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'इंडिया' जो करे, जल्दी करे
By EditorialPublished on
शशि शेखर: इंडिया का मुंबई महाजुटान साथ लड़ने और साथ जीतने की कसमों के साथ संपन्न हुआ। इस दौरान एक 14 सदस्यीय समन्वय समिति का गठन किया गया, जिसमें सभी प्रमुख पार्टियों के नुमाइंदे शामिल हैं। समिति में शामिल लोगों की सूची से नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और लालू यादव जैसे नेताओं के नाम नदारद हैं। सिर्फ शरद पवार और स्टालिन ऐसे हैं, जिन्हें अपनी पार्टियों का पुरोधा कहा जा सकता है। पहले चर्चाएं पुरगरम थीं कि नीतीश कुमार इस समिति के संयोजक होंगे, पर इसका पटाक्षेप पिछले दिनों लालू यादव ने यह कहकर कर दिया था कि समित

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शशि शेखर: इंडिया का मुंबई महाजुटान साथ लड़ने और साथ जीतने की कसमों के साथ संपन्न हुआ। इस दौरान एक 14 सदस्यीय समन्वय समिति का गठन किया गया, जिसमें सभी प्रमुख पार्टियों के नुमाइंदे शामिल हैं। समिति में शामिल लोगों की सूची से नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और लालू यादव जैसे नेताओं के नाम नदारद हैं। सिर्फ शरद पवार और स्टालिन ऐसे हैं, जिन्हें अपनी पार्टियों का पुरोधा कहा जा सकता है।
पहले चर्चाएं पुरगरम थीं कि नीतीश कुमार इस समिति के संयोजक होंगे, पर इसका पटाक्षेप पिछले दिनों लालू यादव ने यह कहकर कर दिया था कि समिति के कई संयोजक हो सकते हैं। इसका क्या मतलब निकाला जाए? क्या भविष्य में समन्वय समिति को नया रंग-रूप दिया जाएगा या कुछ और कमेटियां अस्तित्व में आएंगी ? इस बैठक से छनकर आती खबरें इसकी पुष्टि करती हैं कि सोशल मीडिया, प्रचार व अन्य जरूरी कार्यों के लिए कुछ और समितियां बनाई जाएंगी। आप चाहें, तो कह सकते हैं कि पटना से 23 जून को शुरू हुआ यह सफर पहली सितंबर तक इस मुकाम पर पहुंच सका है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी की बेहद शक्तिशाली टीम से टकराने के लिए क्या यह गति पर्याप्त है ? ऐसा नहीं है कि इस गठबंधन में शामिल दिग्गज यह नहीं समझते कि चुनावी रण में समय से फैसला करना कितना जरूरी है, पर पुरानी गुत्थियों को सुलझाने में वक्त तो लगता ही है। अगर यह दौर कुछ और लंबा खिंचा, तो उनके समर्थकों के जोश पर पानी फिर सकता है।
मुंबई जुटान के बाद पत्रकारों से रूबरू राहुल गांधी ने कहा कि यहां जो लोग जुटे, वे देश की 60 फीसदी आबादी की नुमाइंदगी करते हैं। अन्य वक्ताओं ने भी इसी बात को अलग-अलग अंदाज में कहा, पर पुराना फॉर्मूला है कि चुनाव में सिर्फ अंकगणित काम नहीं आता। मतदाताओं से दलों और नेताओं के भावनात्मक अंतरिक्ष का मिलान भी उतना ही जरूरी होता है।
इस मिलान के लिए सबसे जरूरी है- सही समय पर सटीक संदेश अब तक पटना से मुंबई तक बरास्ते बेंगलुरू जितने भी भाषण हुए हैं, आप उन पर नजर डाल देखिए, वे पुनरावृत्ति के सिवा कुछ भी नहीं हैं। हो सकता है, अंदरखाने इंडिया के घटक दल कुछ निष्कर्षो के आसपास हों, पर समय रहते यदि उन्होंने अपने मतदाताओं को बताया और जताया नहीं, तो चुनावी दौर में फिसलने की आशंकाएं बनी रहेंगी।
मैं पहले भी कह चुका हूं और आज फिर दोहरा रहा हूं कि इंडिया जो करे, जल्दी करे। उसका मुकाबला कितने सक्षम प्रतिद्वंद्वी से है, इसकी बानगी तो 31 अगस्त को ही मिल गई थी।
सुबह से टेलीविजन पर इंडिया गठबंधन की बैठक की खबर छाई हुई थी। शाम ढलते- ढलते अचानक एक खबर उछली कि केंद्र सरकार ने 18 से 22 सितंबर तक संसद का विशेष सत्र आहूत किया है। दोपहर तक इसकी किसी को भनक भी नहीं थी, फिर अचानक यह फैसला क्यों? कयास उछलने लगे और इस समाचार ने इंडिया के महाजुटान की खबर के बराबर आकार ग्रहण कर लिया । राजनीति आभासों और अवधारणाओं का खेल है। सत्ता पक्ष ने सोच-समझकर अपना दांव चला है।
सवाल उठता है, इस अचानक आहूत किए गए सत्र का मकसद क्या है ?
