'Leader of Opposition' stuck in fight between Gehlot and Pilot
जयपुर (कार्यालय संवाददाता)। राजस्थान में विधानसभा चुनाव परिणाम आने के 40 दिन बाद भी कांग्रेस राज्य विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता का चयन नहीं कर सकी है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव सचिन पायलट किसी एक नाम पर सहमत नहीं हैं। 19 जनवरी से शुरू हो रहे विधानसभा के सत्र से पहले इस पद को लेकर फैसला नहीं होने से कांग्रेस के विधायकों में असमंजस की स्थिति है।
प्रतिपक्ष के नेता पद के लिए कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, पंजाब के पूर्व प्रभारी हरीश चौधरी, वरिष्ठ विधायक शांति धारीवाल एवं महेंद्रजीत सिंह मालवीय में से किसी एक नाम पर फैसला होना है। इनमें पायलट चौधरी या डोटासरा को प्रतिपक्ष का नेता बनवाने चाहते हैं। गहलोत धारीवाल व मालवीय के पक्ष में हैं। गहलोत का तर्क है कि मालवीय को प्रतिपक्ष का नेता बनाने से आदिवासियों में अच्छा संदेश जाएगा। मालवीय प्रदेश के बड़े आदिवासी नेता हैं। वहीं पायलट ने पार्टी आलाकमान तक संदेश पहुंचाया है कि विधानसभा चुनाव में जाटों ने कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया है। लोकसभा चुनाव निकट भविष्य में होने हैं। ऐसे में जाट समाज को पार्टी से जोड़े रखने के लिए डोटासरा अथवा चौधरी में से किसी एक का प्रतिपक्ष का नेता बनाया जाना चाहिए। प्रतिपक्ष के नेता के साथ ही उप नेता और सचेतक को लेकर भी फैसला होना है। इनमें से एक पद किसी दलित विधायक को दिया जा सकता है।
भाजपा ने कांग्रेस पर निशाना साधा
गहलोत व पायलट के बीच चल रही खींचतान को लेकर भाजपा ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। प्रदेश के उप मुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा और भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि गहलोत व पायलट की लड़ाई के कारण कांग्रेस सरकार पांच साल सत्ता में रहने के बावजूद जनहित के फैसले नहीं कर सकी। गहलोत का पूरा कार्यकाल पायलट को नीचा दिखाने में ही गुजर गया। राजस्थान में कांग्रेस की हार के पीछे यह भी एक बड़ी वजह है। बावजूद इसके दोनों के बीच अब भी कलह जारी है। इधर, विपक्षी गठबंधन के बीच सीटों के बंटवारे और न्याय यात्रा में व्यस्त कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं।
Editorial

Editorial

Next Story