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अलास्का जहाज यात्रा 16 : ग्लेशियरों के पिघलने की भयावहता से परिचय
By EditorialPublished on
नदी देख कर वापस उपर आये सभी लोग गाड़ी में बैठ गये तभी ड्राइवर ने सड़क के किनारे स्थित एक बहुत ऊंचे पेड़ की तरफ इशारा करते हुए बताया कि देखो ईगला ईगल का नाम सुनते ही सब वापस गाड़ी से उतरे। ईगल से मैं चील ही समझता था, मैं सोचने लगा चील को क्या देखना, फिर खयाल आया कि यह भी कोई उल्लू दिखाने जैसा तो कोई मजाक नहीं। मुनीश ने बताया कि भारत में जो चील हम देखते हैं उसे काईट कहते हैं। इंगल तो गरूड़ होता है चार गुना बड़ा होता है। गरूड़ अमेरिका का राष्ट्रीय पक्षी है। यह अमेरिक राजकीय कर्म का प्रतीक चिन्ह है। हर सरकारी द

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नदी देख कर वापस उपर आये सभी लोग गाड़ी में बैठ गये तभी ड्राइवर ने सड़क के किनारे स्थित एक बहुत ऊंचे पेड़ की तरफ इशारा करते हुए बताया कि देखो ईगला ईगल का नाम सुनते ही सब वापस गाड़ी से उतरे। ईगल से मैं चील ही समझता था, मैं सोचने लगा चील को क्या देखना, फिर खयाल आया कि यह भी कोई उल्लू दिखाने जैसा तो कोई मजाक नहीं। मुनीश ने बताया कि भारत में जो चील हम देखते हैं उसे काईट कहते हैं। इंगल तो गरूड़ होता है चार गुना बड़ा होता है। गरूड़ अमेरिका का राष्ट्रीय पक्षी है। यह अमेरिक राजकीय कर्म का प्रतीक चिन्ह है। हर सरकारी दस्तावेज पर इसकी होती है। जिस तरह हमारे यहां अशोक चिन्ह है उसी तरह अमेरिका में ईगल है।
ईगल यहां बहुत कम नजर आते हैं। हमारे यहां की चील, बाज और सभी एक ही परिवार के पक्षी हैं। अमरीकी गरूड़ दो ढाई फुट ऊंचा होता है इ एक पंख तीन फीट का तथा जब यह उड़ता है तो यह 6-7 फुट का हो जाता है। अमरीकी गरूड़ को बाल्ड इंगल कहते हैं क्यूंकि इसका सिर गंजा होता है, पीली तथा गर्दन तक यह सफेद रंग का होता है. उसके नीचे गहरे भूरे रंग का।
सभी लोग गरूड़ को देखकर बहुत प्रसन्न हो गये। वहीं गरूड़ का घोंसला भी नजर आ रहा था, यह बहुत बड़ा था और एक पिटारे जैसा लग रहा था। मुनी कह रहा था कि वह इतने साल से अमेरिका में है मगर उसने पहली बार यहां गरुड़ पक्षी देखा है।
थोड़ी ही देर में हम एयरपोर्ट पहुँच गये। यह छोटा एयरपोर्ट ही था। नियि व्यावसायिक उड़ानों हेतु बड़ा एयरपोर्ट अलग था। यहां छोटे निजि विमान और खास करके हेलीकोप्टर ही उड़ते नजर आ रहे थे। हम गाड़ी से उतरे तो आसमान में एक साथ कई हेलीकोप्टर उड़ते नजर आये एयरपोर्ट का टर्मिनल अलग था जो छोटे विमानों के यात्रियों के लिये रहा होगा। हमें पास ही एक अन्य बिल्डिंग में ले जाया गया। यहां पर पहले से ढेर सारे लोग मौजूद थे। एक कोफी शोप जिसमें हल्का फुल्का नाश्ता भी मिल रहा था तथा एक गिफ्ट शोप इस छोटी सी बिल्डिंग में भी थी।
