Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan
अगले दिन 19 ता. हो गई। जहाज यात्रा का यह छठा दिन था। इसके बाद एक दिन की यात्रा और थी। जहाज सुबह 7 बजे ही केचीकेन पहुँच गया। यहां देखने के कोई खास आकर्षण नहीं थे इसलिये उतरने की जल्दी नहीं थी। यहां से जहाज वापस एक बजे के लगभग रवाना होने वाला था। कई लोग तो जहाज पर ही रूके रहे। हम लोग चाय नाश्ता कर नीचे उतर गये।
केचीकेन बहुत पुराना शहर है। एक छोटा सा बाजार है। आबादी भी बहुत कम है। जहाज से बाहर निकलते ही तीखी हवा के थपेड़ों से कंपकंपी छूट गई। धूप अच्छी निकली हुई थी, इसके ताप के बावजूद भी हवाओं के कारण ठंड लग रही थी। बन्दरगाह के पास ही बस्ती बसी हुई थी। पुराने जमाने में यह मल्लाहों का ठिकाना था, उस जमाने की कई दुकानें अब म्यूजियम बना दी गई हैं जो पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र हो गई हैं। ये सब यहां की प्रसिद्ध क्रीक स्ट्रीट में अवस्थित हैं। क्रीक स्ट्रीट एक छोटे से नाले के किनारे स्थित संकड़ा सा बाजार है। बाजार नाले के दोनों किनारों पर हैं, नाले पर बीच बीच में कई स्थानों पर पुल बने हुए हैं। जहाज के लंगर डालते ही यहां चहल पहल हो जाती है। बाजार को इसके पुरातन स्वरूप में ही रखा गया है, किसी भी तरह के आधुनिक निर्माण की यहां अनुमति नहीं दी गई जिससे यह एक हेरिटेज स्थल बन गया। संकड़े बाजार में एक दूसरे से सटी छोटी छोटी दुकानों पर हर तरह की चीजें मिल रही थीं।
कभी उदयपुर के घंटाघर पर भी एसा ही एक सकड़ा बाजार हुआ करता था जो छोटी बोहरवाड़ी के नाम से प्रसिद्ध था। यहां पर्यटक क्या नगरवासी तक आकर आनन्द की अनुभूति करते थे। देव आनन्द की प्रसिद्ध फिल्म गाईड की तो इसी क्षेत्र में शूटिंग भी की गई थी। प्रशासकों तथा राजनेताओं में दूरदर्शिता के अभाव के कारण इस बाजार को ध्वस्त कर यहां चौड़ी सड़क बना दी गई, ठीक उसी तरह जैसे हल्दी घाटी के एतिहासिक दर्रे को तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद के वहां आगमन पर, पाट कर चौड़ी सड़क बना दिया गया। आज उदयपुर में छोटी बोहरवाडी अपने प्राचीन स्वरूप में होती तो पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र होती। अब भले ही रंग निवास से जगदीश चौक तक के बाजार को हेरिटेज वाक का नाम दिया जा रहा हो फिर भी वो बात नहीं।
क्रीक स्ट्रीट में एक पुराने नाच घर को भी संरक्षित रखा गया है। यह उस जमाने का चकला या वैश्यालय था। नाविक अपनी नावों के सफर में दूर दूर से आते थे और यहां समय व्यतीत करते थे। पास के नाले में सेमन मछलियों की भी भरमार थी। उपर से देखने पर ही इनके गुच्छे के गुच्छे नजर आ जाते थे। केचीकेन आदिवासियों के टोटम पोलों हेतु भी बहुत प्रसिद्ध है। यहां टोटम पोल का सबसे बड़ा म्यूजियम है।
पुराने बाजार में थोड़ी देर घूम घाम कर हम वापस बन्दरगाह पर आ गये। जहाज चलने में अभी काफी समय था इसलिये यहां बनी दुकानों पर ही मटरगश्ती करने लगे। ये दुकानें अत्यन्त आधुनिक थी, बड़े बड़े शोरूम और डिपार्टमेन्टल स्टोर थे। यहां हमें एक दिलचस्प हकीकत देखने को मिली। यहां की ज्यादातर दुकानें ज्वेलरी स्टोर थी। मैं ताज्जुब कर रहा था कि इतने दूरस्थ स्थान पर ज्वेलरी खरीदने कौन आता होगा। एक के बाद एक कतार बड़े बड़े ज्वेलरी शो रूम लगे थे। इन सब शोरूम को चलाने वाले लोग ज्यादातर भारतीय ही थे। इतने सारे भारतीयों को इस ठंडे प्रदेश में देखकर अचरज भी हुआ और खुशी भी।
दरअसल में हम एक दुकान में सामान देख रहे थे, इसके एक हिस्से में ज्वेलरी के काउन्टर लगे थे। वहां खड़ा आदमी मुझे भारतीय लगा, मुझे अचरज हुआ, • गौर से उसे देखा तो मुझे लगा यह कहीं सिन्धी तो नहीं। मैंने अचानक ही पुलिया कि क्या आप सिन्धी हो। वह व्यक्ति मेरा मुँह देखने लगा, वो कोई उसके पहले ही राजा ने मुझे डपट दिया कि हर किसी को कुछ भी बोलते. हो मैं कुछ बोलता उसके पहले ही उस व्यक्ति ने सिन्धी भाषा में मुझे पूछ कि क्या आप भी सिन्धी है। मेरी प्रसन्नता का पारावर नहीं था, राजा की देखने जैसी थीं।
