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दक्षिण एशिया में हमारी बड़ी अहमियत
By EditorialPublished on
संजय के भारद्वाज : दक्षिण एशियाई देश एक ही सभ्यता और संस्कृति के हिस्से हैं, इसलिए उनमें सामाजिक, जातीय, भाषायी और सांस्कृतिक संबंध काफी गहरे हैं। इस जुड़ाव के कारण उनकी एक-दूसरे पर निर्भरता तो है ही, साथ-साथ, किसी एक देश में होने वाला राजनीतिक बदलाव भी अन्य देशों की सियासत को प्रभावित करता है।

संजय के भारद्वाज : दक्षिण एशियाई देश एक ही सभ्यता और संस्कृति के हिस्से हैं, इसलिए उनमें सामाजिक, जातीय, भाषायी और सांस्कृतिक संबंध काफी गहरे हैं। इस जुड़ाव के कारण उनकी एक-दूसरे पर निर्भरता तो है ही, साथ-साथ, किसी एक देश में होने वाला राजनीतिक बदलाव भी अन्य देशों की सियासत को प्रभावित करता है। हालांकि, इस निर्भरता का एक नैसर्गिक प्रतिफल यह है कि यहां के राजनीतिक समूहों का एक बड़ा हिस्सा भारत का समर्थन करता है, जबकि छोटा धड़ा अपने सियासी फायदे के लिए इसका विरोध करता है। समर्थन करने वाले गुटों का मानना है कि चूंकि उनमें सामाजिक, भाषायी या जातीय समानता है, इसलिए उनको भारत के साथ मिलकर काम करना चाहिए, जबकि विरोधी गुट भारत की अनदेखी करने की लाइन लेते हैं।
मालदीव - प्रकरण इसी का ज्वलंत उदाहरण है। नए राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू 'इंडिया आउट' के नारे के साथ चुनाव में उतरे थे। ऐसे में, वह भारत-विरोधी राजनीति का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इसमें उन्हें चीन जैसी ताकतों का सहारा मिल रहा है। मुइज्जू ने पद संभालते ही सबसे पहले 75 भारतीय सैनिकों को वापस लौटाने की बात कही, फिर भारत के साथ किए गए कई समझौतों से पीछे हटने की बात की। मालदीव पर चीन का बड़ा कर्ज है। मुइज्जू अभी चीन की यात्रा पर हैं, जबकि पूर्व के सभी राष्ट्रपति चुनाव के बाद पहले भारत आते थे। हालांकि, ऐसा करते हुए वह शायद भूल गए कि मालदीव और भारत में अच्छे रिश्ते रहे हैं। चुनाव में भी उन्हें इसलिए जीत मिली, क्योंकि भारत का साथ चाहने वाले राजनीतिक दलों में एकता नहीं बन सकी। इतना ही नहीं, मालदीव जाने वाले पर्यटकों में सबसे अधिक संख्या भारतीयों की है। हर साल करीब दो लाख भारतीय पर्यटक मालदीव पहुंचते हैं, जिसके बाद रूस और चीन का स्थान आता है। ताजा विवाद के बाद कई भारतीयों ने मालदीव न जाने की इच्छा प्रकट की है। यह माले के लिए सुखद स्थिति नहीं होगी, खासकर यह देखते हुए कि उसकी जीडीपी में पर्यटन क्षेत्र की हिस्सेदारी 60 फीसदी है ।
दरअसल, पड़ोसी देशों के साथ भारत की विदेश नीति के तीन उद्देश्य हैं। पहला, सुरक्षा भारत पड़ोसी देशों में भी सुरक्षा और स्थायित्व का पक्षधर है। इसका मतलब है कि पड़ोसी देशों में आंतरिक असुरक्षा तो न ही हो, साथ ही, अन्य देशों की वहां मौजूदगी भारत व स्वयं उस देश को कोई खतरा न हो। दूसरा उद्देश्य है, आर्थिक विकास । भारत अपने साथ-साथ पड़ोसी देशों का विकास भी चाहता है। अगर पड़ोसी देशों में आर्थिक अस्थिरता आती है, तो स्वाभाविक ही भारत के सामने भी चुनौतियां बढ़ सकती हैं । जैसे, श्रीलंका में आर्थिक संकट गहराने से भारत में शरणार्थी समस्या बढ़ सकती है या फिर बांग्लादेश का संकट हमारे लिए सुरक्षा चिंता व मजहबी कट्टरता का जोखिम पैदा कर सकता है। तीसरा उद्देश्य है, राजनीतिक स्थिरता । अगर यह स्थिरता बेपटरी होगी, तो दक्षिण एशिया की राजनीति में बाहरी हस्तक्षेप बढ़ेगा, जिससे भारत के खिलाफ खतरे बढ़ने का अंदेशा गहरा सकता है।
