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संजय गुप्त... पिछले कई वर्षों से लंबित महिला आरक्षण (Women's reservation) विधेयक अंतत: संसद के दोनों सदनों से पास हो गया । नारी शक्ति (Female power) वंदन नाम वाला यह विधेयक लोकसभा (loksabha) और विधानसभा (vidhansabha) में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण सुनिश्चित करेगा। यह विधेयक कानून का रूप लेने के बाद कुछ वर्षों बाद ही अमल में आ सकेगा, क्योंकि उसे लागू करने के पहले जनगणना होगी और फिर परिसीमन । परिसीमन आयोग ही तय करेगा कि कौन सी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। फिलहाल महिला आरक्षण की व्यवस्था 15 वर्ष के लिए की गई है। 15 वर्ष बाद इसकी समीक्षा होगी और संसद चाहेगी तो उसे आगे बढ़ा सकती है। महिला आरक्षण विधेयक सबसे पहले 1996 में देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार लाई थी, लेकिन वह कई दलों के विरोध के चलते पारित नहीं हो सका। इसके बाद वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार और मनमोहन सिंह
(manmohan singh)
के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ने भी उसे पारित कराने की कोशिश की, लेकिन बात बनी नहीं, क्योंकि दोनों ही सरकारों के कई घटक उसका विरोध कर रहे थे । मनमोहन सरकार ने किसी तरह 2010 में राज्यसभा से महिला आरक्षण विधेयक पारित करा लिया, लेकिन वह लोकसभा से पारित नहीं करा सकी और समय के साथ वह ठंडे बस्ते में चला गया।
राजनीति में महिला आरक्षण की आवश्यकता केवल इसलिए नहीं है कि आधी आबादी महिलाओं की है, बल्कि इसलिए है, क्योंकि वे सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़ी हुई हैं। उनकी स्थिति तभी सुधरेगी, जब नीति निर्धारण में उनकी भूमिका बढ़ेगी। अभी पुरूष प्रधान समाज होने के कारण महिलाओं को राजनीति में आगे बढ़ने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ता है। आरक्षण से उन्हें राजनीति में जगह बनाने में आसानी होगी । जनगणना और परिसीमन के कारण महिला आरक्षण संभवतः 2029 के आम चुनावों
(election)
में ही प्रभावी हो सकेगा। हर पांच साल में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें बदलती रहेंगी, लेकिन यदि कोई महिला सांसद बेहतर प्रदर्शन करती है तो संबंधित दल उसे अनारक्षित सीट से भी चुनाव लड़ा सकते हैं। इसके चलते महिला जनप्रतिनिधियों का प्रतिशत 33 प्रतिशत से अधिक भी हो सकता है ।
प्रधानमंत्री मोदी (PM Modi) 2014 से ही महिलाओं का सामाजिक दर्जा बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहे हैं। उनकी सरकार ने बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान शुरू किया। इसके अलावा उन्होंने उज्जवला रसोई गैस और शौचालय निर्माण की जो योजना शुरू की, उसका सबसे अधिक लाभ महिलाओं को ही मिला । जनधन खातों में भी महिलाओं की भागीदारी 55 प्रतिशत है । मुद्रा योजना के लाभार्थियों में भी 65 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं। महिलाओं को समर्थ बनाने वाली मोदी सरकार की अन्य योजनाएं भी प्रभावी हैं। इस सरकार ने तीन तलाक की कुप्रथा के खिलाफ कानून बनाकर भी मुस्लिम महिलाओं को एक बड़ी राहत दी ।
गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) पर जब संसद के नए भवन में संसदीय कामकाज शुरू हुआ तो पहले विधेयक के रूप में महिला आरक्षण विधेयक लाकर मोदी सरकार ने यही संकेत दिया कि वह सबसे पहला काम महिलाओं के सामाजिक उत्थान का करना चाहती है । हमारी महिलाओं को यह याद रहेगा कि संसद के नए भवन में सबसे पहला काम उनके हित में किया गया। पहले माना जा रहा था कि कुछ दल इस विधेयक का विरोध कर सकते हैं, लेकिन वह दोनों सदनों से बहुत आसानी से पारित हो गया । इस बार उन दलों ने भी महिला आरक्षण का समर्थन किया, जो उसे लेकर कुछ शिकायत कर रहे थे या फिर उसमें संशोधन चाह रहे थे। महिला आरक्षण विधेयक को व्यापक समर्थन मिलने का कारण यह रहा कि हर दल यह जान गया है कि पिछले कुछ चुनावों से महिला मतदाताओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी है। 2019 के आम चुनावों में तो पुरूषों से अधिक मतदान महिलाओं ने किया और यह बताया कि वे जनप्रतिनिधि चुनने में दिलचस्पी ले रही हैं।
महिला आरक्षण में ओबीसी को भी शामिल करने की मांग कई दलों ने की। इनमें कांग्रेस भी है, जिसने 2010 में राज्यसभा से पारित महिला आरक्षण बिल में ओबीसी को आरक्षण का प्रविधान नहीं किया था। इस बार सोनिया गांधी (soniya gandhi) संग राहुल गांधी (rahul gandhi) ने भी ओबीसी महिलाओं को आरक्षण देने की मांग की। राहुल ने सरकार पर ओबीसी की अनदेखी का आरोप भी लगाया। इस पर अमित शाह ने उन्हें ये आंकड़े देकर आईना दिखाया कि भाजपा के 29 प्रतिशत यानी 85 सांसद ओबीसी वर्ग के हैं और 29 केंद्रीय मंत्री भी इसी वर्ग के हैं। उन्होंने यह भी बताया कि भाजपा के 1,358 में से 365 एमएलए और 163 में से 65 एमएलसी ओबीसी के हैं। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि सरकार विपक्ष के सुझावों को खुले मन से स्वीकार करने को तैयार है और जरूरत पड़ने पर सुधार भी किया जा सकता है।
सामाजिक उत्थान के लिए आरक्षण की बात आजादी के समय से ही होती आ रही है। चूंकि हर वर्ग को अपने उत्थान के लिए आरक्षण एक सही माध्यम लगता है इसलिए ओबीसी महिलाओं को भी आरक्षण देने की मांग हो रही है। राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे ओबीसी वर्ग की महिलाओं को समुचित संख्या में चुनाव लड़ाएं। उनके लिए यह भी आवश्यक है कि वे उन महिलाओं को ही आगे बढ़ाएं, जिनमें समाज सेवा का जज्बा हो यह अपेक्षा इसलिए, क्योंकि पंचायतों महिला आरक्षण के चलते बड़ी संख्या में महिलाएं चुनी तो जाती हैं, लेकिन कई जगह उनका काम उनके बजाय उनके पति करते हैं। उन्हें पंचायत पति अथवा सरपंच पति कहा जाता है । वे ही सारा काम करते हैं और निर्वाचित महिला अपने घर तक ही सीमित रहती है। इससे महिलाओं का राजनीतिक सशक्तीकरण नहीं हो रहा है। महिलाओं को राजनीति में आगे लाने के नाम पर नेताओं को अपने परिवार की महिलाओं को प्राथमिकता देने से बचना होगा, क्योंकि यह किसी से छिपा नहीं कि नेता किस तरह अपने घर की महिलाओं को राजनीति में ले आते हैं। जब लालू यादव को मुख्यमंत्री रहते जेल जाना पड़ा था तो उन्होंने पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया था, जबकि उन्हें राजनीति का कोई अनुभव नहीं था। चूंकि हमारा पुरूष प्रधान समाज महिलाओं को कम करके आंकता है और उन्हें आगे बढ़ने से रोकता है, इसलिए महिला आरक्षण एक ओर जहां महिलाओं का उत्साहवर्धन करेगा, वहीं पुरूषों की मानसिकता बदलने का भी काम करेगा।
Editorial

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