Artificial intelligence
पवन दुग्गल : एक ऐसी तकनीकी क्रांति (technological revolution) हमारे दरवाजे एक पर है, जो हमारी उत्पादकता, वैश्विक विकास (global development) और आय तो बढ़ा सकती है, पर हमारी नौकरियां भी लील सकती है और असमानता की खाई चौड़ी कर सकती है।
यह मजमून अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के उस विश्लेषण का है, जिसको लेकर दुनिया भर में चिंता बढ़ गई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से दुनिया भर में 40 फीसदी रोजगार प्रभावित होंगे, जबकि विकसित देशों में यह आंकड़ा 60 फीसदी तक हो सकता है। इससे जाहिर तौर पर असमानता में वृद्धि होगी। सवाल यह है कि क्या वाकई आने वाले दिन इतने भयावह होने वाले हैं?
इसकी चर्चा बाद में, पहले ऐसी रिपोर्ट की असलियत जानने का प्रयास करते हैं। दिक्कत यह है कि ऐसी रिपोर्टें किस आधार पर तैयार की जाती हैं अथवा इसके लिए किस गणित का इस्तेमाल किया जाता है, वह स्पष्ट नहीं होता। फिर, पारदर्शिता का भी अभाव रहता है। इस कारण इनके निष्कर्षों पर पूरा भरोसा नहीं बन पाता। आईएमएफ 40 फीसदी रोजगार पर खतरे की बात कह रहा है। अगर यह सही है, तो दुनिया भर में बहुत ज्यादा उथल-पुथल मच जाएगी, और कोई भी नई तकनीक समाज में इस कदर अराजकता फैला दे, यह संभव नहीं लगता । हां, 20 से 25 फीसदी नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं, लेकिन लोगों के सामने नए विकल्प भी खूब उभरेंगे।
यह सच है कि एआई अब हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुकी है। हमें इससे भागने की आवश्यकता नहीं है। इसका प्रभाव मानव पर, मानव समाज पर और उसकी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। मगर ज्यादातर प्रभाव दुग्गल सकारात्मक होंगे, लिहाजा नकारात्मकता पर ज्यादा कान देना उचित नहीं। एआई द्वारा कई तरह के काम किए जाने के बावजूद उन कार्यों को करना मुश्किल होगा, जिसके लिए इंसानी हाथ, दिमाग, विश्लेषण और व्याख्या की जरूरत होगी। एआई को इंसानी दिमाग ने ही जन्म दिया है, तो यह मानना कि यह तकनीक मनुष्य पर हावी हो जाएगी, एक कोरी कल्पना लगती है। अलबत्ता, इसके इस्तेमाल से हम अपना जीवन कहीं अधिक सुखद बना सकेंगे।
एआई से छोटी-मोटी नौकरियों को खतरा होगा। ये वैसे काम होंगे, जिनमें बहुत ज्यादा विश्लेषण की दरकार नहीं होती। मसलन, कानूनी क्षेत्र में 'पैरालीगल', यानी सहायकों को खतरा हो सकता है। हल्के-फुल्के रिसर्च करने वाले लोग भी अपने लिए मुश्किलें देख सकते हैं। अकाउंटिंग या डाटा एंट्री करने वाले लोगों को भी एआई से दिक्कतें आ सकती हैं। एआई का तो यह प्रारंभिक स्वरूप है, जैसे-जैसे यह तकनीक विकसित होगी, अन्य क्षेत्रों में भी खतरा बढ़ता जाएगा। फिर भी, उन कामों के लिए जगह बची रहेगी, जिसके लिए इंसानी हाथ या दिमाग की दरकार होती है।
