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जीव का स्वरूप है भाव : आचार्य महाश्रमण
By EditorialPublished on
सोमवार को तीर्थंकर समवसरण में आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने कहा कि अध्यात्म जगत में आत्मवाद और कर्मवाद का सिद्धान्त है। अध्यात्म के ये दो महास्तंभ हैं। आत्मा है तो फिर कर्म की बात होती है। भाव आत्मा और कर्म से जुड़ी हुई स्थिति है। कर्मों के उदय और विलय से निस्पन्न होने वाली आत्मा की अवस्था भाव है।

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मुंबई । सोमवार को तीर्थंकर समवसरण में आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) ने कहा कि अध्यात्म जगत में आत्मवाद और कर्मवाद का सिद्धान्त है। अध्यात्म के ये दो महास्तंभ हैं। आत्मा है तो फिर कर्म की बात होती है। भाव आत्मा और कर्म से जुड़ी हुई स्थिति है। कर्मों के उदय और विलय से निस्पन्न होने वाली आत्मा की अवस्था भाव है। यह भाव जीव का स्वरूप है। आत्मवाद और कर्मवाद के आलोक में हम भाव को देख सकते हैं। अज्ञानता की स्थिति ज्ञानावरणीय कर्म के उदय से होती है और उसके क्षायोपशमिक भाव से ज्ञान के विकास की बात होती है। हालांकि केवलज्ञानी के समक्ष तो किसी का कितना ज्ञान हो सकता है। किसी को इस जगत में विद्वान कहा जाए, किन्तु केवलज्ञानी के समक्ष उसके कितना मामूली ज्ञान हो जाता है। इसी प्रकार मोहनीय कर्म की स्थिति भी बनती है। आदमी को अपने भावों को अच्छा बनाने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री के सानिध्य में तेरापंथी महासभा के तत्त्वावधान में आयोजित ज्ञानशाला प्रशिक्षक सम्मेलन/दीक्षान्त समारोह के अंतिम दिन कार्यक्रम आयोजित हुआ। ज्ञानशाला के राष्ट्रीय संयोजक सोहनराज चोपड़ा व किशनलाल डागलिया ने विचार रखे। आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि विश्रुतकुमार ने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम के अंत में ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं ने प्रस्तुति दी। तेरापंथ महिला मण्डल मुम्बई ने भी प्रस्तुति दी।

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