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अलास्का जहाज यात्रा 15 : ऊंचे पहाड़ पर एकदम खड़ी चढती केबल ट्राम
By EditorialPublished on
जुनू का बाजार छोटा सा ही था। एक तरफ ऊंचे ऊंचे पहाड़, दूसरी तरफ समुद्र जहाज से उतरते ही पहाड़ पर चढती एक ट्राम ने सबका ध्यान आकर्षित कर लिया। यह एक तरह से रोप वे थी। रोप वे की केबल कारें तो छोटी होती हैं जिनमें सामान्यतया 4-6 लोग ही बैठते हैं, मगर यह तो पूरी की पूरी बस थी जो केबलों के सहारे उपर पहाड़ पर चढ रही थी। इसमें 60 लोग बैठ सकते थे।

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जुनू का बाजार छोटा सा ही था। एक तरफ ऊंचे ऊंचे पहाड़, दूसरी तरफ समुद्र जहाज से उतरते ही पहाड़ पर चढती एक ट्राम ने सबका ध्यान आकर्षित कर लिया। यह एक तरह से रोप वे थी। रोप वे की केबल कारें तो छोटी होती हैं जिनमें सामान्यतया 4-6 लोग ही बैठते हैं, मगर यह तो पूरी की पूरी बस थी जो केबलों के सहारे उपर पहाड़ पर चढ रही थी। इसमें 60 लोग बैठ सकते थे।
पहाड़ का नाम रोबर्ट्स है। ट्राम 18 सौ फीट ऊंची जाती है। इसकी यह है कि यह एकदम खड़ी उपर जाती है। सड़क की दायीं तरफ इसका का नाम माउन्ट था जहां से उठ कर सड़क के उपर होते हुए यह पहाड़ पर जाती थी। सड़क ने वाले यात्री भी अपने उपर से निकलते हुए इसका आनन्द उठाते थे। स्टेशन के बाहर ही एक छोटी सी माल थी जिसमें हर तरह का सामान मिल था। यहीं पर ट्राम के टिकट भी मिल रहे थे। ट्राम में जाने वालों की लाइन बहुत बीधी घन्टे दो घन्टे पहले इसमें चढ़ने का अवसर मिलना मुश्किल था। ट्राम से आसपास के पहाड़ों और दूरस्थ ग्लेशियरों का विहंगम दृश्य दिखाई यह उपलब्ध अन्य आकर्षणों के मुकाबले इसमें बैठना सस्ता था इसलिये श्री हर कोई इसमे जाना चाहता था।
ट्राम की माल के बाहर ही एक बड़ा सा पार्किंग एरिया था। यह क्षेत्र पार्किंग के कम तो नहीं वरन पर्यटकों को घुमाने ले जाने हेतु बिठाने और छोड़ने के काम स्यादा आता था। जून में कुल सड़क की लम्बाई 40-50 मील है, यहां क्या तो गाड़ी चले और क्या पार्किंग हो। ज्यादातर वाहन, वो भी बसें, पिक अप वगैरा पर्यटन व्यवसाय में ही लगे हुए थे।
ट्राम पहाड़ पर यात्रियों को छोड़ देती है तथा पहले आये हुए यात्रियों को ले वापस नीचे उतर जाती है। पहाड़ पर गिफ्ट शोप है, रेस्टोरेन्ट है तथा एक ओडिटोरियम है जिसमें जूनू के बारे में छोटी सी फिल्म बताई जाती है। सब पर्यटकों को आकर्षित करने और उन्हें व्यस्त रखने के तरीके हैं। असली मजा तो ट्राम में बैठकर उपर चढ़ते-उतरने का है। पहाड़ से बन्दरगाह का अत्यन्त मनोरम दृश्य दिखाई देता है।
जून में जब एक साथ दो क्रूज जहाज आ जाते हैं तो पर्यटकों की पारी मौह हो जाती है, ऐसे में यह ट्राम यात्रियों से भर जाती है, यदि आपको खिड़की के पास वाले स्थान पर खड़े रहने को मिल गया तब तो इसका मजा ले सकते हैं मगर एसा नहीं हो पाये तो मजा किरकिरा हो जाता है।
हम लोग पार्किंग लोट में बैठे अपनी बस का इन्तजार करने लगे। हमारे साथ कई अन्य लोग भी अपने अपने पिकअप वाहनों का इन्तजार कर रहे थे। प्रीति अपने बैग में नमकीन वगैरा भर कर लाई थी, वह इसमें से निकाल कर देती रही और हम खाते रहे। थोड़ी ही देर में हमारी पिक अप भी आ गई। यह अपने यहां पहले मेटाडोर होती थी वैसी गाड़ी थी। 12-13 लोग इसमें बैठ सकते थे। सीटों की तीन कतारें थीं। हम गाड़ी की पहली कतार में बैठने के इच्छुक थे मगर हमसे पहले 3-4 युवक इन सीटों पर बैठ गये। हम दूसरी कतार वाली सीटों पर बैठने की मजबूर हो गये। ड्राइवर कुछ अन्य यात्रियों का और इन्तजार कर रहा था।
