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हरजिंदर.... आशंकाए अक्सर हकीकत से बहुत की हैं। जिस शाम यह खबर आई कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने महिला आरक्षण (Women's reservation) से जुड़े विधेयक को हरी झंडी दे दी है, इसे मास्टर स्ट्रोक बताते हुए कई विश्लेषकों ने 'इंडिया' (India) गठजोड़ के लिए श्रद्धांजलि तैयार करनी शुरू कर दी। कहा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने इस फैसले से विपक्षी गठजोड़ की दुखती रंग पर चोट की है। उन्हें लगता था, इस फैसले से सबकी अपनी राजनीति के सामने धर्मसंकट खड़ा हो जाएगा और गठजोड़ के बहुत सारे छिपे हुए अंतर्विरोध सतह पर आ जाएंगे।
इसके साथ ही 2010 के वे सारे दृश्य याद आ गए, जब राज्यसभा
(rajyasabha)
में बिल पेश करते समय महिला सांसदों ने कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज के आस-पास सुरक्षा घेरा बना लिया था । उस मौके पर जो दल अशोभनीय दृश्यों का कारण बने थे, वे सभी इस समय विपक्षी गठजोड़ 'इंडिया' में अच्छी हैसियत में हैं। आशंकाओं के पीछे से वे सारी स्मृतियां झांक रही थीं। भारत में विपक्षी एकता का इतिहास यही रहा है कि उसकी जमीन के नीचे जब खदबदाहट शुरू होती है, तो फिर बिखराव किसी के रोके से नहीं रूकता है। इसलिए सारे डर स्वाभाविक ही थे, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। साल 2010 में जिस तरह विधेयक के लिए उनमें तलवारें खिंच गई थीं, इस बार वैसा ही विधेयक आने पर किसी ने धैर्य नहीं खोया । इतना ही नहीं, उन्होंने विधेयक के समर्थन में वोट भी दे दिया ।
आप कह सकते हैं कि इस बार विरोध का कोई मतलब भी नहीं था, विधेयक तो वैसे भी पास हो ही जाना था । विरोध अगर उग्र होता, तो छह महीने बाद होने वाले आम चुनाव में सबको नुकसान होता, लेकिन नुकसान की परवाह इस बार वे सियासी दल कर रहे थे, जो इसके पहले तक ऐसी परवाह नहीं किया करते थे ।
यहां इस आरक्षण विधेयक से अलग कुछ और बातों पर गौर कर लेते हैं। कुछ ही समय पहले गठबंधन के संयोजक को लेकर लालू यादव (Lalu Yadav) के एक बयान पर मीडिया में बहुत सारी चर्चा हुई थी । ये चर्चाएं भी होती रहीं कि कौन किस बैठक में नहीं गया, कौन प्रेस होते हैं कि कोई ओर-छोर ही हाथ नहीं समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) की झोली में इतने वोट डाल कॉन्फ्रेंस से गैरहाजिर था, कौन किससे रूठ गया वगैरह। बस खबरें ही सुनाई दीं, इसके आगे कोई चिनगारी भड़कती नहीं दिखाई दी। विपक्षी गठजोड़ में दिख रही यह परिपक्वता भारतीय राजनीति के लिए एक नई चीज है और इसलिए महत्वपूर्ण भी है। हो सकता है कि 'नारी शक्ति वंदन विधेयक' एक मास्टर स्ट्रोक रहा हो, लेकिन इंडिया ब्लॉक की इस नईपरिपक्वता ने उसे निस्तेज तो कर ही दिया।
कई राजनीतिशास्त्रियों ने लिखा है कि दुनिया के सारे बहुदलीय लोकतंत्र आखिर में दो दलीय व्यवस्था में बदल जाने को अभिशप्त होते हैं। एक दल का प्रभुत्व जब बढ़ता है, तो बाकी ज्यादातर दल मिलकर उसके खिलाफ मोर्चा बना लेते हैं और व्यावहारिक रूप से दो दलीय व्यवस्था ही बन जाती है, लेकिन भारत में 1977 के उदहारण को छोड़ दें, तो ऐसा कभी हुआ नहीं। हमारे यहां, खासकर जो क्षेत्रीय दल हैं, उन सबकी अपनी मथुरा तीन लोक से न्यारी रही है, जिसके आग्रह उनको दूसरे से ज्यादा जुड़ने नहीं देते। आप चाहें, तो इसका कारण इन दलों के जातिगत आधार में देख सकते हैं, उनके परिवारवाद में देख सकते हैं या उनके अपने निहित हितों में देख सकते हैं। कारण कुछ भी हो, लेकिन भारतीय राजनीति की हकीकत यही रही है। हमारे चुनावों में त्रिकोणीय मुकाबले आम बात रहे हैं। कई बार तो कुछ जगह मुकाबले के इतने कोण लगता ।
