India united by Ram, but Congress's political moves may backfire
सुरेंद्र किशोर : इस समय पूरा देश राममय है। इस माहौल में कांग्रेस की प्रस्तावित भारत जोड़ो न्याय यात्रा आरंभ होने वाली है। साथ ही आइएनडीआइए के साथियों के साथ वह सीटों के बंटवारे पर भी बातचीत कर रही है। देश इस समय जिस राम धुन में रमा हुआ है, उसे देखते हुए लगता नहीं कि कांग्रेस का इन दोनों में से कोई भी दांव कारगर साबित हो पाएगा। आप चाहे कितनी राजनीतिक यात्राएं निकाल लें या उम्दा रणनीति बना लें, यदि आम जन को आपकी मंशा पर भरोसा नहीं तो कुछ भी आपके पक्ष में नहीं घटित होगा। बेहतर होगा कि कोई भी दल या नेता यह देखे कि जनता के समक्ष मुख्य समस्याएं कौन सी हैं ? नेता के पास उन समस्याओं का हल है भी या नहीं, जो लंबी यात्रा करके लोगों के पास जाते हैं। अभी देश के समक्ष मुख्य समस्याएं हैं भ्रष्टाचार और आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा का संकट । पिछली घटनाएं बताती हैं कि इन दो मुख्य समस्याओं का समाधान न तो राहुल गांधी के पास है और न ही इस दल के किसी अन्य नेता के पास इसके बावजूद वह 14 जनवरी से अपनी दूसरी यात्रा शुरू करने जा रहे हैं। इस यात्रा की सफलता की गुंजाइश और भी कम लगती है, क्योंकि इस बार जहां-जहां से वह गुजरेंगे, वे सामान्यतः गैर-कांग्रेस शासित प्रदेश हैं। उनकी पहली यात्रा की उपलब्धियों के आंकड़ों पर गौर करें। उस दौरान मध्य प्रदेश में राहुल गांधी 21 विधानसभा चुनाव क्षेत्रों से गुजरे । उन 21 में से कांग्रेस को सिर्फ 4 में जीत मिली। राजस्थान के 12 विधानसभा चुनाव क्षेत्रों से गुजरे। उनमें कांग्रेस को 9 सीटों पर जीत मिली। तेलंगाना में राहुल 29 विधानसभा क्षेत्रों से गुजरे। उनमें से कांग्रेस को 12 सीटें मिलीं। हालांकि तेलंगाना की जीत में कई और पहलुओं ने प्रभावी भूमिका निभाई।
देश के अधिकांश नेता ड्राइंगरूम राजनीति में विश्वास रखते हैं, लेकिन राहुल गांधी ने कम से कम सड़कों पर उतरने की तो सोची, किंतु उनकी रणनीति सही नहीं रही । उन्होंने कई विवादास्पद लोगों से मुलाकात कर अपने और पार्टी के लिए समस्याएं बढ़ाईं। वहीं चुनावी गठजोड़ भी पार्टी के लिए काम नहीं कर पा रहे। धरातल पर जहां दो दलों के कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच पहले से संघर्ष होते रहे हों, वहां चुनाव के लिए की गई दलीय एकता का लाभ संबंधित दलों को नहीं मिल पाता। कई बार तो नतीजे उलटे आ जाते हैं। आगामी लोकसभा चुनाव में भी जहां-तहां इसकी पुनरावृत्ति संभव है।
2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा ने तालमेल करके चुनाव लड़ा। बसपा को लोकसभा की 10 सीटें मिलीं, जबकि सपा को सिर्फ 5 सीटें कई क्षेत्रों में सपा समर्थकों ने तो बसपा उम्मीदवारों को वोट दे दिए, लेकिन बसपा समर्थकों ने सपा के उम्मीदवारों को वोट नहीं दिए । यह बात छिपी नहीं कि पिछले वर्षों में सपा और बसपा के बीच कितना तनाव और संघर्ष का इतिहास रहा । कई बार पुराने घाव जल्दी भरते नहीं । बंगाल में कांग्रेस- वाम दलों के गठबंधन की भी ऐसी ही परिणति हुई। बंगाल में वर्षों तक माकपा और कांग्रेस समर्थकों