जाते ही हमें वहां लगी कुर्सियों पर बिठा दिया गया। यहां पहले से ही कुछ लोग बैठे थे। कमरे के दूसरी तरफ कुछ लोग अपने जेकेट-जूते वगैरा उतार रहे थे तो कुछ लोग पहन भी रहे थे। सबसे पहले हमारे टिकट चेक कर उनकी सूची से मिलाये गये। प्रत्येक हेलीकोप्टर में 6 लोग ही बैठ सकते थे, इन सबका वजन भी हेलीकोप्टर की भार क्षमता से कम होना जरूरी था। हेलीकोप्टर में बैठने की दो कतारें थी। इन कतारों में बैठने वालों का भी वजन समानुपातिक होना जरूरी था । उडते समय आगे पीछे कहीं भी वजन कम ज्यादा हो तो हेलीकोप्टर का बिगड़ जाता है और यह डगमगाने लगता है। इस हेतु टिकट बुक कराते वक्त प्रत्येक यात्री का वजन पूछ लिया जाता है। भारत में जब मुनीश का फोन आया और उसने मेरा वजन पूछा था तब मैं हैरत में पड़ गया था कि वजन क्यू पूछ रहा आ जाकर समझ आया कि इतने पहले उसने वजन क्यूं पूछा था।
यात्रियों के वजन के अनुसार ही हेलीकोप्टर में बैठने वाले छांटे जाते हैं। एक के सदस्यों को एक साथ तो रखते ही हैं मगर उनको भी वजन के अनुसार आगे बिठाते हैं। हमारा चार लोगों का ग्रुप था, हमारे साथ दो अन्य लोग कौन जायेंगे नेही तय कर लिया गया था। किसी ग्रुप में सभी मोटे लोग हो जाते तो फिर उन्हें वजन के अनुसार अलग अलग बांटा जाता है। अब हम सभी लोगों को सुरक्षा निर्देश तथा आपातकालीन स्थिति का प्रशिक्षण दिया गया। इस हेलीकोप्टर यात्रा जो स्पोर्ट्स खरीदे थे वो पर्याप्त नहीं थे। उपर भारी बर्फ के उपर चलना था इसलिये सभी यात्रियों को यहां से बड़े बड़े गम बूट्स दिये जा रहे थे जो घुटनों के नीचे पिण्डलियों तक आते थे। ये जूते पहले से पहने हुए जूतों के उपर ही पहनने थे। ने अपने अपने जूतों सहित ये जूते पहन लिये थोड़ी सी चलने में कठिनाई • महसूस हो रही थी मगर यह अनिवार्य था।
अब सभी यात्रियों के कपड़े चेक किये गये। सबको जेकेट, टोपे, ग्लब्स, इमे वगैरा पहनना जरूरी था। बर्फ के उपर चमचमाते सूरज की रोशनी से आंखें धिया जाती है इसलिये सबको काले चश्में पहनना जरूरी था। जिस किसी के पास चश्मा, ग्लव, जेकेट नहीं था उसे यहां से दिया जा रहा था। हमारे पास तो सब मगर राजा का बिना ह्ड का जेकेट रिजेक्ट हो गया। उसे वहां पड़े भारी भरकम जैकेटों में एक चुन लेने को कहा गया। यहीं बाथरूम भी थे। सभी को यात्रा से पहले शंका समाधान के लिये कह दिया गया।
जब सभी यात्रा के लिये तत्पर हो गये तो प्रत्येक को चेक किया गया। सभी चीजें उनकी आवश्यकतानुसार पहनी है या नहीं। अब हमें बिल्डिंग के बाहर विमान तल के एक अलग हिस्से में खड़ा किया गया। 6-6 यात्रियों के 5-7 दल बना दिये गये। विमान तल का रन वे दूसरी तरफ था। हेलीकोप्टरों को उड़ने हेतु रन वे की आवश्यकता नहीं होती इसलिये यह छोटी सी जगह ही इनका हेलीपेड बना दी गई थी।