पिछले एक दशक में सोशल मीडिया और बिग डाटा ने भारतीय समाज को बहुत तेजी से बदला है और इसका सबसे सीधा असर राजनीति पर भी पड़ा है। इस पर काफी कुछ कहा और लिखा गया है कि सोशल मीडिया ने किस तरह से समाज का ध्रुवीकरण कर दिया है। खासकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण 'मनसा वाचा कर्मणा' जितना अब दिखता है, उतना पहले कभी नहीं दिखता था । यह एक खतरनाक बदलाव है। ठीक यहीं पर एक और बदलाव हुआ है, जो भले ही उतना खतरनाक न हो, पर काफी महत्वपूर्ण है। सोशल मीडिया और बिग डाटा के इस्तेमाल के बाद राजनीति का भी तेजी से ध्रुवीकरण हुआ है। अब आमतौर पर मुकाबले सीधे होते हैं और तीसरा दल पूरी तरह से हाशिये पर चला जाता है। पिछले दिनों कर्नाटक के विधानसभा चुनाव को याद कीजिए। वहां मुकाबला सीधा भाजपा
(bjp)
और कांग्रेस (congress) में था । इस तीखे मुकाबले में क्षेत्रीय स्तर पर कभी मजबूत पकड़ रखने वाला और अक्सर किंग मेकर बनने वाला जनता दल सेकुलर पूरी तरह दरकिनार हो गया। इसके पहले हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा (vidhansabha) के पिछले चुनाव को देखें। वहां भाजपा और सपा की लड़ाई में बहुजन समाज पार्टी पूरी तरह से हाशिये पर चली गई। भाजपा यह चुनाव बहुत आराम से जीत गई, लेकिन ध्रुवीकरण के दबाव ने दिए, जितने वोट इस पार्टी को उसके पूरे इतिहास में कभी नहीं मिले थे। यही उत्तर प्रदेश के साथ ही हुए पंजाब (panjab) विधानसभा चुनाव में दिखा। मुख्य मुकाबला आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) और कांग्रेस में हुआ, और वह अकाली दल
(Akali Dal)
दरकिनार हो गया, जो पंजाब की सबसे महत्वपूर्ण ताकत हुआ करता था।
इस बार जो विपक्षी एकता हमें दिख रही है, उसके पीछे यही दबाव काम कर रहे हैं। यह डर सबको सता रहा है कि अगर विपक्षी दल मिलकर एक ध्रुव नहीं बनते हैं, तो उनमें से कई हाशिये पर चले जाएंगे। अगर माकपा और तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) एक ही घाट का पानी पीते दिख रहे हैं, तो यह काम राजनीतिक ईको सिस्टम के किसी बड़े दबाव के बिना तो नहीं ही हो सकता। विपक्षी एकता के बारे में एक बात हमेशा से कही जाती रही है कि विपक्षी पार्टियां साल भर एक दूसरे से अलग नहीं रह सकतीं और छह महीने तक एक साथ नहीं रह सकतीं। इंडिया ब्लॉक को बने हुए अभी छह महीने नहीं हुए हैं, इसलिए उसके टिकाऊपन के बारे में किसी नतीजे पर पहुंचने का समय नहीं आया है। अभी यह देखना शेष है कि नई राजनीति के दबाव एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो जाने की पुरानी फितरत पर कितने भारी पड़ते हैं। इंडिया ब्लॉक अगर अपनी ताजा परिपक्वता को बरकरार रख पाया, तो अगला आम चुनाव वाकई काफी दिलचस्प हो जाएगा।
Editorial

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