के बीच हिंसक झड़पें होती रहीं । पीड़ित पक्ष कांग्रेस थी, जैसे उत्तर प्रदेश में पीड़ित पक्ष बसपा । इसलिए माकपा समर्थकों ने तो कांग्रेस उम्मीदवारों को वोट दे दिए, पर माकपा शासन में हिंसा पीड़ित कांग्रेस समर्थकों ने माकपा को कम ही वोट दिए। ऐसे अतीत को देखते हुए आइएनडीआइए का भविष्य बहुत संभावनाएं जगाने वाला नहीं दिखता। उनके लिए शुरूआती संकेत भी अच्छे नहीं दिख रहे । सीटों पर अगर कुछ सहमति बन भी जाए तो बूथ स्तर पर पूर्ण तालमेल में तमाम दिक्कतें आएंगी यदि सीमित क्षेत्रों में गठबंधन हो भी जाए तो उसकी सफलता कई बातों पर निर्भर करेगी। देखिए कि किन-किन राज्यों में उत्तर प्रदेश और बंगाल की तरह विभिन्न दलों के बीच आपसी कटुता वाली स्थिति रही है। इन राज्यों में आइएनडीआइए में शामिल दलों का अघोषित रूप से परस्पर लगाव नहीं रहा है। इसी आधार पर यह सवाल उठता है कि वहां अंकगणित कारगर होगा या रसायनशास्त्र । इतना ही नहीं, राम मंदिर को लेकर इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा के विरोधी और अटपटे बयान सुर्खियों में रहे और अब तो कांग्रेस नेताओं ने राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में जाने से इन्कार कर दिया। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी आमंत्रण ठुकरा दिया है। इसी बीच हिंदू देवी- देवताओं के खिलाफ अक्सर बयान देने वाले राजद विधायक फतेह बहादुर सिंह ने पटना में एक पोस्टर लगाया। इसमें लिखा गया कि 'मंदिर का मतलब मानसिक गुलामी और स्कूल का मतलब प्रकाश होता है।' राम मंदिर के विरूद्ध विपक्षी दलों का यह प्रलाप तब हो रहा है, जब वहां 22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होनी है।
हालांकि उन बयानों का लाभ भाजपा को मिलता रहा है। इस बार भी वही स्थिति है, क्योंकि राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर देश में भारी उत्साह देखा जा रहा है। वह खुशी किसी जातीय दायरे में बंधी हुई नहीं है। राजद के वोट बैंक के दायरे वाले अनेक लोगों को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि लोकसभा चुनाव में हम मोदी को वोट देंगे और बिहार विधानसभा चुनाव हम तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए राजद को वोट देंगे।
पटना में एक तरफ राम मंदिर विरोधी पोस्टर लगा तो वहीं नए साल के पहले दिन ही करीब दो लाख श्रद्धालुओं ने पटना जंक्शन के पास स्थित महावीर मंदिर में पूजा-अर्चना की। यह स्पष्ट है कि सभी दो लाख श्रद्धालु सवर्ण नहीं थे। इस मामले राजद के प्रवक्ता ने यह कहकर सफाई जरूर दी कि इस पोस्टर का राम मंदिर से कोई संबंध नहीं है। ऐसी ही सफाई कांग्रेस प्रवक्ता ने सैम पित्रोदा के राम मंदिर के संबंध में आई टिप्पणी पर दी। जयराम रमेश ने कहा कि पित्रोदा का बयान कांग्रेस के आधिकारिक रूख को प्रतिबिंबित नहीं करता । कांग्रेस की यह शैली पुरानी है। पिछले कुछ वर्षों में जब- जब दिग्विजय सिंह और मणिशंकर अय्यर जैसे नेताओं ने विवादास्पद बयान दिए तो कांग्रेस के प्रवक्ता ने यही कहा कि वे उनके निजी बयान हैं।
Editorial

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