एआई की वजह से अगर नौकरियां जा रही हैं, तो नए रोजगार भी पैदा होंगे। जैसे, प्रॉम्प्ट कमांड इंजीनियरों की मांग बढ़ सकती है। ये ऐसे लोग होंगे, जो इस दिशा में काम करेंगे कि जेनरेटिव एआई की एल्गोरिदम किस तरह से बनाई जाए कि सवालों का वह सही जवाब दे या उचित खोज पेश करे। इसी तरह, विकसित एआई का सदुपयोग किस तरह से हो, उसकी सीमा क्या तय की जाए या मानव जीवन के लिए वह खतरा न बने, इस बाबत भी नए रोजगार पैदा होंगे। कहने का अर्थ है कि एआई को मॉनिटरिंग करने के लिए इंसानों की ही जरूरत पड़ने वाली है। इसके अलावा, एआई को नियमबद्ध यानी रेग्यूलेट करने के काम इंसान द्वारा ही किए जाएंगे। इसके लिए किस तरह से कानूनी प्रावधान तय किए जाने चाहिए, इसको लेकर विश्लेषकों की जरूरत पड़ सकती है। स्वास्थ्य, बैंकिंग, ई-कॉमर्स जैसे तमाम क्षेत्रों में एआई का इस्तेमाल बेशक बढ़ेगा, पर उसकी निगरानी करने वालों की जरूरत भी बढ़ेगी।
एआई के खिलाफ हम आंखें बंद नहीं कर सकते। अलबत्ता, हम एआई के साथ जितना कदम मिलाकर चलेंगे, हमारे लिए उतना ही अच्छा होगा। यह समझना होगा कि जब हमने यह नई तकनीक बनाई है, तो हमारे पास ऐसी क्षमता भी है कि इससे जो नुकसान हमें होगा, उसकी भरपाई इसकी अच्छाई से कर सकेंगे ।
भारत की बात करें, तो एआई का अधिकाधिक इस्तेमाल संगठित क्षेत्रों में होगा। इस कारण यहां भी निचले दर्जे के काम इसके हवाले किए जा सकते हैं। हालांकि, यह भी इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन सा क्षेत्र कितनी उन्नत एआई का इस्तेमाल कर रहा है। कुछ नुकसान असंगठित क्षेत्र को भी हो सकता है। विशेषकर, छोटी-छोटी कंपनियों में एआई का इस्तेमाल बढ़ सकता है। हालांकि, जिस तरह से हमारी अर्थव्यवस्था मुख्यतः असंगठित क्षेत्र पर निर्भर है, उससे यह कयास गलत नहीं लगता कि एआई हमारे यहां रोजगार को बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करेगी। इसीलिए, जिन लोगों पर खतरा है, उनको कमर कस लेना चाहिए। वे चाहें, तो बदलते परिदृश्य में खुद को प्रसांगिक बनाए रखने के प्रयास कर सकते हैं और आधुनिक तकनीक को हमराह बना सकते हैं, ताकि आसन्न चुनौतियों से निपटने में वे सक्षम हो सकें।
इसमें सरकार की भूमिका को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता। लोगों पर एआई का कितना असर पड़ सकता है, इसको लेकर उसे जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। उसे एआई को लेकर कानूनी प्रावधान भी तय करने होंगे, जिसका फिलहाल अभाव है। जाहिर है, इतना सब कुछ वह अकेले नहीं कर सकती । लिहाजा, निजी क्षेत्र को भी इस काम में आगे आना चाहिए। सार्वजनिक-निजी भागीदारी से एआई की चुनौतियां, उसके नफा-नुकसान और उसके खिलाफ खुद को मजबूत बनाने की तैयारी को लेकर लोगों को जागरूक किया जा सकता है।
हालांकि, अपने यहां 'डिजिटल इंडिया ऐक्ट' लाने की तैयारी भी चल रही है, जिसमें कई अध्याय होंगे। उम्मीद है, इसमें एआई को विनियमित करने को लेकर भी एक अध्याय होगा, हालांकि इसके बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी है, क्योंकि सार्वजनिक मंचों पर इस अधिनियम के प्रावधान उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में हमें यही मानकर आगे बढ़ना होगा कि एआई हमारी जिंदगी में चुपके से दाखिल हो चुकी है और खुद को कुशल बनाकर ही हम इसके साथ चल सकते हैं।
Editorial

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