pakistan in turmoil
ब्रिगेडियर आरपी सिंह: कुछ समय पहले तक पाकिस्तान में काफी कुछ ठीक दिख रहा था, लेकिन अब सब कुछ गड़बड़ है। वर्ष 2017 में पाकिस्तान की जीडीपी में 5.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई थी। अंतरराष्ट्रीय पत्रिका 'द इकोनमिस्ट' ने 2017 में पाकिस्तान को ' सबसे तेजी से वृद्धि करने वाला मुस्लिम देश' बताया था। उस समय प्रधानमंत्री रहे नवाज शरीफ के अमेरिका, चीन और इस्लामिक देशों विशेषकर संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के शाही परिवारों के साथ बढ़िया रिश्ते थे। चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी सीपैक का काम पूरी तेजी पर था। पाकिस्तान के भविष्य से जुड़े संकेतक सही दिशा में थे। फिर 2022 तक आते-आते सब कुछ बदरंग दिखने लगा।
गुलाम कश्मीर सहित पूरे पाकिस्तान में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई। गुलाम कश्मीर में भारत के साथ विलय की मांग करते प्रदर्शनकारियों के वीडियो वायरल होने लगे। पाकिस्तान में महंगाई अप्रत्याशित रूप से बढ़कर करीब 40 प्रतिशत तक पहुंच गई। बिजली के दामों में बेतहाशा वृद्धि से परेशान लोगों ने पिछले दिनों बंद का एलान किया, जो पूरे देश में प्रभावी दिखा। पाकिस्तानी रूपया डालर के आगे कराहते हुए 300 रूपये के स्तर को भी पार कर गया। वहां आटे जैसी वस्तुओं की किल्लत हो गई। याद रहे कि यह वही इलाका है, जिसे विभाजन पूर्व भारत का अन्नदाता कहा जाता था। वहां लोग भुखमरी के शिकार हो रहे हैं। महंगाई के सामने वहां की कार्यवाहक सरकार असहाय और निरूपाय दिख रही है।
पाकिस्तान में स्थितियां इमरान खान के सत्ता संभालने के बाद से बिगड़नी शुरू हुई। क्रिकेटर से नेता बने इमरान के पास कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं था। उनका अड़ियल और अहंकारी रवैया जगजाहिर रहा है। इमरान ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए कट्टरपंथियों के साथ गलबहियां करने से भी परहेज नहीं किया। उन्हें कोई अंदाजा ही नहीं था कि पाकिस्तान की आर्थिकी किस प्रकार चलती है। साथ ही वह देश के संस्थानों और उनके संचालन से भी अनभिज्ञ थे। यह आर्थिक नीति में अनुभवहीनता का ही परिणाम था कि उनकी सरकार ने तीन वर्ष और आठ महीनों की अवधि में 52 अरब डालर का कर्ज लिया, जो पाकिस्तान की आर्थिकी के लिहाज से बहुत ज्यादा था।
स्थिति ऐसी बनी कि पाकिस्तान के वार्षिक राजस्व संग्रह से अधिक कर्ज की देनदारी हो गई। पाकिस्तानी रूपये के अवमूल्यन के गलत फैसले से आर्थिक तबाही ने पाकिस्तान को अपनी चपेट में ले लिया । आर्थिक विशेषज्ञता का अभाव, नागरिक सरकार और अर्थव्यवस्था पर फौजी नियंत्रण, बेलगाम भ्रष्टाचार और कोविड महामारी के दौरान प्रशासनिक व्यवस्था के ध्वस्त हो जाने से पाकिस्तान तबाही के कगार पर पहुंच गया। अप्रत्याशित बाढ़ ने रही-सही कमर तोड़कर रख दी। जिस सीपैक परियोजना से पाकिस्तान अपनी तरक्की की आस लगाए बैठा था, वह भी इमरान की नीतियों के चलते अटकती गई।
