BJP's big bet on 2024 India election

शेखर अय्यर : 'इंडिया' गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर चल रही खींच-तान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने गठबंधन का चेहरा पेश करने में असमर्थता के चलते आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को जीतने से रोक पाना विपक्षी गठबंधन के लिए दुर्गम चुनौती बन गया है। चुनौती की विकटता इससे समझी जा सकती है कि हममें से कई आगामी चुनाव को ऐसी स्पर्धा मान रहे हैं, जिसमें 'इंडिया' गठबंधन ने अब तक पहला कदम भी नहीं बढ़ाया है, जबकि भाजपा मंजिल पर दस्तक दे रही है। लेकिन एक व्यक्ति ऐसा कभी नहीं सोचेगा, और वह हैं प्रधानमंत्री मोदी।
आगामी अप्रैल-मई में होने वाले 18वें लोकसभा चुनाव में लगातार तीसरे कार्यकाल की तरफ बढ़ रहे नरेंद्र मोदी विपक्षी गठबंधन की तरफ से आने वाली हर चुनौती को, चाहे वह कितनी ही मामूली क्यों न हो, पूरी सतर्कता और गंभीरता से ले रहे हैं। नरेंद्र मोदी की तरफ से भाजपा को साफ निर्देश है कि विपक्षियों पर पूरी नजर रखें और उन्हें किसी भी हाल में अनियंत्रित न होने दें। इसलिए, वह चाहते हैं कि भाजपा उनके लिए वोट जुटाने के उद्देश्य से पूरी ताकत से काम करे। यही वजह है कि भाजपा की चुनाव- प्रबंधन रणनीति में विपक्ष के हर हमले का, वह कितना ही कमजोर क्यों न हो, मुंहतोड़ जवाब देने का संदेश जरूर शामिल होगा।
चुनावी अभियानों में केंद्रीय मंत्रियों के जमावड़े और भाजपा की तरफ से खासकर ग्रामीण व शहरी गरीबों, महिलाओं, युवाओं और किसानों तक लक्षित ढंग से अपने संदेश |पहुंचाने की व्यापक मुहिम देखने को मिले, तो हैरत नहीं होनी चाहिए। विभिन्न रणनीतिक सत्रों में मोदी अपनी पार्टी के नेताओं से लगातार कह रहे हैं कि उन्हें भारत के विकास की कहानी को लेकर जनता तक पहुंचना चाहिए और विपक्षियों की किसी भी चाल को हल्के में नहीं लेना चाहिए, चाहे वह 15 राज्यों की 100 लोकसभा सीटों को छूने वाली राहुल गांधी की नई यात्रा ही क्यों न हो।
मोदी का भाजपा के रणनीतिकारों को संदेश साफ है कि नए और प्रभावशाली जनादेश के साथ सत्ता में लौटने के लिए हर मतदाता और हर राज्य महत्वपूर्ण है। चाहे उम्मीदवारों का चयन करना हो या क्षेत्रवार मुद्दे उठाने हों, अमित शाह की सीधी निगरानी में दोहरी जांच की व्यवस्था लागू की गई है। जब सब कुछ केंद्रीय नेतृत्व को ही करना है, तो मुमकिन है कि पार्टी के लोग आरामतलब और मनचाहे नतीजों के लिए प्रधानमंत्री की शख्सियत पर निर्भर हो जाएं। पर मोदी ऐसा होने नहीं देंगे। उन्होंने भाजपा के लिए ज्यादा संभावनाएं न रखने वाले राज्यों में भी दिखाया है कि वह कितनी ज्यादा कोशिशें करते हैं। तमिलनाडु के त्रिची में और केरल के त्रिशूर में उनकी सभाओं को ही देखें। इन राज्यों में मोदी ने हिंदुत्व के बजाय अपने विकास के एजेंडे के जरिये स्थानीय मतदाताओं से जुड़ने की कोशिश की। हां, थोड़ा-सा हिंदू पुट केवल क्षेत्र की आध्यात्मिक विरासत की ओर इशारा करने तक सीमित जरूर था ।
