Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal

दो दिन तक निरन्तर पानी में चलने के बाद आज तीसरे दिन हमें पहली बार भूमि के दर्शन होने वाले थे। दोपहर एक बजे तक हम अलास्का की राजधानी जूनू पहुँचने वाले थे। अलास्का का सबसे बड़ा शहर एन्करेज है, उसके मुकाबले जूनू बहुत छोटा है फिर भी इसे राजधानी बनाने के पीछे अमेरिका की यह स्थापित धारणा है कि राजधानियां चूंकि प्रशासनिक क्षेत्र होती हैं इसलिये ये बड़े शहरों की व्यस्तता तथा गहमागहमी से दूर होनी चाहियें। अमेरिका के अधिकांश प्रदेशों की राजधानियां इसी तरह बड़े बड़े शहरों के बजाये छोटे छोटे दूरस्थ स्थानों पर खी जाती है। हमारे यहां इसका एकदम उल्टा है। तमाम राजधानियां बड़े बड़े शहरों में हैं। देश की राजधानी भी दिल्ली जैसे शहर में है। यही राजधानियां अगर छोटे छोटे दूरस्थ नगरों में हों तो जन सामान्य को सुविधा होती है, उस क्षेत्र का विकास होता है तथा बड़े बड़े शहरों पर अनावश्यक भार नहीं पड़ता।
जूनू की आबादी सिर्फ 32 हजार है फिर भी क्षेत्रफल के अनुसार यह पूर अमेरिका का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। मई से सितम्बर के बीच 5 महीनों में जरूर इसकी आबादी 6 हजार बढ जाती है। इस दौरान यहां रोजाना 3-4 क्रूज के जान आते है जिनसे इतने यात्री उतर कर दिन भर यहां रहते है। जून एक द्वी कारण यहां जल मार्ग और वायु मार्ग द्वारा ही पहुँचा जा सकता है। ग्लेशियरों, पहाड़ और जंगलों के कारण यहां सड़कें बनाना दुरूह है। जून शहर समुद्र किनारे ि थोड़े से समतल क्षेत्र में बसा है। आये दिन यहां 16 फीट तक ऊंची लहरें उठती रहती हैं। आसपास साढ़े तीन से चार हजार फीट ऊंचे बर्फीले पहाड़ है जि लगभग 30 ग्लेशियर बहते हैं। इनमें से दो ग्लेशियर तो शहर में घूमते हुए आसानी से दिखाई दे जाते हैं।
गर्मियों में यहां का उच्चतम तापमान 16-17 डि.से. तथा न्यूनतम 8-10 डि.से. रहता है। सर्दियों में उच्चतम 1-2 डि.से. तो न्यूनतम () 34 डि.से. जाता है। यहां प्रति वर्ष औसतन 88-90 ईन्च बर्फ गिरती है। जन सामान्य के आने जाने के लिये नौकाएं ही एकमात्र सहारा है क्यूंकि वायुयान सभी के बूते की बाह नहीं और वे जाते भी बड़े शहरों में ही हैं। नागरिकों के लिये निर्धारित जल बसें स्टीमर चलते हैं।
जून में बहुत कुछ देखने का था। इसका अधिकाधिक लाभ उठाने के लिये जहाज के पहुँचते ही उत्तर जाने की सोची। खाना उसके बाद ही शुरू होने वाला था इसलिये हमने भरपूर नाश्ता करने का तय किया। इसके पूर्व हम नहा-धो कर तैयार हो गये। प्रीति ने एक बेग में कुछ आवश्यक सामान रख लिया। चूंकि हम ग्लेशियर पर जाने वाले थे इसलिये जेकेट, टोपे, मफलर, ग्लव वगैरा सब रख लिये। खाने पीने का सामान तथा मेरी दवाएं भी रख लीं। | कुछ नाश्ता शुरू होते ही हम केफेटेरिया पहुँच गये। दो दिनों में जहाज के कई यात्रियों से जान पहचान हो गई थी। प्रीति तो इस मामले में प्रवीण थी। वह सबसे हंस हंस कर बात करती और हाल चाल पूछती। इस दौरान एक भारतीय दम्पत्ति से अच्छी मित्रता हो गई। ये गोवा के रेवनकर थे जो केलीफोर्निया में बसे हुए भी हमारे साथ ही खाना-नाश्ता करने लगे। हम लोग टेबल पर बैठे ही थे कि हम आकर हमसे नमस्कार किया और पास ही पड़ी कुर्सी पर बैठ गई। अपना परिचय दिया। वह भारतीय थी और बरसों से अमेरिका में रह रही थी। महिला उसने कहा कि जहाज पर इतने भारतीय है, कम से कम हम सबको आपस में चाहिये। इस महिला का नाम इन्द्रा था। वह बता रही थी कि पिछले 30% माली से वह अमेरिका में है फिर भी भारतीय भोजन के बिना नहीं रह सकती। उसने कि जहाज के अधिकारियों से लड़ झगड़ कर उसने कई भारतीय व्यंजन शुरू करवाए हैं।
