public discourse in India
हृदयनारायण दीक्षित : बीते दिनों लोकसभा में भाजपा (BJP) और बसपा (BSP) सदस्य के बीच अमर्यादित घटना हुई। उसमें प्रयुक्त मानहानिकारक शब्द कार्यवाही से निकाल दिए गए हैं। राष्ट्र चिंतित है । मर्यादा विहीनता का सिलसिला नया नहीं है। कांग्रेस (Congress) की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी (President Sonia Gandhi) ने नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) को 'मौत का सौदागर' कहा था । राहुल गांधी ने इसी सिलसिले को जारी रखते हुए प्रधानमंत्री मोदी को 'चोर' कहा । वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इस खराब परिपाटी से कोई सीख नहीं ली। उन्होंने प्रधानमंत्री को रावण कह दिया। कांग्रेसी मणिशंकर अय्यर तो समय-समय पर भड़काऊ बयान देते रहते हैं। सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क भी ऐसे ही हैं। असदुद्दीन ओवैसी तो भड़काऊ और आपत्तिजनक बयान देने के अभ्यस्त हैं। ओवैसी ने एक चुनावी सभा में यह कहा था, 'योगी-मोदी हमेशा नहीं रहेंगे, तब तुमको कौन बचाएगा ?' कि 25 करोड़ मुसलमान 100 करोड़ हिंदुओं पर भारी पड़ सकते हैं। उन्होंने भगवान श्रीराम की माता कौशल्या के बारे में भी आपत्तिजनक बातें कही थीं। तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को कोरोना, मलेरिया और डेंगू बताते हुए उसके खात्मे का आह्वान किया। सनातन धर्म और रामचरितमानस के बारे में विवादास्पद टिप्पणियां जारी हैं। कुल मिलाकर सार्वजनिक विमर्श की भाषा का स्तर लगातार गिर रहा है। अमर्यादित वक्तव्यों से सार्वजनिक जीवन में कटुता बढ़ रही है।
अपने विचार के पक्ष में जनमत बनाना प्रत्येक दल और सामाजिक- राजनीतिक कार्यकर्ता का अधिकार है । संविधान निर्माताओं ने इसीलिए विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार बनाया था। सजग संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रीय संप्रभुता, अखंडता और लोक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली अभिव्यक्ति पर संयम के बंधन भी लगाए थे। विचार आधारित लोकमत निर्माण के लिए संयमपूर्ण अभिव्यक्ति की आवश्यकता होती है। सभा, गोष्ठी और विभिन्न कार्यक्रम अभिव्यक्ति के मंच हैं। संप्रति इंटरनेट मीडिया जैसे मंच विचार अभिव्यक्ति के नए अवसर उपलब्ध करा रहे हैं। इनमें व्यक्त विचार बहुत दूर तक जाते हैं, लेकिन इनका भी दुरूपयोग दिखाई पड़ता है। इनमें भी प्रायः शब्द संयम की मर्यादा का अभाव दिखता है।
सार्वजनिक विमर्श की भाषा संयमित ही होनी चाहिए । दल, समूह या अन्य संगठन परस्पर शत्रु नहीं होते, लेकिन शाब्दिक अराजकता के कारण राजनीतिक दलतंत्र में शत्रुता का भाव दिखाई पड़ रहा है। शब्द अनुशासन और संयम के टूटने से पतन की श्रृंखला बन गई है। अपशब्द उत्तेजित करते हैं। गाली जैसे जवाबी हमले होते हैं। अपशब्दों के प्रयोग से घृणा बढ़ती है। इसे उचित ही 'हेट स्पीच' कहा जा रहा है। टीवी पर होने वाली बहसों में अक्सर अपशब्द सुनाई पड़ रहे हैं। प्रतिभागियों में हाथापाई की नौबत भी आ जाती है। लोकतंत्र में स्वस्थ वाद-विवाद-संवाद जरूरी है। लोकतंत्र में आलोचना का महत्व है, लेकिन अपशब्दों का नहीं । मूलभूत प्रश्न है कि गाली जैसे अपशब्द प्रयोग की अपरिहार्यता क्या है? क्या अपना पक्ष अपशब्दों के प्रयोग से ही व्यक्त किया जा सकता है? क्या सम्मानजनक विरोध व्यक्त करने के लिए शब्द सामथ्र्य का अभाव है? क्या मानहानिकारक शब्द प्रयोग का कोई विकल्प नहीं है? क्या अपशब्द बोलने से ही राजनीतिक संभावनाएं बेहतर होती हैं ?
