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अलास्का जहाज यात्रा 25 : जिस ग्लेशियर ने ग्लोबल वार्मिंग के सिद्धान्त को झुठला दिया
By EditorialPublished on
धूप बहुत तेज थी मगर बर्फानी हवाओं के कारण अत्यन्त सुहानी लग रही थी किनारे पर ही कई बेन्यों लगी हुई थी। हम यहीं बैठ कर धूप में बदन सेकने लगे। जहाज सामने ही खड़ा था, वक्त होते ही बैठ जायेंगे सोच कर जहाज में लौटने वाल को देखते रहे, सबके हाथों में थैले थे, कुछ न कुछ खरीददारी हो ही जाती है। खरीददारी भी एक तरह की लत है, लोग बिना जरूरत के ही सामान खरीद लेते हैं. राजा भी उन्हीं में से था, कुछ न कुछ खरीदता ही रहता था।

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धूप बहुत तेज थी मगर बर्फानी हवाओं के कारण अत्यन्त सुहानी लग रही थी किनारे पर ही कई बेन्यों लगी हुई थी। हम यहीं बैठ कर धूप में बदन सेकने लगे। जहाज सामने ही खड़ा था, वक्त होते ही बैठ जायेंगे सोच कर जहाज में लौटने वाल को देखते रहे, सबके हाथों में थैले थे, कुछ न कुछ खरीददारी हो ही जाती है। खरीददारी भी एक तरह की लत है, लोग बिना जरूरत के ही सामान खरीद लेते हैं. राजा भी उन्हीं में से था, कुछ न कुछ खरीदता ही रहता था।
जब बहुत देर धूप में बैठ लिये तो उठ कर चहल कदमी करने लगे। इस बीच प्रीति व मुनीश भी इधर उधर घूम धाम कर लौट गये तो सब जहाज में चढ़ गये। लंच होने वाला था। उपरी डेक पर विभिन्न गतिविधियां जारी थीं। शीघ्र ही जहाज पूरा दिन और रात भर चल कर अगले दिन कनाडा पहुंचने वाला था। यू बीच बीच में कई बार जहाज कनाडा की सीमाओं के पास से गुजरा था। हर बार फोन में मेसेज आ जाता था वेलकम टू कनाडा, सीमा से बाहर निकलते तो वेलकम टू यू. एस. ए. आ जाता था। मेरे फोन में दोनों देशों की अलग अलग थी बार बार इन्हें बदलना पड़ता था। भारत में जब मुझे सिम बदलना सिखाया तो बहुत कटाला लगा, मगर अब आदत पड़ गई थी। फोन पर सिग्नल आते तो नेट भी चलता रहता। यही कारण था कि आज छठा दिन हो गया था फिर श्री 55 डालर में लिया हुआ वाई फाई अभी तक खत्म नही हुआ था।
धीरे धीरे जहाज का वातावरण शीतल होने लगा। अचानक ठंड लगने लगा. आई लोग डेक पर निकल कर धूप सेवन करने लगे। हम अलास्का और कनाडा की सीमा पर अवस्थित प्रसिद्ध हबार्ड ग्लेशियर की तरफ अग्रसर थे। ज्यू ज्यू जहाज आगे बढ़ता गया ठंड बढ़ती रही। अचानक जहाज की गति कम हो गई, एसा लगा जैसे मंद गति से जहाज चल रहा हो। पानी में कुछ सफेद सफेद टूकड़े दिखाई देने लगे तो सोचने लगे कि यहां एसी गन्दगी किसने फैलाई है, मगर जहाज इनके निकट आया तो पता चला कि ये बर्फ के टुकड़े थे। छोटे-बड़े बर्फ के टूकड़ों की भरमार नजर आने लगी।
बर्फ का जो टूकड़ा उपर तैरता नजर आ रहा था उसका एक हिस्सा पानी के अन्दर भी था। यही आईस बर्ग या बर्फ की चट्टानें थी। इन आईस बर्ग से टकरा कर ही तो टाइटेनिक जहाज ध्वस्त हुआ था। हमारे जहाज के मंथर गति से चलने का भी यही कारण था कि किसी चट्टान से टक्कर नहीं हो जाये। धीरे धीरे बर्फ के टुकड़ों की संख्या बढती गई और इसके साथ ही तापमान भी कम होता गया।
अब तक की यात्रा में सिर्फ जूनू में हेलीकोप्टर से ग्लेशियर पर गये थे तब एहसास हुआ था कि हम अलास्का में है वरना जहाज के एशो आराम और सुखद वातावरण में लेशमात्र भी अनुभूति नहीं हुई थी कि हम अलास्का में हैं। पांच-सात साल पूर्व पहली बार जब मुनीश ने अलास्का यात्रा का प्रस्ताव रखा था तब मैं डर गया था और उससे कहा था कि इतने ठण्डे और बर्फीले प्रदेश में कैसे जा सकते हैं। वो भी 8 दिन के लिये, तब उसने कहा था कि एसा कुछ नहीं महसूस होता, आप तो कार्यक्रम बनाओ। उसके बाद मेरी बड़ी बहिन व कई अन्य परिजन अलास्का जाकर आ गये तो मेरा डर खत्म हो गया।
हम छः दिन से अलास्का में थे फिर भी अलास्का के नाम जैसी अनुभूति अभी तक नहीं हुई थी। आज पहली बार इन बर्फ की चट्टानों और ठंड से एहसास हो रहा था कि हम वाकई उस अलास्का में हैं जिसका नाम सुनते ही कंपकपी छूट जाती थी।