अब पाकिस्तान बिखराव की ओर बढ़ रहा है। सेना और राजनीतिक बिरादरी के बीच पसंद- नापसंद का खेल हाल तक पर्दे की पीछे चलता रहा, लेकिन इमरान खान के चलते यह कड़वाहट पूरी तरह सतह पर आ गई। मई में इमरान की गिरफ्तारी के बाद जो हुआ, वह पाकिस्तान के इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया। इमरान के समर्थकों ने सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमले में जमकर उत्पात मचाया और सैन्य अधिकारी देखते रह गए। हालांकि, उसके बाद से सेना ने अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए एक के बाद एक दांव आजमाए। उसने कुछ तत्वों की धरपकड़ के साथ ही जो कार्रवाई की, उसने इमरान की पार्टी में खलबली मचाई, जिससे कई नेता इमरान का साथ छोड़कर चलते बने। सेना के लिए परेशानी की बात यही है कि इस सबके बावजूद इमरान की लोकप्रियता और बढ़ने पर ही है।
छह साल पहले तक जो देश सही ढर्रे पर जाता दिख रहा था, वह पटरी से कैसे उतर गया? आंतरिक पहलू तो जो हैं सो हैं। उनसे इतर प्रधानमंत्री मोदी के रणनीतिक दांव से भी पाकिस्तान की हालत पस्त हुई है। ऐसे रणनीतिक दांव के लिए ही आचार्य चाणक्य ने 'चाणक्य नीति' का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। चाणक्य नीति का अर्थ है कि बिना युद्ध में उतरे ही बाजी अपने नाम कर ली जाए। चाणक्य ऐसे युद्ध में विश्वास रखते थे, जिसमें प्रत्यक्ष लड़ाई के बजाय दुश्मन को भावनात्मक रूप से तोड़ दें, ताकि उसका मनोबल रसातल में पहुंच जाए। पाकिस्तान को लेकर मोदी-नीति भी कुछ इसी प्रकार की रही। मोदी ने कई देशों का दौरा किया और वैश्विक नेताओं के साथ व्यक्तिगत संबंध बढ़ाए। इसका खाका तैयार करने में अजीत डोभाल और एस. जयशंकर की अहम भूमिका रही। जयशंकर तब विदेश मंत्रालय में सचिव थे। इस नीति से जुड़े समग्र प्रयासों का परिणाम रहा कि पाकिस्तान विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग पड़ता गया।
मोदी के साथ प्रगाढ़ संबंधों के चलते उन तमाम देशों ने भी पाकिस्तान के लिए मदद के दरवाजे बंद कर दिए, जो पारंपरिक रूप से उसकी सहायता करते आए थे। जब तक पाकिस्तान के सिर पर फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स यानी एफएटीएफ की तलवार लटकी रही, तब तक आइएमएफ से उसे राहत पैकेज भी नहीं मिल पाया। मोदी के इन प्रयासों का ही परिणाम रहा कि पाकिस्तान के हाथ तंग होते गए और कश्मीर में वह चाहकर भी अपने नापाक मंसूबों को अंजाम नहीं दे पाया। मोदी ने जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 और 35-ए की जकड़न से भी मुक्ति दिलाई। उसके बाद से अशांत कश्मीर घाटी में शांति और समृद्धि की नई बयार महसूस हो रही है। वहां 22 से 24 मई के बीच हुई जी- 20 की बैठक के दौरान विदेशी प्रतिनिधियों ने भी परिवर्तन को महसूस किया। पूरी दुनिया कश्मीर में आकार ले रहे बदलाव को देख रही है।
एक ओर जहां भारत में कश्मीर को प्रगति के नए पंख लग रहे हैं, वहीं पाकिस्तान के कब्जे वाले गुलाम कश्मीर से नागरिकों के लगातार दमन और उत्पीड़न की ही खबरें आ रही हैं। यही कारण है कि सीमा के इस पार भारतीय नागरिकों की दशा में हो रहे सुधार को देखते हुए गुलाम कश्मीर के लोगों में भी पाकिस्तानी शिकंजे से मुक्त होने की इच्छा जोर पकड़ रही है। भारत सरकार को इन भावनाओं और संसद द्वारा पारित उस संकल्प की दिशा में आगे बढ़ने पर विचार करना चाहिए, जिसमें देश की सबसे बड़ी पंचायत ने एकमत से पूरे कश्मीर के भारत में एकीकरण पर सहमति जताई थी। उस संकल्प की पूर्ति के लिए सही समय और अवसर का लाभ उठाने से नहीं चूकना चाहिए।
Editorial

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