जितने मुंह, उतने कयास। मसलन, क्या यह सारा ताम-झाम संसद के नए भवन में गणेश चतुर्थी के मौके पर कार्यवाही आरंभ कराने के लिए किया जा रहा है? दूसरे ने प्रश्न उठाया, अगर ऐसा है, तो फिर पांच दिन के सत्र की क्या आवश्यकता थी? किसी अन्य का मानना था कि आनन-फानन में महिला आरक्षण बिल लाकर विपक्ष के वार भोथरे किए जा सकते हैं। एक और अनुमान उभरा कि 'एक देश एक चुनाव' के पुराने आह्वान को मूर्त रूप देने के लिए ऐसा किया जा रहा है।
इस मत को मानने वाले कहते हैं कि अगले कुछ महीनों में पांच राज्यों के चुनाव हैं, इस दौरान अगर लोकसभा के चुनाव भी हो जाएं, तो शायद भाजपा को लाभ हो सकता है। यह धारणा अगले दिन और प्रबल हो उठी, जब पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में 'एक देश एक चुनाव' की संभावनाएं तलाशने के लिए समिति का गठन कर दिया गया। यह समिति सभी पक्षों से राय मशविरे के साथ तमाम कानूनी पहलुओं पर भी विचार करेगी।
ममता बनर्जी, नीतीश कुमार और इंडिया के कई नेता समय-पूर्व चुनाव की आशंका पहले से जाहिर करते रहे हैं। उनका दावा है कि प्रधानमंत्री हमारे गठबंधन से घबराकर ऐसा कदम उठा रहे हैं। 'इंडिया टुडे-सी वोटर' के ताजा सर्वे में एनडीए को 43 फीसदी और इंडिया को 41 प्रतिशत मतों का हकदार आंका गया है। सर्वे यह भी बताता है कि 44 फीसदी ऐसे लोग हैं, जो भाजपा को सिर्फ इसलिए वोट देंगे, क्योंकि वे प्रधानमंत्री मोदी को तीसरी बार शपथ लेते देखना चाहते हैं, यानी भाजपा के पास अकेला पावर हाउस मोदी हैं। अपनी सार्वदेशिक अपील के बावजूद उन्हें ममता, नीतीश, लालू, उद्भव, पवार, स्टालिन जैसे क्षत्रपों से जूझना है। ये सूबाई महाशक्तियां हैं, जो भगवा दल के अश्वमेध की रास थाम सकती हैं।
यहां एक और सवाल सिर उठाता है। क्या भाजपा और उसके सहयोगी राम मंदिर के उद्घाटन से पहले चुनावी रण में उतरना चाहेंगे? कई समीक्षक इसे असंभव नहीं मानते। वजह ? लगभग सभी सर्वे प्रधानमंत्री की लोकप्रियता 50 से 55 फीसदी के बीच में आंक रहे हैं। इसी तरह, तमाम अंतरराष्ट्रीय शोध एजेंसियों ने उन्हें संसार के सर्वाधिक लोकप्रिय नेताओं में शामिल किया है
अब तक दिए गए आंकड़ों पर नजर डाल देखिए । हर शोध के कई मायने निकलते हैं। हर खेमा उन्हें अपने पक्ष में पाता है। यही वजह है कि मैं अंकगणित के साथ मतदाता से नेह नाते को बराबर स्थान देता हूं।
भाजपा नेताओं का मानना है कि जी-20 का आगामी सम्मेलन प्रधानमंत्री की छवि को और निखारने जा रहा है। विकास दर के आंकड़े उनके पक्ष में मुनादी करते हैं। यही वजह है कि पिछले दिनों लाल किले के प्राचीर से खुद प्रधानमंत्री मोदी ने देश को दिलासा दिया था कि उनकी सत्ता की तीसरी अवधि में भारत संसार की तीसरी आर्थिक महाशक्ति बन जाएगा। तय है कि वह नए भारत की नई उम्मीदों के सहारे अपनी नैया पार लगाना चाहते हैं। अगर संसद में बिल लाकर 'एक देश एक चुनाव' की अवधारणा को बल दिया जा सके, तो इसे भी विकास और फिजूलखर्ची रोकने के कदम के तौर पर प्रचारित किया जा सकता है। कुछ विपक्षी पार्टियां इस विचार का समर्थन करती आई हैं।
क्या इससे इंडिया खेमे में दरार पड़ सकेगी ?
यदि ऐसा न भी हो, तब भी विपक्ष को नए तर्क गढ़ने के लिए बाध्य होना ही पड़ेगा। संसद के विशेष सत्र में क्या होगा, इसके लिए अभी पखवाड़ा भर इंतजार करना होगा, पर यह तय है कि राजनीति का खेल रोमांच के अगले दौर में पहुंच चुका है।
आपका भी अनुमानों और विचित्र सियासी समीकरणों के इस संसार में स्वागत है।

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