भारत इन्हीं नीतियों पर आगे बढ़ रहा है। हालांकि, मालदीव के साथ ताजा विवाद में उसे कुछ सतर्क रहने की जरूरत है। दरअसल, मालदीव में करीब 98 फीसदी आबादी सुन्नी मुसलमानों की है और पाकिस्तान काफी दिनों से वहां अलगाववाद को खाद-पानी देने का प्रयास कर रहा है। मालदीव पर ज्यादा दबाव बनाने से पाकिस्तान को अपना हित साधने का मौका मिल सकता है। इससे वहां भारत विरोधियों को मौका मिल जाएगा, जो भारतीय कूटनीति के लिए ठीक नहीं।
रही बात बांग्लादेश की, तो वहां पर भी भारत उसी जमात के साथ है, जो प्रगतिशील है । बीएनपी जैसी पार्टियों ने वहां चुनावों का बहिष्कार जरूर किया, लेकिन यह उनकी मजबूरी भी थी । अवामी लीग ने नई दिल्ली के साथ मिलकर अवाम का विश्वास जीता है । आज बांग्लादेश में भारत कई परियोजनाएं चला रहा है, जिससे वहां आर्थिक समृद्धि आई है। मानव विकास के सूचकांकों में तो उसका प्रदर्शन दक्षिण एशियाई देशों में काफी बेहतर है। इससे वहां भारत-विरोधी भावना स्वतः कमजोर हो जाती है। उम्मीद है कि शेख हसीना की वापसी से हमारा रिश्ता और मजबूत बनेगा ।
वास्तव में, दक्षिण एशिया में पाकिस्तान ही एकमात्र ऐसा देश है, जिसका जन्म भारत- विरोध के नाम पर हुआ है। उसके राजनीतिक दल भारत-विरोधी मुद्दे को ही आगे बढ़ाते हैं और अपने सियासी फायदे के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं । उसकी फौज भी भारत विरोधी राग अलापती है। अगले महीने वहां भी आम चुनाव होने वाले हैं, और कयास यही है कि वही दल सत्ता में बैठेगा, जिसे फौज का साथ मिलेगा। परोक्ष रूप से भारत विरोधी सोच ही वहां सत्ता में आएगी ।
ऐसे में, हमें पड़ोसी देशों के प्रति अपनी नीति का विश्लेषण करना चाहिए, जो हम वक्त-वक्त पर करते भी रहे हैं। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पड़ोसी देशों के साथ सह-अस्तित्व की वकालत करते थे, जबकि इंदिरा गांधी पारस्परिक संबंधों की । 90 के दशक के बाद, जब शीत युद्ध का अंत हुआ, प्रधानमंत्री इंदर कुमार गुजराल ने सुनिश्चित किया कि पड़ोसी देशों को उनकी अपेक्षा से अधिक दिया जाए। इसका लाभ भी हमें मिला। बांग्लादेश के साथ गंगाजल संधि और नेपाल के साथ महाकाली समझौता इसी की देन है । मनमोहन सिंह भी इसी नीति पर आगे बढ़े। मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'पड़ोसी प्रथम' पर भरोसा किया है। इसके तहत बहुपक्षीय संगठनों की वकालत की गई और बुनियादी ढांचे के विकास पर काम शुरू किया गया। संसाधनों के बंटवारे की बात हो या आपसी समझ बनाने की, पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधारने के लिए समग्र प्रयास किए गए हैं।
मगर दिक्कत यह है कि पड़ोसी देशों में हमारी कई परियोजनाएं देरी से चल रही हैं, जिनमें तेजी लानी होगी। इसी तरह, हमें राष्ट्रीय हितों को स्थानीय हितों से अधिक तवज्जो देना होगा। मसलन, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से तालमेल नहीं बन पाने के कारण तीस्ता जल समझौता नहीं हो सका। सरकार के स्तर पर तो हमने पड़ोसी देशों के साथ कई तरह के संबंध बनाए हैं, अब आम लोगों के स्तर पर संबंधों को आगे बढ़ाना होगा। सबसे महत्वपूर्ण है, आम जनमानस की सोच बदलना। मालदीव में 'इंडिया आउट' इसलिए चर्चित हुआ, क्योंकि सोशल मीडिया पर इसे खूब प्रसारित किया गया था। अगर दोनों देशों के लोगों के बीच आपसी संबंध मजबूत होते, तो भारत - विरोधी ऐसी सोच परवान ही नहीं चढ़ पाती ।

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