Pratahkal-Develop the power of religion in life-Acharya Mahashraman

मुंबई । आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने मंगलवार को तीर्थंकर समवसरण में कहा कि तपस्या, साधना और संवर साधु का धन होता है। इसके सामने गृहस्थों के करोड़ों के हीरे भी ना कुछ के समान होते हैं। साधना और महाव्रतों की तुलना में इनका कोई मूल्य नहीं होता। वे सौभाग्यशाली होते हैं, जिन्हें साधुपना प्राप्त हो जाता है। साधुपना प्राप्त होने के बाद उसे पूर्ण जागरूकता के पालन करने वाला धन्य-धन्य हो जाता है। गृहस्थ अपने जीवन में साधु न भी बनें तो अपने जीवन में धर्म की शक्ति का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी का चिंतन शुभ और अपना समय शुभ कार्य में नियोजित करके अपने जीवन को धर्म से भावित बनाने का प्रयास करे। उन्होंने श्रावक के तीन मनोरथों का वर्णन करते हुए कहा कि श्रावक के तीन मनोरथ परिग्रह का अल्पीकरण, जीवन में कभी साधुपन आए और अंतिम मनोरथ की जीवन का अंतिम समय संथारा-संलेखना में जाए। ऐसी भावना रखने वाला व्यक्ति भी अपनी आत्मा को धर्म में नियोजित कर सकता है।
मंगलवार को जैन विश्व भारती का वार्षिक अधिवेशन भी आयोजित हुआ। अध्यक्ष अमरचंद लूंकड़, मंत्री सलिल लोढ़ा व आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि कीर्तिकुमार ने अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्य महाश्रमण ने कहा कि तेरापंथ समाज को जैन विश्व भारती के रूप में एक अच्छी संपदा प्राप्त है। आचार्यश्री तुलसी के समय प्रारम्भ हुई यह संस्था महत्त्वपूर्ण है।
आचार्यश्री के संसारपक्षीय अग्रज सूरजकरण दूगड़ के पुत्र नरेश दूगड़ के देहावसान के संदर्भ में उनके परिजन पूज्य सन्निधि में उपस्थित थे। उनकी संसारपक्षीया बहन साध्वी चारित्रयशा व साध्वी सुमतिप्रभा ने श्रद्धांजलि के स्वर समर्पित किए। साध्वीप्रमुखा, साध्वीवर्या व मुख्यमुनि ने भी परिवार को आध्यात्मिक सम्बल प्रदान किया। इस संदर्भ में आचार्यश्री ने प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि सृष्टि की कुछ नियम और व्यवस्थाएं हैं। इसमें एक आयुष्य की व्यवस्था भी है। जन्म के साथ ही मृत्यु भी आ जाती है, किन्तु वह अपने समय पर आने पर ही प्रकट होती है। ऐसी स्थिति में समता-शांति रखने का प्रयास करना चाहिए। मनोबल रखने का प्रयास हो।
Editorial

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