Indian Opposition Unity
राज कुमार सिंह: राज्यों (states) के विधानसभा चुनाव परिणामों (Assembly election results) ने सत्ता के फाइनल का सीन एकदम बदल दिया है। विपक्षी दलों के गठबंधन इंडिया (Alliance india) ने जो उम्मीद जगाई थी, नवंबर हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों ने उस उम्मीद पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। सवाल इसलिए भी कि इस बीच दक्षिण भारतीय, खासकर तमिलनाडु के सत्तारूढ़ दल डीएमके के नेताओं की ओर से इंडिया की मुश्किलें बढ़ाने वाले बयान आते रहे, तो हिंदी पट्टी के तीन प्रमुख राज्यों में गठबंधन के घटक दल ही आपस में चुनावी ताल ठोकते नजर आए। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अपने दम पर भाजपा को टक्कर देती आई है। फिर भी आप सपा और जदयू ने उम्मीदवार उतारे। उनका आरोप रहा कि कांग्रेस ने गठबंधन धर्म का निर्वाह नहीं किया। 2018 में यहां भाजपा से सत्ता छीन चुकी कांग्रेस शायद अति आत्मविश्वास का शिकार हो गई।
दिक्कतों की लंबी लिस्ट
  • एकता के दिखावटी बयान काफी नहीं
  • सीट शेयरिंग पर अब तक नहीं बात
  • दक्षिण से हो रही खतरनाक बयानबाजी
असली चुनौतियां : आप, सपा और जदयू समेत छोटे दलों को मिले वोट बताते हैं कि अगर कांग्रेस ने गठबंधन किया होता तो जीत चाहे न मिलती, पर ऐसी शर्मनाक हार तो हरगिज न होती । शायद यह जरूरी से ज्यादा गठबंधन की मजबूरी का भी परिणाम और प्रमाण है कि चुनावी तल्खियों के बाद हुई इंडिया की बैठक में घटक दल सौहार्द और एकजुटता का प्रदर्शन करते दिखे। शीतकालीन सत्र में जिस तरह विपक्ष के 146 सांसदों को निलंबित किया गया, उससे एकजुटता की मजबूरी का अहसास और गहरा हुआ होगा। इसके बावजूद सच यही है कि इंडिया की असली चुनौतियां तो अब शुरू होंगी, इस नए साल में ।
जमीन का इंतजार : समन्वय समिति बनने के बाद भी पिछले तीन महीने में इंडिया दो कदम भी आगे नहीं बढ़ा। जाहिर है, एकता के प्रदर्शन के बीच भी परस्पर शह-मात का खेल जारी है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 19 दिसंबर की बैठक में जिस तरह मल्लिकार्जुन खरगे को इंडिया का प्र.म. फेस बनाने का सुझाव दिया, जिसका अरविंद केजरीवाल और उद्धव ठाकरे ने समर्थन भी किया, उसके पीछे भी यही शह-मात का खेल है। वैसे आगामी लोकसभा चुनाव में सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों के मद्देनजर खरगे अच्छा दांव हो सकते हैं। पर अब, जबकि अगले लोकसभा चुनाव बमुश्किल तीन महीने दूर हैं, इंडिया का सही मायने में एक गठबंधन के रूप में जमीन पर उतरना बाकी है।
साझा कार्यक्रम : इंडिया अपने गठन के एलान के बाद से ही सीट शेयरिंग, समन्वय और न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सहमति के दावे करता रहा है, पर सच इसके उलट है। अगर परस्पर इतनी समझदारी होती तो शायद हाल के विधानसभा चुनावों में घटक दल आपस में ही वोटों का बिखराव नहीं कर रहे होते। यह अच्छी बात है कि हिंदी पट्टी के तीन प्रमुख राज्यों में करारी हार के बाद ही सही, कांग्रेस ने संगठन की ओवरहॉलिंग शुरू की है, लेकिन उसे इंडिया के घटक दलों में समन्वय और सौहार्द बढ़ाने के लिए भी गंभीर ईमानदार प्रयास करने होंगे। चुनौती की शर्त : राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के नतीजे बताते हैं कि इस साल लोकसभा चुनाव में भाजपा के विरूद्ध साझा उम्मीदवार इंडिया की जीत की गारंटी नहीं बल्कि चुनौती देने की पहली अनिवार्य शर्त है । दक्षिण भारत में भाजपा कमजोर है, जहां से 130 लोकसभा सांसद चुने जाते हैं। पर वहां कांग्रेस का वैसा वर्चस्व नहीं है, जैसा भाजपा का सर्वाधिक सांसद लोकसभा में भेजने वाली हिंदी पट्टी में है । फिर आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे बड़े राज्यों में क्षेत्रीय दलों का दबदबा है, जिनके भाजपा से अच्छे रिश्ते हैं। जाहिर है, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस भाजपा को रोकती रही है, लेकिन उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत में विपक्ष में वास्तविक जमीनी एकता के बगैर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हैट्रिक रोक पाने की कल्पना भी मुश्किल है।
निपटाने की राजनीति: इंडिया गठबंधन के घटक दलों में सर्वाधिक अंतर्विरोध और दलगत हितों का टकराव भी इन्हीं राज्यों में है। वैसे उत्तर प्रदेश में भी एक बड़े दल बसपा का दोनों ही गठबंधनों से बाहर रहना आखिरकार भाजपा को ही चुनावी लाभ पहुंचाएगा। कांग्रेस ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाव नहीं दिया, इसलिए उत्तर प्रदेश में सपा, दिल्ली - पंजाब में आप और बिहार में जदयू उसके प्रति ज्यादा उदारता नहीं दिखाना चाहेंगी। कहना नहीं होगा कि आपस में ही एक-दूसरे को निपटाने की यह राजनीति आखिरकार इंडिया को ही निपटा सकती है। इसलिए परस्पर जोर-आजमाइश के बजाय भाजपा और उसके नेतृत्व वाले जदयू के विरूद्ध दिल और दिमाग दोनों से ही ईमानदार एकता इंडिया के बेहतर राजनीतिक भविष्य के लिए जरूरी है। अनिवार्य शर्त: जाहिर है, बड़े संयुक्त लक्ष्य को निजी राजनीतिक हितों पर वरीयता दिए बिना संयोजक, न्यूनतम साझा कार्यक्रम और सीट शेयरिंग पर भी सहमति संभव नहीं होगी। पर समय से ऐसा करना विपक्ष की विश्वसनीयता की भी अनिवार्य शर्त है, क्योंकि अतीत की विपक्षी एकताओं और बिखरावों से उसकी विश्वसनीयता लगभग रसातल में जा चुकी है। यह धारणा लगातार मजबूत होती गई है कि विपक्ष के नेता अपने सत्ता स्वार्थों के लिए ही एकजुट होते हैं, उनके पास देश और समाज के लिए कोई विजन या अजेंडा नहीं है।
जिम्मेदार आचरण : इंडिया की पिछली बैठक में सीट शेयरिंग पर 2023 के अंत तक सहमति की बात कही गई थी। 2024 आ चुका है, और सहमति का पता नहीं। विपक्ष की विश्वसनीयता और बेहतर छवि के लिए इंडिया को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि घटक दल और उनके नेता देश और समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए जिम्मेदार बयानबाजी और आचरण करें। पिछले कुछ समय में, खासकर तमिलनाडु में सत्तारूढ़ द्रमुक के नेताओं की संकीर्ण राजनीति से प्रेरित बयानबाजी ने देश के बड़े वर्ग की भावनाओं को आहत किया है। बड़े मकसद के लिए संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठने की क्षमता ही तय करेगी कि नए साल में विपक्ष और उसके जरिए देश की राजनीति को नया रूप मिलता है या नहीं ।
Editorial

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