भारतीय दर्शन परंपरा में शब्द को ब्रह्म कहा गया है। महाभारत युद्ध से आहत व्यास ने कहा था कि 'शब्द अब ब्रह्म नहीं रहे ।' शब्द केवल ध्वनि नहीं हैं। प्रत्येक शब्द के गर्भ में अर्थ होता है। अर्थ का ध्यान रखते हुए ही शब्द का प्रयोग किया जाता है। पतंजलि ने महाभाष्य में शब्द के सम्यक प्रयोग पर जोर दिया है कि शब्द का सम्यक ज्ञान और सम्यक प्रयोग ही अपेक्षित परिणाम देता है। विपरीत विचार के प्रति आक्रामक होना स्वाभाविक है। डा. राममनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी और मधु लिमये आदि अनेक सांसद तत्कालीन सरकार पर आक्रामक रहते थे, लेकिन उनके शब्द प्रयोग वाक् सौंदर्य प्रकट करते थे। विपक्षी भी उनसे प्रेरित होते थे। संप्रति अपशब्दों ने सुंदर शब्दों को विस्थापित कर दिया है। अब शाब्दिक अराजकता का माहौल है।
समाज का गठन भाषा से हुआ। परस्पर संवाद हुआ। सहमति और असहमति भी चली । भाषा संस्कृति की संवाहक है । समाज को सांस्कृतिक बनाने का काम भी संयमपूर्ण भाषा से ही संभव है। भाषा विज्ञानी मौलनिवसी ने 1923 में कहा था कि 'भाषा सामाजिक संगठन का काम करती है।' ज्ञान, विज्ञान और दर्शन एवं राजनीतिक विचार भाषा के माध्यम से ही दूर-दूर तक प्रवाहित होते हैं । शब्द मधुरता भारत के राष्ट्रजीवन की अभिलाषा रही है। के अथर्ववेद में प्रार्थना है, हमारी वाणी मधुर हो। हम तेजस्वी वाणी भी मधुरता के साथ बोलें। वैदिक, पौराणिक साहित्य में मंत्रों, श्लोकों के छोटे विभाजनों को सूक्त कहा गया है। सूक्त वस्तुतः सु- उक्त हैं। सूक्त का अर्थ है सुंदर कथन । सूक्तियां भी सुंदर कथन हैं। ऋवेद में प्रार्थना है कि, 'हमारा पुत्र सभा में सुंदर बोले और यशस्वी हो ।'
भारत की संविधान सभा में भिन्न-भिन्न विचारधाराओं के महानुभाव थे। सभा में तमाम विषयों पर खूब तर्क - प्रतितर्क हुए, लेकिन वाक् संयम अनुकरणीय था । मधुर शब्दों में ही बात रखी जाती थी । नेता, सांसद और विधायक समाज को प्रभावित करते हैं। उनकी भाषा कार्यकर्ताओं को प्रभावित करती है । ऐसे प्रतिष्ठित पदधारकों को सोच-समझ कर बोलना चाहिए । यूरोपीय विद्वान वाल्टर लिपमैन ने यथार्थ ही कहा था कि उच्च पदस्थ लोग संस्थाओं के संचालक - प्रशासक मात्र नहीं होते, बल्कि वे अपने देश के राष्ट्रीय आदर्शों और अभिलाषाओं के संरक्षक होते हैं। इनके आदर्श आचरण द्वारा देश लोगों का योग नहीं बल्कि राष्ट्र बनता है। वर्तमान में अपशब्द प्रदूषण है। सार्वजनिक विमर्श की छंदबद्धता नष्ट हो रही है। यह राष्ट्रीय चिंता का विषय है। सार्वजनिक जीवन से जुड़े सभी महानुभाव सक्रिय हों और वाणी संयम की राष्ट्रीय आवश्यकता एवं राष्ट्रीय चिंता पर ध्यान दें। (लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं)
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