Pratahkal-One cannot become God without becoming a Mahatma:Acharya Mahashraman
मुंबई । परमात्मा बन जाना तो एक बहुत ही ऊंची बात होती है। परमात्मा बनने से पहले महात्मा बनना होता है। महात्मा बने बिना परमात्मा नहीं बना जा सकता। नमस्कार महामंत्र में अर्हत्, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और मुनि को नमन किया गया है। अर्हत् जो जैन शासन में अध्यात्म जगत के सर्वोच्च पद पर आसीन होते हैं। सिद्ध भी मनुष्य जगत के पदों से मुक्त हो चुके हैं। आचार्य मनुष्य के रूप में होते हैं और नमस्कार महामंत्र में मध्यस्थ हैं। आचार्य के दो ऊपर और दो नीचे होते हैं, आचार्य मध्य में विराजमान होते हैं।
परम पूज्य कालूगणी तेरापंथ धर्मसंघ (Terapanth Dharm Sangh) के अष्टमाचार्य थे। आज भाद्रव शुक्ला पूर्णिमा, जो भाद्रव मास का अंतिम दिन है। आज उनके पट्टोत्सव का दिन है। आज के ही दिन उन्होंने धर्मशासन की बागडोर औपचारिक रूप में संभाली थी। चतुर्मास में श्रावण और भाद्रव धर्म की दृष्टि से खास होते हैं। भाद्रव महीना हमारे धर्मसंघ की इतिहास की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। कई ऐतिहासिक प्रसंग भाद्रव महीने में घटित हुए हैं। भाद्रव शुक्ला द्वादशी के दिन आचार्य महाप्रज्ञ ने मुझे अपना उत्तराधिकारी मनोनीत किया था।
आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने इस अवसर पर स्वरचित गीत का भी संगान किया। कार्यक्रम में मुनि वर्धमानकुमार ने आचार्य से ग्यारह की तपस्या का प्रत्याख्यान किया।

Editorial

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