हम थोड़ी देर खड़े रहे। यहां अपेक्षाकृत ठंड ज्यादा महसूस हो रही थी। भारी जेकेट, मफलर, टोपा, ग्लव्स पहन रखे थे फिर भी यहां ठंड लग रही थी उपर ग्लेशियर पर क्या होगा यह सोच कर ही झुरझुरी छूटी जा रही थी। हम यहां के प्रसिद्ध मेन्डेनहाल ग्लेशियर को देखने जा रहे थे। यह 22 कि.मी. लम्बी बर्फ की नदी है जो कि इसी नाम की घाटी में अवस्थित है। इन हिमनदों का पानी अत्यन्त शुद्ध समझा जाता इसलिये ग्लेशियरों के पास रहने वाले लोग सौभाग्यशाली होते हैं जिन्हें एसा पानी पीने को मिलता है। ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते खतरे के कारण दुनिया से ग्लेशियर कम होते जा रहे हैं इस कारण पृथ्वी का प्राकृतिक संतुलन नष्ट होने की आशंकाएं बढ़ रही हैं। ग्लेशियर पिघल पिघल कर नदियों का रूप ले विलुप्त होते जा रहे हैं। यही क्रम जारी रहा तो ग्लेशियरों का समूचा जल समुद्र में समा जाएगा। एसा हो गया तो समुद्र का जल स्तर बढ़ जायगा। समुद्र का जल एक फुट भी बढ़ा तो तमाम तटीय शहर और बस्तियां डूब जायेगी। दुनिया भर के तमाम अत्याधुनिक और विकसित शहर समुद्र तटों पर ही स्थित है, सबसे पहले वे ही तबाही की भेंट चगे।
ग्लोबल वार्मिंग की बातें तो बहुत सुनते हैं, इन्हें बेफिक्री से हवा में भी उड़ा देते हैं मगर यहां वास्तविकता के धरातल पर खड़े इसकी भयावहता से परिचय प्राप्त हो रहा था। मौसम बदल रहे हैं, गर्मी-सर्दी वर्षा का अनियमित होता क्रम हम रोज महसूस कर रहे हैं। मेन्डेनहाल लेशियर भी धीरे धीरे घटता जा रहा है जो चिंता का विषय बना हुआ है। ज्यू ज्यूं ग्लेशियर सिमटता जा रहा है त्यू त्यूं इसके नीचे से वृक्षों के टूट, लट्ठे और जड़ें निकल रहे हैं। वेज्ञानिकों ने इनकी जांच कर इन्हें 1200 से 2500 साल पुराना पाया है।
ग्लेशियर के पिघलते रहने से इसकी तलहटी में बहुत बड़ी झील बन गई है। यह झील भी जमी हुई है जो ग्लेशियर के लगभग 100 फुट नीचे है। झील भी 200 फीट गहरी है। ग्लेशियर लगभग ढाई कि.मी. चौड़ा है। गर्मियों में यह रोज लगभग दो फुट बहता है। इसका बर्फ 150 साल पुराना है जो प्रति वर्ष अनुमानत: 25-30 फुट कम होता जा रहा है।
थोड़ी ही देर में एक के बाद एक छ: हेलीकोप्टर हमारे सामने के मैदान में उतरे। सभी से प्रसन्न चित्त और उत्साहित यात्री उतर रहे थे। सभी यात्री हम जिस बिल्डिंग से निकले थे उसी में अपने जूते जेकेट वापस उतारने प्रवेश कर गये। अब हमारे प्रत्येक ग्रुप को हेलीकोप्टरों की तरफ बढ़ने का इशारा किया गया। कौन आगे बैठेगा, कौन पीछे यह हमें पहले ही बता दिया गया था।
बैठते ही हमारे कन्धों तथा कमर को बेल्टों से कस दिया गया। विमान यात्रा सिर्फ सीट बेल्ट ही होते हैं मगर यहां शोल्डर बेल्ट भी थे। ये कुछ उसी तरह के थे जो एम्यूजमेन्ट पार्कों में रोलरकोस्टर की सवारी करते वक्त शरीर पर बांधे आते हैं। हेलीकोप्टर के पंख चालू थे जिनकी आवाज में कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था। अब प्रत्येक यात्री को हेडफोन दे दिये गये। इनके लगाने से हमें पायलट की आज सुनाई देने लगी।
हेलीकोप्टर रवाना होने के पहले पायलट भी सब यात्रियों को निर्देश देने लगा। वो अंग्रेजी में ही बोल रहा था फिर भी मेरे पल्ले कुछ भी नही पड़ रहा था। मैंने प्रीति से पूछने की कोशिश की मगर शोर इतना था कि हमें एक दूसरे की आवाज ही नहीं सुनाई दे रही थी। उसने इशारों में ही समझा दिया कि कोई खास बात नहीं बता रहा।

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