भाजप विरोधी दलों के गठबंधन- आइएनडीआइए यानी 'इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस' की मुंबई में हुई दो दिनों की बैठक से यह साफ हो गया कि ये दल अपने को एकजुट रखने को प्रतिबद्ध हैं। जब पटना में इस गठबंधन की पहल हुई थी, तब कुछ राजनीतिक पंडित


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भाजप विरोधी दलों के गठबंधन- आइएनडीआइए यानी 'इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस' की मुंबई में हुई दो दिनों की बैठक से यह साफ हो गया कि ये दल अपने को एकजुट रखने को प्रतिबद्ध हैं। जब पटना में इस गठबंधन की पहल हुई थी, तब कुछ राजनीतिक पंडितों का मानना था कि यह गठजोड़ क्षेत्रीय दलों की महत्वकांक्षा के चलते बिखर जाएगा, लेकिन अब जब बेंगलुरू की दूसरी बैठक के बाद मुंबई की तीसरी बैठक में आइएनडीआइए की समन्वय समिति के नाम तय होने के साथ चार अन्य समितियां बन गई और साझा रैलियां करने की तैयारी के अलावा सीटों के बंटवारे की प्रक्रिया शीघ्र शुरू करने की घोषणा कर दी गई, तब फिर यही लगता है कि वे मिलकर भाजपा का मुकाबला करने को तैयार हैं।
वैसे राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है और यह किसी से छिपा नहीं कि आइएनडीआइए के कई घटकों में मतभेद हैं और वे मुंबई में भी झलके । इसी कारण न तो संयोजक की घोषणा हो सकी, न लोगो जारी हो सका और न ही जाति गणना पर सहमति बन सकी, जबकि बेंगलुरू की बैठक में जाति गणना पर एक सुर में बात की गई थी। यह तो स्पष्ट ही है कि नेतृत्व का सवाल और सीटों का बंटवारा भी एक जटिल मसला है।
आइएनडीआइए की मुंबई बैठक से यह और साफ हुआ कि कांग्रेस हर हाल में अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने को तत्पर है और इसीलिए उसने कई ऐसे दलों को भी साथ लिया, जो उसके विरोधी रहे हैं, जैसे आम आदमी पार्टी। आइएनडीआइए कांग्रेस के नेतृत्व वाले संप्रग यानी यूपीए का ही नया रूप है। संभवतः संप्रग नाम से इसलिए पीछा छुड़ाया गया, क्योंकि घपलों- घोटालों के कारण उसकी साख पर बट्टा लग गया था ।कांग्रेस यह समझ रही है कि वह अकेले भाजपा का सामना नहीं कर सकती। एक समय एकला चलो की नीति पर चलने वाली कांग्रेस आज क्षेत्रीय दलों को साथ लेना आवश्यक मान रही है।
समस्या यह है कि कुछ क्षेत्रीय दल कांग्रेस को कमतर आंक रहे हैं। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि एक तो कांग्रेस के पास शासन चलाने का लंबा अनुभव है और दूसरे, पूरे देश में उसकी उपस्थिति है। क्षेत्रीय दलों के नेताओं में शरद पवार, नीतीश कुमार और ममता केंद्र में मंत्री रह चुकी हैं। इनकी नजर में राहुल के पास वह अनुभव नहीं, जो उनके पास है। यह एक सच्चाई है, लेकिन इसके बाद भी यह नहीं लगता कि कांग्रेस प्र.म. पद की दावेदारी पर कोई समझौता करने वाली है। यह बात और है कि आइएनडीआइए के कुछ घटकों ने अपने अपने नेताओं को प्र.म. पद के लिए योग्य बताना शुरू कर दिया है।