धीरे धीरे चारों तरफ पानी पर बर्फ के इतने टूकड़े तैरते नजर आने लगे कि एक पल के लिये तो एसा लगा जैसे हम बर्फ के मैदान के बीच से गुजर रहे हो। हम हबार्ड ग्लेशियर के नजदीक पहुँच रहे थे। यह ग्लेशियर समूचे उत्तरी अमेरिका का सबसे बड़ा टाइड वाटर ग्लेशियर है, अर्थात एसा ग्लेशियर जो समुद्र के अन्दर गिरता है। यह लगभग 11 कि.मी. चौड़ा और 125 कि.मी. लम्बा है, हालांकि यह लम्बाई-चौड़ाई ग्लेशियर की सक्रियता के दौरान और बढ़ जाती है।
हिमपात से गिरे बर्फ के उपर लगातार हिमपात से नीचे का बर्फ जम जाता है। तापमान के लगातार गिरने से बर्फ की परतें एक के उपर एक जमती रहती हैं. सदियां गुजर जाती हैं, नीचे का बर्फ जमा ही रहता है, यह सैंकड़ों फुट हो जाता है। बर्फ टूट टूट कर चट्टानों के रूप में अलग होकर समुद्र में गिरता रहता है, मगर यह जमे हुए बर्फ का आंशिक हिस्सा ही होता है। कई बार बहुत बड़ी बड़ी चट्टाने अचानक समुद्र में गिर जाती हैं तो दुर्घटना का कारण बन जाती हैं।
अन्टार्कटिका का लम्बार्ट ग्लेशियर वर्तमान में विश्व का सबसे बड़ा ग्लेशियर है। यह 112 कि.मी. चौड़ा और 4300 कि.मी. लम्बा है। इसका बर्फ ही 8 हजार फुट गहरा है। इसके मुकाबले हबार्ड ग्लेशियर तो बहुत छोटा है इसके बावजूद यह इतना बड़ा है कि अमेरिका का समूचा रोड आइलेण्ड प्रदेश भी इससे छोटा है।
हबार्ड ग्लेशियर जिस गति से बढ़ रहा है उससे ग्लोबल वार्मिंग का सिद्धान्त एक बार तो भ्रम सिद्ध हो जाता है। इसके निरन्तर विकास से जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के सिकुड़ने का सिद्धान्त मिथ्या सिद्ध हो जाता है। न केवल रुबाई वरन अमेरिका के समुद्र में मिलने वाले 7 अन्य ग्लेशियरों का भी बर्फ बढ़ता ही जा रहा है।
जहाज ज्यू ज्यू ग्लेशियर के समीप पहुँच रहा था, यात्रियों में रोमांच बढ़ता जा रहा था। हर कोई ग्लेशियर को अत्यन्त निकट से और निर्बाध रूप से देखना चाहता था, इसके लिये सभी लोगों ने बहुत पहले से सीटें रोक ली थी। जहाज पर बाहर का दृश्य देखने की पर्याप्त व्यवस्था थी। कुल 5 मंजिलों पर एसी जगहें थी जसे यात्री बाहर का नजारा देख सकते थे। इन 5 मंजिलों में 4 मंजिलों पर खुले जहाँ से बाहर का दृश्य देखो तो वातावरण की मार झेलनी पड़ती थी मगर 9 पर बना ओब्जर्वेशन डक एसा स्थान था जो जहाज का अंतरंग भाग था।
हीटर चलते रहते थे इसलिये वातावरण का असर नहीं होता था। ऑब्जर्वेशन डेक के तीन तरफ शीशे की बड़ी बड़ी खिड़कियां लगी हुई थी। खिड़किया इतनी बड़ी थीं कि बाहर का दृश्य एसा दिखाई देता था जैसे खिड़की हो ही नहीं। इन खिड़कियों के पास कुर्सियां व सोफे लगे थे, हरेक के आस पास छोटे छोटे टेबल पड़े थे जिन पर चाय-नाश्ता रखा जा सकता था। इस हिस्से के बीचों औष्टि एक बार व रेस्टोरेन्ट था। लोग बहुत पहले से इन कुर्सियों पर जम गये थे व माश्ता कर रहे थे। कई लोग बार से गिलास भर कर ला रहे थे और सेवन कर रहे थे।
इसके अलाज की तीसरी पांचवी, आठवी और दसवीं मंजिल पर खुले डेक थे। यहां बैठने की कोई व्यवस्था नहीं थी। सब को खड़े होकर ही बाहर का नजारा देखना पड़ता था, यहां खड़े होने का लाभ यह था कि आप प्रकृति के सीधे में आ जाते हैं। चारों मंजिलों के डेक मर चुके थे। यात्री समुद्र में तैरती बर्फ की चट्टानों को समीप से देखने और इनके चित्र लेने में महसूल थे। मैंने तो ओब्जर्वेशन डेक में ही बैठने का फैसला किया ताकि ठंड का भी सामना नहीं करना पड़ेगा और ग्लेशियर आसानी से बैठे बैठे देखने का भी मजा ले सकूं। बाकी तीनों ने खुले डेकों पर अपनी अपनी जगह तय कर ली।
जहाज ज्यू ज्यू ग्लेशियर के नजदीक पहुँच रहा था यात्रियों का रोमांच बढ़ता जा रहा था। दूर से दिखाई देने वाले सफेद सफेद पहाड़ों की श्रृंखला ने अब सफेद- नीले पहाड़ों का रूप ले लिया था। जून में ग्लेशियर पर चले जरूर थे, हेलीकोप्टर के उपर से नीचे के ग्लेशियर को देखा भी था मगर एसे नीले-श्वेत पहाड़ नहीं देखे थे। पहाड़ अभी दूर थे। ऐसे लग रहे थे जैसे कोई विशाल पेन्टिंग हमारे सामने हो, बार बार मन को समझाना पड़ रहा था कि यह काल्पनिक नहीं वास्तविक है।

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