इन्द्रा जिन्दा दिल और बिन्दास थी। उससे मिल कर सब प्रसन्न हुए। मैंने उससे कहा कि यह एक दिन पूर्व मिलती तो सब भारतीय मिल कर 15 अग. का कार्यक्रम करते उसे भी यह बात पसन्द आई और अफसोस हुआ। उसने कहा कोई बात नहीं, अभी तो 5 दिन और साथ रहना है, सब भारतीय आपस में मिलते रहेंगे तो अच्छा रहेगा। इसके बाद वह चली गई। नाश्ता समाप्त करते करते जहाज किनारे पहुँचने वाला था। हम सब लोग खुले डेक पर पहुँच गये। अथाह जल राशि की बजाय अब क्षितिज पर हिमाच्छादित पहाड़ियां नजर आने लगीं। जूं जूं जहाज किनारे के नजदीक पहुँचने लगा पानी के रंग में अन्तर नजर आने लगा। समुद्र का पानी गहरा नीला था जबकि किनारे का पानी हल्का हरा नजर आ रहा था। शीघ्र ही जहाज हरे पानी में प्रवेश कर गया। जून का डाउन टाउन इलाका और बन्दरगाह नजर आने लगा।
एक व्हिसल के बाद जहाज से घोषणा होने लगी कि यात्री उतरने के लिये होड़ नहीं मचाएं। सब एक साथ उतरना चाहते थे मगर जहाज के गलियारे संकड़े थे, लिफ्ट की क्षमता सीमीत थी घोषणा के बावजूद चौथे डेक के गलियारे तथा यहां पहुँचने हेतु लिफ्टें यात्रियों से पट गई। यात्रियों को किस समय तक वापस लौटना है इसकी भी चेतावनी दी जा रही थी। हम भी नीचे उतरने के लिये लाईन में लग गये। लिफ्टें तो फटाफट काम कर रही थी मगर लिफ्ट के बाहर खड़े रहने तक की जगह नहीं थी। ढेर सारे यात्री सीढीयों से उतर रहे थे। गलियारे लोगों से जाम हो गये।
प्रत्येक यात्री को अपने कमरे की चाबी बताना जरूरी था। चाबी ही उसकी। पहचान थी। अधिकारी इस चाबी को स्वाईप करते तो कम्प्यूटर में यात्री का चित्र वरण उभर आता, अधिकारी इसे देख यात्री को जाने दे रहे थे जहाज से । एक बड़ा गेग प्लेन्क लगाया गया था जिससे उतर कर सभी यात्री तट पर बनी अस्थाई सीढीयों तक पहुँच रहे थे।
नीचे उतरते ही मेले सा दृश्य नजर आया। हजारों की संख्या में पर्यटकों की रेलमपेल मची हुई थी। दरअसल हमारे जहाज से कुछ समय पूर्व ही एक अन्य कूज का जहाज भी किनारे लगा था। इसका जहाज हमारे जहाज से डेढ़ गुने से भी ज्यादा बड़ा प्रतीत हो रहा था। इस जहाज से लगभग ढाई तीन हजार यात्री उतरे थे, उन्हीं की वजह से यहां इतनी भीड़ नजर आ रही थी।
अस्थाई सीढीयों से उतरे तो सामने ही ढेर सारे स्टाल नजर आ गये। इन स्टालों पर जूनू के दर्शनीय स्थलों हेतु टिकट बेचे जा रहे थे। हमने तो जहां जहां जाना है उसके टिकट पहले ही बुक करा लिये थे। जो यात्री अन्तिम समय तक तय नहीं कर पा रहे थे कि कहां जाना है, क्या देखना है, वे इन स्टालों पर, देख दाख कर तय कर रहे थे। जून में देखने के कई स्थान थे, समय सीमित था, इतने कम समय में सब देखना मुमकिन भी नहीं था। हर स्थल के टिकट भी बहुत मंहगे थे। हमने हेलीकोप्टर राईड बुक कराई थी जिसके 300 डालर प्रति व्यक्ति लग गये। ऐसे ही सी प्लेन की राईड थी वह और भी महंगी थी। इसी तरह कुत्तों द्वारा खींचे जाने वाली स्लेज गाड़ियों की सवारी के टिकट तो 600 डालर प्रति व्यक्ति थे। इन स्टालों पर यही टिकट और भी मंहगे मिल रहे थे।
तट पर ही जून का डाउन टाउन इलाका था। यहां तरह तरह की दुकानें यात्रियों से गुलजार हो रही थी ज्वेलरी, सोविनिर कपड़ों व खाने-पीने की दुकानों का जमावड़ा था। सभी पर्यटकों पर ही निर्भर थे। रोज दोपहर 1 बजे से जहाज किनारे लगने शुरू हो जाते थे। इसके पूर्व इन्हीं बाजारों में कोई आये तो कर्फ्यू जैसा सन्नाटा नजर आता है।
Editorial

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