Opposition Alliance Cracks
राज कुमार सिंह... पिछले दिनों चौधरी देवीलाल की 110वीं जन्म जयंती पर हरियाणा के कैथल में आयोजित सम्मान दिवस रैली विपक्षी गठबंधन आइएनडीआइए की एकजुटता के प्रदर्शन का पड़ाव बन सकती थी, लेकिन वहां तो दरारें ही उजागर हुई। जदयू के एक बड़े चेहरे केसी त्यागी के एलान के बाद उम्मीद जगी थी कि इस रैली में इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) को भी आइएनडीआइए में शामिल कर उसका कुनबा बढ़ाया जाएगा, लेकिन कांग्रेस के प्रतिकूल रूख के चलते ऐसा नहीं हो पाया। शायद इसीलिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव भी रैली में नहीं आए आए तो शरद पवार, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे भी नहीं, पर मंच से ही जिस तरह कटाक्ष करते हुए नसीहतें दी गईं, वे कांग्रेस के लिए चेतावनी भी हैं और आइएनडीआइए में शह-मात का खेल शुरू होने के संकेत भी । केसी त्यागी ने कटाक्ष किया कि हम 10 की 10 सीटें भाजपा से हारने को तैयार हैं। फारूक अब्दुल्ला बोले कि अकेले हम भाजपा को नहीं हरा सकते। सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि बड़े दल अहंकार छोड़ें तो डेरेक ओ ब्रायन की नसीहत थी कि अपना इगो अपनी जेब में रखें। पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने इस रैली के विरोध में पहले ही मोर्चा खोल दिया था, फिर भी इनेलो के प्रधान महासचिव अभय सिंह चौटाला ने सोनिया गांधी को न्योता भेजा। लगा कि विपक्षी एकता की जरूरत को समझते हुए कांग्रेस कोई रास्ता निकालेगी, पर वैसा हुआ नहीं। कांग्रेस ने अपना प्रतिनिधि भी भेजने से परहेज किया। संकेत है कि हुड्डा की नाराजगी की कीमत पर कांग्रेस इनेलो को आइएनडीआइए में शामिल करने का जोखिम उठाने को तैयार नहीं है।
हुड्डा और देवीलाल परिवार का परस्पर राजनीतिक विरोध किसी से छिपा नहीं है। हरियाणा में 'ताऊ' के नाम से लोकप्रिय देवीलाल देश में तीसरे मोर्चे की राजनीति के अग्रणी नेता रहे। 1989 में जब केंद्र में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी, तब वह प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए। उन्हीं देवीलाल को एक नहीं, तीन बार रोहतक लोकसभा सीट से हरा कर हुड्डा ने राजनीतिक छलांग लगाई। जब 2005 में हुड्डा पहली बार मुख्यमंत्री बने तो भी सत्ता उन्होंने देवीलाल के बेटे ओमप्रकाश चौटाला से ही छीनी। चौटाला आरोप लगाते रहे हैं कि शिक्षक घोटाले में उन्हें फंसाने की साजिश हुड्डा ने ही रची। इनेलो का राजनीतिक पराभव शुरू होने के बाद कई बड़े नेता कार्यकर्ता कांग्रेस में गए, जो आज हुड्डा के करीबी माने जाते हैं। ऐसे में हुड्डा को आशंका है कि हरियाणा विधानसभा में एक विधायक तक सिमट गई इनेलो गठबंधन के सहारे मजबूत हुई तो उनका जनाधार और कांग्रेस में असर, दोनों कमजोर होते जाएंगे। हुड्डा ने इस तर्क का सहारा लिया है कि हरियाणा में कांग्रेस मजबूत है और अकेले दम पर भाजपा को हरा कर सरकार बना सकती है।
हरियाणा उन चंद राज्यों में से है, जहां कांग्रेस आज भी मजबूत है, पर कितनी ? लगातार दो विधानसभा चुनाव कांग्रेस हार चुकी है। 2014 में तो उसे मुख्य विपक्षी दल का दर्जा भी नहीं मिला । 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला, जबकि भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उनके पुत्र दीपेंद्र, दोनों चुनाव लड़े। हुड्डा की बड़ी समस्या इनेलो हो सकती है, पर आम आदमी पार्टी भी कम नहीं, जो आइएनडीआइए की घटक है और दिल्ली पंजाब में सत्तारूढ़ भी । हरियाणा में तो विधानसभा चुनाव लोकसभा के बाद होंगे, पर जिन राज्यों में पहले हैं, वहां आम आदमी पार्टी के दबाव से निपटना कांग्रेस के लिए बड़ी मुश्किल होगी। कांग्रेस जानती है कि अभी तक उसकी जमीन खोदती रही आम आदमी पार्टी अब उसके जनाधार के सहारे अन्य राज्यों में खुद को खड़ा करना चाहेगी। तेलंगाना और मिजोरम से नदारद आम आदमी पार्टी का पूरा ध्यान राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ पर है, जहां कांग्रेस भाजपा के बीच सीधा मुकाबला होता रहा है। इसीलिए कांग्रेस चाहती है कि लोकसभा सीट बंटवारे पर बात इन विधानसभा चुनावों के बाद हो, पर अन्य दल भी सत्ता के खेल में नौसिखिए नहीं हैं। वे इस काम को 30 सितंबर तक निपटाने का दबाव बना रहे हैं।
स्पष्ट है जब लोकसभा सीटों पर बात होगी तो जिन राज्यों में उससे पहले विधानसभा चुनाव हैं, वहां की बात भी करनी पड़ेगी। दबाव बढ़ाने के लिए ही आम आदमी पार्टी ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में उम्मीदवारों की पहली सूची जारी भी कर दी। राजस्थान में वह बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारना चाहती है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी ने उन सीटों पर भी उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं, जिन पर कांग्रेस के सिटिंग विधायक हैं। यह स्थिति तब है, जब दिल्ली सरकार के अफसरों के तबादले तैनाती के अधिकार छीन लेने वाले केंद्र के अध्यादेश का विरोध करने पर आम आदमी पार्टी ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की राह में रोड़ा न बनने की बात कही थी। ध्यान रहे कि मध्य प्रदेश और राजस्थान की कुछ सीटों पर सपा भी दांव लगाती रही है। रालोद का एकमात्र विधायक तो राजस्थान सरकार में मंत्री है । कैथल रैली के मंच से ही केसी त्यागी से लेकर सुखबीर सिंह बादल और डेरेक ओ ब्रायन तक ने विपक्षी एकता पर जो नसीहतनुमा चेतावनियां दी हैं, वे कांग्रेस के लिए शुभ नहीं हैं। हाल में आइएनडीआइए के एक बड़े नेता ने कहा था कि कांग्रेस को गलतफहमी हो गई है कि केंद्र में उसकी सरकार आने वाली है। जो उन्होंने नहीं कहा, वह यह कि यह गलतफहमी दूर भी की जा सकती है।
Editorial

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