता, सौम्या राय का आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच गोपनीय तालमेल है। ममता बनर्जी भाजपा से मुकाबले के प्रति गंभीर नहीं हैं। उधर, तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि बंगाल में कांग्रेस और सीपीएम का कोई आधार नहीं है।
इस बढ़ती तल्खी के बीच एक पहलू यह भी है कि पश्चिम बंगाल में 34 साल तक राज करने वाली सीपीएम भी तृणमूल कांग्रेस के साथ सीटों के तालमेल को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं है। साल 2004 के लोकसभा चुनाव में रिकॉर्ड 35 सीटें जीतने वाले वाम मोर्चे का बीते चुनाव में खाता तक नहीं खुल सका था। अब पार्टी ने अगले आम चुनाव में अकेले मैदान में उतरने का संकेत दिया है । कोलकाता में पार्टी की राज्य समिति की बैठक के बाद प्रदेश महासचिव मोहम्मद सलीम ने पत्रकारों से कहा था कि हमने यहां भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ लड़ाई जारी रखने का फैसला किया है, जो पार्टी इन दोनों से संबंध रखेगी, हम उनसे दूरी बनाकर चलेंगे।
सीपीएम ने 7 जनवरी को कोलकाता के ब्रिगेड परेड मैदान में एक इंसाफ रैली आयोजित करने का फैसला किया है। उसका मुख्य लक्ष्य साल 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन और अपने वोटबैंक को एकजुट और मजबूत करना है। उसका आरोप है, ममता बनर्जी भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मिली हुई हैं। 19 दिसंबर को विपक्षी दलों के नेताओं की बैठक के अगले दिन ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ममता बनर्जी की मुलाकात भी बहुत कुछ कहती है ।
उधर, भाजपा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जे पी नड्डा के दो दिवसीय कोलकाता दौरे के जरिये राज्य की 42 में से 35 सीटें जीतने के इरादे के साथ मिशन बंगाल का आगाज कर दिया है। वर्ष 2019 में पार्टी ने लोकसभा में शानदार प्रदर्शन करते हुए तृणमूल को करारा झटका दिया था और राज्य की 42 में से 18 सीटें जीत ली थीं। उससे पहले वर्ष 2014 में उसे महज 2 सीटें मिली थीं, पर इस बार वह राम मंदिर और नागरिकता अधिनियम जैसे मुद्दों के सहारे कम से कम 35 सीटें जीतने के लिए प्रयासरत है ।
वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले इस बार पार्टी ने अपनी रणनीति में भी व्यापक बदलाव किए हैं। इसके तहत उसने महज स्थानीय नेताओं पर भरोसा करने के बजाय चुनाव प्रबंधन करने वाली एक पेशेवर संस्था जार्विस टेक्नोलॉजी ऐंड कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड की भी सेवाएं ली हैं। साथ ही, 15 सदस्यीय चुनाव प्रबंधन समिति का भी गठन कर दिया है। केंद्रीय नेताओं ने बैठक के दौरान स्थानीय नेताओं को राज्य भर में सोशल मीडिया के जरिये प्रचार अभियान शुरू करने को कहा है, इनमें राम मंदिर, नागरिकता कानून, केंद्रीय योजनाओं और तृणमूल कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया गया है। बंगाल में भाजपा कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती
पर्यवेक्षकों के मुताबिक, इंडिया ब्लॉक में खींचतान का फायदा भाजपा को मिल सकता है, बशर्ते वह अपने पैरों तले की जमीन को मजबूत करने में कामयाब हो जाए। अब विपक्षी गठबंधन के लिए लड़ाई आसान नहीं है, मगर यदि उसने बंगाल में झगड़ा सुलझा लिया, तो विपक्षी गठबंधन बहुत मजबूत होकर उभरेगा ।
Editorial

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