मैंने उसे बताया कि मैं सिन्धी तो नहीं हूं मगर सिन्धी समुदाय के बहुत दक जरूर रहूँ। पूरा बचपन सिन्धियों के बीच ही गुजरा, कई मेरे परम मित्र सिन्धी है। मैंने उससे पूछ लिया कि आप भारत में कहां से है, उसका जवाब फिर आश्चर्य में डालने वाला था। वह बोला कि उसने भारत आज दिन तक देखा ही नहीं है, हालांकि उसकी बड़ी तमन्ना है कि एक बार भारत आये। इस पर मैंने कहा कि आप जरूर पाकिस्तान के होगे, इस पर भी उसने इन्कार कर दिया तो मेरा कुतुहल बढ़ गया।
उसने बताया कि विभाजन के समय जब अधिकांश लोग सिन्ध छोड़ कर भारत जा रहे थे तब कई परिवार बजाये भारत जाने के विश्व के अन्य स्थलों में भी चले गये। उनका परिवार अफ्रीका चला गया था। मैंने स्वाभाविक रूप से पूछ लिया कि अफ्रीका तो बहुत दूर है, आप अलास्का कैसे आ गये। उसने बताया कि वे साल ई बार महीने के लिये यहां आते हैं और वापस अफ्रीका चले जाते हैं। अफ्रीका के मोजाम्बिक या शायद किसी अन्य देश का नाम लेते हुए उसने बताया कि वहां हमारा ज्वेलरी का बहुत बड़ा शो रूम है। यहां हम चार महीने का ठेका लेते हैं, हमें सिर्फ सामान लेकर आना पड़ता है, शो रूम, फर्नीचर वगैरा सब ठेके में शामिल होते हैं। उसने बताया कि क्रूज के कारण अच्छा धन्धा हो जाता है। ज्वेलरी बहुत महनी महंगी थी, दो चार ग्राहक पट जाये तो भी काम हो जाता है। कूल में कई धनी स्त्रियां आती हैं जो शौक के लिये खरीददारी करती है। उसने बताया कि सितम्बर के मध्य तक हम सब वापस अपने अपने देश लौट जाते हैं। इसके बाद तो यहां हर चीज जम जाती है, चारों तरफ बर्फ ही बर्फ हो जाती है।
यहां से निकले तो अन्य दुकानों पर भी मेरी रूची बढ़ गई। यहां भी सब भारतीय ही नजर आ रहे थे। यहां खड़े व्यक्ति से भी मैंने वही सवाल कर लिया कि क्या आप सिन्धी हैं, शकल सूरत से यह भी बिल्कुल वैसा ही लग रहा था। उसने मुस्कुरा कर सिर हिलाया और कहा नहीं, वह गुप्ता है। उसके इन्कार करते ही राजा को मजा आ गया और मेरी मजाक उड़ाने लगा अपने आप को बहुत होशियार समझते हो हो गई न चोपसी गुप्ता अग्रवाल भी होते हैं तो मैंने अब उससे पूछा कि आप अग्रवाल है क्या तो इस बार उसने हा कर दिया, अब वापस मैंने राजा की तरफ विजयी निगाहों से देखा तो वह मुँह बिगाड़ने लगा।
गुप्ता को जब मैंने बताया कि मैं भी अग्रवाल हूँ तो उसे भी प्रसन्नता हुई। गुप्ता इस शोरूम पर नौकरी करता था। वह दक्षिणी अमेरिका के किसी छोटे से देश में रहता था। उसकी कम्पनी की दुनिया भर में ज्वेलरी की दुकानें थी, कभी यहां तो कभी कहां, उसका ट्रांसफर होता ही रहता था।
भारतीय हमेशा उद्यमी और दुस्साहसी रहे हैं, व्यापार धन्धे की तलाश में वे दुनिया के कोने कोने में पहुँच गये हैं। अलास्का जैसे बर्फीले और दूरस्थ प्रदेश में भी हिन्दुओं की अपेक्षाकृत उपस्थिति अच्छी है। हिन्दु अलास्का की पूरी आबादी का आधा प्रतिशत है। दुनिया के सबसे ठण्डे और सबसे उत्तर के स्थान पर स्थित हिन्दु मन्दिर अलास्का में ही है।
अलास्का के प्रमुख शहर एन्करेज में 1995 में भगवान गणेश के मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा की गई। यह भी आश्चर्य की बात है कि यहां स्थापित गणेश जी की प्रतिमा एक अन्य दूरस्थ प्रदेश हवाई स्थित हिन्दु संगठन द्वारा प्रदान की गई। मन्दिर की स्थापना में एन्करेज के नील भार्गव की प्रमुख भूमिका रही। भारत में तो मन्दिरों में श्रद्धालु प्रतिदिन जाते हैं मगर यहां की विषम परिस्थितियों के कार प्रत्येक रविवार को ही यहां श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। साधारणतया 25-30 लोग आ जाते हैं, जो अपना अपना खाना साथ लाते हैं और सब सामूहिक रूप से ग्रहण करते है। त्यौहारों तथा पवों पर जरूर 50-60 लोग एकत्र हो जाते हैं।
Editorial

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