उल्लेखनीय है कि पिछले कई वर्षों से भाजपा केरल और तमिलनाडु में जमीनी स्तर पर काम कर रही है, इससे बेफिक्र कि उसे मिल रहा समर्थन संसद या राज्य विधानसभाओं में सीटों में तब्दील हो रहा है या नहीं। जाहिर है कि एक अथक प्रचारक के रूप में मोदी समय और ऊर्जा का निवेश करने को तब भी तैयार हैं, भले ही रिटर्न की गारंटी न हो। मोदी ने अमित शाह और दूसरे चुनावी योद्धाओं को एहसास दिलाया है कि आगामी चुनाव में भाजपा के लिए दूसरे दलों की तुलना में दांव कहीं ज्यादा बड़ा है। 2024 में जीत भाजपा के लिए एक नए युग का द्वार खोलेगी, जो अगले एक दशक के लिए पार्टी को निर्विवाद रूप से सबसे आगे खड़ा कर देगी।
नरेंद्र मोदी के अनुसार, यही वह समय होगा, जब देश के लिए सबसे अच्छी चीजें होनी तय हैं और 2047 तक सौ वर्ष के हो चुके आजाद भारत में भाजपा ही देश में महत्वपूर्ण बदलावों की अग्रदूत के रूप में देखी जाएगी। सभी भाजपा विरोधी वोटों को एकजुट करने में विपक्ष कई चुनौतियों से जूझ रहा है। कुछ राज्यों में गठबंधन सहयोगी एक-दूसरे के विरोधी हैं, जिनमें से ज्यादातर एक खास क्षेत्र या सामाजिक समूह तक सीमित हैं, जो सहयोगियों को वोट हस्तांतरित करने की ताकत भी नहीं रखते। विपक्ष जहां नेतृत्व व आपसी संवाद के मुद्दे पर अनिश्चित है, और सिर्फ एक बात की रट लगा रहा है कि भाजपा की सीटें कम करके मोदी को रोकना होगा, वहीं, नरेंद्र मोदी की अपनी पार्टी पर पूरी पकड़ है।
पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल और विपक्षी कांग्रेस व माकपा सीटों को लेकर एक-दूसरे के दावों पर सवाल उठा रहे हैं। महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी के सबसे बड़ा घटक होने का दावा कर रही उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने 23 सीटों पर दावा किया है, जबकि बाकी 25 सीटें कांग्रेस और एनसीपी के बीच बंटेंगी। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। ऐसे में, कांग्रेस व गठबंधन के दूसरे सहयोगियों की स्थिति की आसानी से कल्पना की जा सकती है।
चुनावी विश्लेषक 2024 के लोकसभा चुनाव को कांग्रेस के लिए अस्तित्व की लड़ाई मान रहे हैं। उनके लिए यह बनाओ या वाली स्थिति है। 2019 में भाजपा ने अपने दम पर 303 सीटें जीती थीं, जो 2014 की 282 सीटों से ज्यादा थीं। जबकि कांग्रेस को 52 सीटें मिली थीं। 2019 में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के पास 332 सांसद थे और 'इंडिया' गठबंधन के मौजूदा 28 सदस्यों के पास 144 सीटे थीं। लेकिन 2019 के बाद से एनडीए की संरचना में बड़े बदलाव हुए हैं। अन्नाद्रमुक, जदयू और अकाली दल जैसे क्षेत्रीय दल उसका साथ छोड़ चुके हैं।
फिर भी, 543 सदस्यीय लोकसभा की वर्तमान संरचना दर्शाती है कि 319 सांसदों के साथ एनडीए, 139 सीटों वाले 'इंडिया' गठबंधन से काफी आगे है। मौजूदा एनडीए सदस्यों का 2019 में संयुक्त वोट शेयर करीब 40 फीसदी था, जबकि 'इंडिया' गठबंधन के सहयोगियों को 35 फीसदी वोट मिले थे। नरेंद्र मोदी का सपना 350 से ज्यादा सीटें और 40 से 50 फीसदी वोट शेयर पाने का है। जाहिर है कि वह अब तक की उपलब्धियों को लेकर संतुष्ट नहीं बैठेंगे और यकीनन एक नए कीर्तिमान की ओर बढ़ना चाहेंगे।
Editorial

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