निःसंदेह गांधी परिवार कांग्रेस की शक्ति का स्रोत रहा है, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। आज गांधी परिवार का जनता पर वैसा प्रभाव नहीं, जैसे पहले दिखता था। इसी कारण राहुल गांधी पिछली बार अमेठी से चुनाव हार गए थे? अभी यह स्पष्ट नहीं कि आइएनडीआइए का 'जुड़ेगा भारत जीतेगा इंडिया' नारा कितना कारगर होगा, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी राजग प्रधानमंत्री मोदी की छवि और उनकी लोकप्रियता के सहारे चुनाव मैदान में उतरने के लिए कमर कसे है। भले ही राहुल प्र.म. पद के प्रबल दावेदार बताए जाते हों, लेकिन मोदी के सामने वह कमजोर दिखते हैं। यदि कांग्रेस मोदी बनाम राहुल की स्थिति से बचना चाहे तो हैरानी नहीं। शशि थरूर ने तो यह कह भी दिया कि किसी को पीएम पद के प्रत्याशी के तौर पर पेश नहीं किया जाना है, जो जनता को आकर्षित करने वाला कोई चाहिए।
भारत जोड़ो यात्रा और हिमाचल एवं कर्नाटक के चुनाव नतीजों ने कांग्रेस का मनोबल अवश्य बढ़ाया है, लेकिन राहुल राजनीतिक रूप से उतने परिपक्व नहीं, जितना उन्हें होना चाहिए। वह प्रधानमंत्री मोदी की छवि नष्ट करने के लिए न जाने कब से यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि मोदी सरकार चंद उद्यमियों के लिए ही काम करती है। यह एक खोखला आरोप है और इसी कारण जनता पर उसका असर नहीं। राहुल प्रधानमंत्री मोदी पर तरह-तरह के लांछन तो लगाते हैं और इस क्रम में कई बार भाषा की मर्यादा का भी उल्लंघन कर जाते हैं, लेकिन वह यह नहीं बता पाते कि देश के समक्ष जो समस्याएं हैं, उनका समाधान कैसे करेंगे?
यदि वह यह मान रहे हैं कि उनके बेतुके आरोपों से प्रधानमंत्री मोदी की छवि धूमिल हो जाएगी तो यह उनकी भूल है। उन्हें पता होना चाहिए कि पिछले आम चुनाव में उन्होंने 'चौकीदार चोर है' का जो नारा लगाया था, महिमामंडन करने वाले कांग्रेसी नेताओं को उसका क्या हश्र हुआ? गांधी परिवार का यह भी नहीं भूलना चाहिए कि संप्रग सरकार ने दस वर्ष के शासनकाल में जो चंद अच्छे काम किए, उनमें मनमोहन सिंह और प्रणव मुखर्जी का बड़ा योगदान था। प्रणव मुखर्जी रहे नहीं और मनमोहन सिंह पहले की तरह सक्रिय नहीं ।
आज कांग्रेस में ऐसे नेताओं का अभाव है , जो जनता को आकर्षित करने वाला कोई वैकल्पिक एजेंडा पेश कर सकें। क्षेत्रीय दलों का भी कुछ ऐसा ही हाल है। वे आइएनडीआइए की छतरी तले अवश्य आ गए हैं, लेकिन राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय महत्व के विषयों पर उनका कोई प्रभावी चिंतन नहीं दिखता। यह आइएनडीआइए की एक बड़ी कमजोरी है। इस गठबंधन के एक- दो दलों को छोड़कर सारे दल वंशवादी हैं और उनका प्रभाव भी उनके राज्य तक ही सीमित है। इनमें अपवाद है तो आम आदमी पार्टी, जो मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव लड़ने को भी तैयार है। यह भी किसी से छिपा नहीं कि ममता बनर्जी को बंगाल में कांग्रेस और वामदलों की एकजुटता रास नहीं आ रही है।
आइएनडीआइए की एकजुट दिखने की कोशिश के बीच इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि भाजपा भी आगामी आम चुनाव लिए तेजी से सक्रिय है। उसके कार्यकर्ताओं की जमीनी स्तर पर जैसी पहुंच और पकड़ है, वैसी कांग्रेस के पास नहीं। जहां भाजपा समेत आइएनडीआइए के कई घटक इस पर राष्ट्रवाद को लेकर मुखर है, वहीं कांग्रेस ढुलमुल रवैया अपनाए हुए हैं। यह ठीक है कि आइएनडीआइए ने मुंबई में फिर से अपनी एकजुटता का प्रदर्शन किया, लेकिन वह किसी न्यूनतम साझा कार्यक्रम को सामने नहीं रख पाया । यह काम तो सबसे पहले किया जाना चाहिए था । इससे जनता को सही संदेश देने में आसानी होती ।
Editorial

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