इस बीच अलग अलग टूर कम्पनियों के वाहन आते रहे। हम बेसब्र हो गये।। ड्राइवर को चलने को कहा तो उसने 5 मिनट का समय मांगा, तब तक यात्री नहीं आये तो वह उन्हें छोड़ कर निकल पड़ेगा। उसने अपनी बात खतम भी नहीं की कि ये यात्री आ गये। ये तीन थे, इनमें एक अत्यन्त वृद्ध था, इसके हाथ में छड़ी थी और अन्य दो यात्री उसे सहारा देकर ला रहे थे। इस वृद्ध व्यक्ति को देख सबसे अगली कतार में बैठे युवक उतर गये तथा वृद्ध व उसके साथियों को अपनी सीटों पर बैठने को कह ये लोग पीछे की सीटों पर बैठ गये। इन युवकों की एसी सौजन्यता देख मैं गदगद हो गया, हालांकि में खुद अपने देश में भी कई बार इस तरह की पहल अनुभव करता रहता हूँ। मुझे खड़ा देख हर कोई अपनी सीट छोड़ मुझे कहता है तो बहुत अच्छा लगता है।
दरअसल हमारे आगे बैठे वृद्ध को उसका पुत्र और पौत्र घुमाने लाये थे। जब हम सबको पता लगा कि तीनों तीन पीढियों के प्रतिनिधि हैं तो सबने उनको बधाई दी। हमारा ड्राइवर ही हमारा गाईड था। यहां से निकल कर हम एयरपोर्ट की तरफ अग्रसर हुए। ड्राइवर माईक पर जूनू तथा यहां के जन जीवन के बारे में बताये जा रहा था। तभी एक जगह उसने गाड़ी खड़ी कर उपर की तरफ इशारा किया और कहा कि देखिये वहां उल्लू बैठा है। सभी लोग खिड़की से झुक कर उस तरफ देखने लगे। मुझे अचरज हो रहा था कि उल्लू में एसी कौन सी खास बात है जो यह गाड़ी रोक कर ऐसे बता रहा है जैसे यह भी पर्यटन के आकर्षण की कोई चीज हो। बाकी यात्री भी बावले हो उसे देखने लगे और फोटो खींचने लगे। यह पर्यटन की मार्केटिंग थी, इसके अलावा कुछ नहीं।
मैंने मुनीश को इस बारे में पूछा तो वो हंस कर कहने लगा कि वह उल्लू असली है ही नहीं उल्लू की मूर्ति बनाकर बिठाई हुई है, मुनीश की यह बात ड्राइवर ने भी सुन ली और उसने भी हंसते हुए स्वीकार कर लिया कि यह असली उल्लू नहीं उसका पुतला है। बाकी सब यात्री जो इसका फोटो खींच रहे थे वे भी यह जानकर अपनी ही मूर्खता पर हंसने लगे। मैंने मुनीश से पूछा कि उल्लू की मूर्ति लगाने का क्या तुक तो उसने बताया कि जिस तरह हमारे यहां खेतों में पक्षीयों, जानवरों को दूर रखने के लिये बजरबट्टू खड़े किये जाते हैं, उसी काम के लिये। उल्लू बिठाये जाते हैं। ऊंची बिल्डिंगों, तारों आदि को पक्षियों, चूहे, जैसे जानवरों से दूर रखने के लिये एसा किया जाता है। उल्लू को यहां माना जाता है, वह चूहों, गिलहरियों, पक्षियों को खा जाता है इसलिये उससे डरते हैं।
ड्राइवर ने हँसते हुए बताया कि वह रोज सभी यात्रियों को यह उल्लू बताता है। मान जाते हैं, बाद में वह खुद ही सबको बता देता है कि जो उल्लू आपने असली नहीं नकली था, आज भी वह एसा करने वाला था, इसके पहले ही पोल खुल गई। मैं मन ही मन सोच रहा था हमारे यहां तो हर खेत में नजर आ जाते हैं मगर किसी पर्यटक को उसे नहीं बताया जाता, उसका टू लो तो भी बहुत अच्छा आता है। यही हमारी सोच का सबसे बड़ा अन्तर है। मार्केटिंग करते ही नहीं, जो कुछ हमारे पूर्वज विरासत में छोड़ गये. अपने आप जो आकर्षण पैदा करते है, उसे ही भुनाते रहते।
यहां से आगे बढ़े तो थोड़ी ही दूर एक नदी के किनारे जाकर वापस गाड़ी रूक ने यहां सबको उतरने को कहा। नदी सड़क से बहुत नीचे थी, यहां तक जने के लिये लकड़ी की सीढ़ीयां बनी हुई थी। नदी अच्छी चौड़ी और झील सी रही थी मगर बहते हुए पानी से इसके नदी होने का एहसास हो रहा था। नदी में समन मछलियों की भरमार थी, जिन्हें हम सेलमन मछली बोलते हैं उसे दरअसल कहा जाता है। ये मछलियां इतनी अधिक थी कि पानी एकदम काला काला नजर आ रहा था, बहाव के विपरीत दिशा में जाने के कारण मछलियों की स्थिति नजर आ रही थी वरना तो ऐसा लगता जैसे पानी ही काला हो सेमन मालियां अलास्का की इकोनोमी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जमीन ज्यादा है। नहीं जो भी है उसमे भी तीन महीने ही खेती हो सकती है. यहां रहना ही संभव नहीं तो उद्योग धन्धों, व्यापार का सवाल ही नहीं जो कुछ आय का साधन है वह पर्यटन है या फिर मछलियां पर्यटन भी कुछ माह का ही है इसलिये लोगों को यहां प्रकृति जो प्रदान करती है उस पर ही जीवन यापन करना पड़ता है। खाने पीने से लेकर दैनन्दिन उपयोग की हर वस्तु यहां बाहर से आती है मगर मछली ही एसी चीज है जो यहां से बाहर जाती है और राजस्व जुटाती है।

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