Congress's confusion on Ram temple
संजय गुप्त : अयोध्या में निर्मित हो रहे राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के आमंत्रण पर कांग्रेस ने डेढ़-दो सप्ताह विचार विमर्श करने के बाद यह फैसला लिया कि सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और अधीर रंजन चौधरी इस समारोह में नहीं जाएंगे। इस आमंत्रण को ठुकराने का फैसला करते हुए कांग्रेस ने कहा कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने प्राण प्रतिष्ठा समारोह को एक राजनीतिक आयोजन बना दिया है। उसने यह भी आरोप लगाया कि राजनीतिक लाभ लेने के लिए अधूरे मंदिर का उद्घाटन किया जा रहा है। आमंत्रण को अस्वीकार करने के कांग्रेस के ये तर्क यही बताते हैं कि उसके नेता 22 जनवरी को अयोध्या न जाने के लिए किसी आड़ की तलाश में थे। उन्होंने जिन तर्कों की आड़ ली, वे जनता को शायद ही संतुष्ट कर पाएं। इस पर हैरानी नहीं कि उक्त आमंत्रण ठुकराने पर भाजपा ने कांग्रेस पर हमला बोल दिया है।
कांग्रेस ने राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर भाजपा पर यह जो आरोप लगाया कि उसके जरिये वह राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है, वह खुद उस पर भी लागू होता है। कांग्रेस ने राजनीतिक लाभ के लिए ही इस आमंत्रण को अस्वीकार किया है। चूंकि उसकी निगाह अल्पसंख्यक और विशेष रूप से मुस्लिम मतदाताओं पर है, इसलिए उसके नेताओं ने उनकी कथित नाराजगी के भय से अयोध्या न जाने का फैसला किया। ऐसा करके उसने अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण की अपनी पुरानी राजनीति को नए सिरे से ही धार दी है। वह इस नतीजे पर पहुंची है कि नरम हिंदुत्व को अपनाने से कोई लाभ नहीं। ध्यान रहे एक समय राहुल गांधी मंदिर - मंदिर जाते थे और जनेऊ पहनकर यह बताने की कोशिश करते थे कि वह पक्के ब्राह्मण हैं। इसका उन्हें लाभ नहीं मिला और इसी कारण उन्होंने नरम हिंदुत्व की अपनी राजनीति का परित्याग किया और ऐसे बयान देने लगे कि केरल में उनकी सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग तो पूरी तरह सेक्युलर है। कर्नाटक और फिर तेलंगाना में जीत के बाद कांग्रेस को यही लगता है कि उसके लिए मुस्लिम वोटर ही महत्वपूर्ण हैं ।
कांग्रेस अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर हमेशा दुविधाग्रस्त दिखी। इस दुविधा का कारण यह रहा कि जहां कांग्रेस नेहरूजी के समय से ही धर्म को रिलिजन यानी पंथ- मजहब का पर्याय मानती रही, वहीं भाजपा जनसंघ काल से ही हिंदू धर्म को देश की संस्कृति एवं संस्कारों का स्रोत बताती रही। जहां भाजपा हिंदुत्व को भारतीयता का परिचायक मानती रही, वहीं कांग्रेस सदैव हिंदुत्व को लांक्षित करती रही । यह सही है कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हो रहा है, लेकिन उसका भव्य निर्माण इसीलिए संभव हो रहा है, क्योंकि भाजपा हमेशा मंदिर के निर्माण को लेकर संकल्पबद्ध रही। राम मंदिर निर्माण के साथ अयोध्या का चहुंमुखी विकास इसी संकल्पबद्धता का प्रमाण है। चूंकि भाजपा ने राम मंदिर के निर्माण को सदैव अपनी प्राथमिकता में रखा, इसलिए जनता यह समझ रही है कि उसकी प्रतिबद्धता के कारण ही अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण का सपना साकार हो रहा है। यदि राम मंदिर का उद्घाटन बाद में होता तो भी जनता भाजपा के योगदान को याद करती। कांग्रेस कुछ भी कहे, वह भाजपा से राम मंदिर के निर्माण का श्रेय नहीं ले सकती। भले ही अन्य दलों के लिए अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण एक राजनीतिक मुद्दा रहा हो, लेकिन भाजपा के लिए वह सदैव देश की अस्मिता, संस्कृति एवं सभ्यता के पुनरूत्थान का विषय रहा। हिंदुत्व भाजपा के डीएनए में है और ऐसा दल अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के प्रति समर्पण न दिखाएगा तो क्या करेगा?
राम मंदिर को लेकर कांग्रेस शुरू से ही भ्रमित रही है। राजीव गांधी ने शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद से पलटने के बाद जब यह महसूस किया कि हिंदू समाज को यह संदेश गया है कि उनकी सरकार ने मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे समर्पण कर दिया तो उन्होंने अयोध्या में विवादित ढांचे का ताला खुलवाने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने विवादित ढांचे के निकट राम मंदिर के निर्माण का शिलान्यास कराया और 1989 के आम चुनाव के प्रचार की शुरूआत अयोध्या के निकट से ही करते हुए देश में रामराज्य की स्थापना पर बल दिया। इससे बात बनी नहीं, क्योंकि हिंदू समाज की सदियों पुरानी इस आकांक्षा की अनदेखी की गई कि राम के नाम का मंदिर उनके जन्म स्थान यानी वहां पर ही बने, जहां मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाई गई थी। हिंदू समाज ने कांग्रेस पर भरोसा इसलिए भी नहीं किया, क्योंकि वह इससे अवगत था कि नेहरूजी किस तरह इसके पक्ष में नहीं थे कि सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार हो । जैसे हिंदू समाज राजीव गांधी के रामराज्य लाने के वादे से प्रभावित नहीं हुआ था, वैसे ही वह राहुल गांधी के मंदिर मंदिर जाने से भी प्रभावित नहीं हुआ। हिंदू समाज को यही लगा कि वह उसके वोटों के लिए दिखावा कर रहे हैं ।
इन दिनों कांग्रेस के साथ अन्य अनेक दल भाजपा पर राम मंदिर को लेकर राजनीति करने का आरोप लगाते हुए प्राण प्रतिष्ठा समारोह के आमंत्रण को ठुकरा रहे हैं। वे ऐसा राजनीतिक कारणों से ही कर रहे हैं और यह मानकर चल रहे हैं कि मुस्लिम समाज को उनका अयोध्या जाना नहीं भाएगा। पता नहीं वे किस आधार पर इस नतीजे पर पहुंच रहे हैं? जो भी हो, कांग्रेस और उसके साथ खड़े दलों ने राजनीतिक कारणों से प्राण प्रतिष्ठा समारोह के आमंत्रण को ठुकराकर भाजपा को इसके लिए अवसर ही प्रदान किया है कि वह अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण की उनकी राजनीति की पोल खोले। इसके चलते इन दलों को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़े तो हैरानी नहीं। इस समय राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर पूरा देश राममय है। जगह-जगह शोभा यात्राएं निकल रही हैं और चारों ओर हर्ष का माहौल है। इस माहौल की अनदेखी कर जो राजनीतिक दल राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह के आमंत्रण को ठुकरा रहे हैं, वे अपना ही नुकसान कर रहे हैं। यह कहने से बात बनने वाली नहीं है कि धर्म व्यक्तिगत मामला है और प्रभु राम बुलाएंगे तो हम पहुंच जाएंगे।
Editorial

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