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विभूति नारायण राय....जम्मू-कश्मीर (Jammu-Kashmir) को लेकर भारतीय जनता और सरकार, दोनों एक खास तरह के सरलीकरण के शिकार हैं। एक लंबी शांति उन्हें आश्वस्त कर देती है कि अब सब कुछ 'सामान्य' हो गया है और इसके बरक्स किसी बड़ी आतंकी घटना के होते ही निराशा की लहर फैल जाती है और हम मानने लगते हैं कि सब किया-कराया चौपट हो गया है। प्रदेश से अनुच्छेद 370 हटाने के शुरूआती कुछ महीनों की अशांति के बाद जिस तेजी से घाटी की स्थिति सामान्य हो रही थी, उससे यह आत्म-विश्वास उपजने लगा था कि आतंकवाद की कमर टूट गई है, पर पिछले छह महीनों से पीर पंजाल पर्वतमाला के उत्तरी और दक्षिणी इलाकों में कुछ घटनाएं हुईं, जिनमें भारतीय सेना और जम्मू-कश्मीर पुलिस के कई बहादुर जवान शहीद हुए हैं। इसी श्रृंखला में 13 सितंबर को अनंतनाग
(Anantnag)
जिले के कोकरनाग (Kokarnag) वन क्षेत्र में शुरू हुई मुठभेड़ में सेना की 19वीं राष्ट्रीय राइफल्स के कमांडिंग अफसर, एक कंपनी कमांडर और जवान के साथ जम्मू-कश्मीर पुलिस के डिप्टी एसपी समेत चार बेशकीमती जानें गईं। ये कुर्बानियां इस अर्थ में असाधारण जरूर हैं कि मुठभेड़ शुरू होते ही इतने वरिष्ठ अधिकारी मारे गए, पर यह पहली बार नहीं हुआ है। आगे रहकर नेतृत्व करने की गौरवशाली परंपरा के चलते पहले भी पलटनों के कमांडिंग अफसर शहीद हुए हैं।
पिछले दिनों की दुर्घटना से यह निष्कर्ष निकालना कि समय का पहिया घूमकर तीन साल पीछे चला गया है, वही सरलीकरण होगा, जिसका मैंने ऊपर जिक्र किया है। दुनिया भर का अनुभव है कि ऐसे नागरिक विद्रोहों को, जिनकी पुश्त पर किसी पड़ोसी देश का हाथ हो, पूरी तरह से शून्य तक पहुंचा देना बड़ी समय साध्य प्रक्रिया होती है। भारतीय समाज से उदाहरण लें, तो ये कंडे की सुलगती आग की तरह होती है, जो धीरे-धीरे मंद पड़ती हुई बुझती है। कई बार ऊपरी सतह बुझी राख जैसी लगती है और फिर अचानक नीचे से लपलपाती हुई ज्वाला ऊपर निकल आती है। अनंतनाग में हालिया मुठभेड़ को इसी रूप में लेना चाहिए। इसमें सुरक्षा बलों का पलड़ा ही भारी चल रहा है। पहले के मुकाबले इस बार ड्रोन समेत दूसरी तकनीक का इतना प्रभावी इस्तेमाल हुआ है कि ज्यादातर आतंकी बचकर निकल नहीं पाए हैं।
वैसे आजादी के बाद से ही देश के कई हिस्सों में हिंसक आंदोलन चलते रहे हैं। इनमें से कुछ पृथकतावादी थे और कुछ आर्थिक- सामाजिक विषमताओं के खिलाफ । ज्यादातर तो अब पूरी तरह से समाप्त हो गए हैं, पर कुछ की स्थिति अभी भी कंडे की आग जैसी है। पूर्वोत्तर के कई आंदोलन इसी प्रकृति के हैं, जिसमें हम पाते हैं कि आग न तो पूरी तरह से बुझी है और न ही झुलसा देने की हद तक सुलग रही है। इसे हम सहनीय स्थिति कह सकते हैं और दुनिया भर में इसे स्वीकार्य माना जाता है। एक बहुराष्ट्रीय समाज में जब एक राष्ट्र राज्य बनने की प्रक्रिया चल रही होती है, तब इस तरह के संघर्ष स्वाभाविक ही कहे जा सकते हैं। हमारे देश में एक राष्ट्र राज्य बनने की प्रक्रिया भी तो सही अर्थों में 1947 के बाद ही शुरू हुई है।
नए राज्यों के निर्माण, लोकतांत्रिक संस्थाओं के जन्म और विकास की संभावनाओं के साथ उत्तर-पूर्व के अधिकांश इलाकों से पृथकतावादी सशस्त्र संघर्ष काफी हद तक कमजोर हो गए हैं। कुछ दशक पूर्व सबसे अशांत मिजोरम (Micoram) और त्रिपुरा (Tripura) पूरी तरह से शांत हैं। राज्य को जैसे-जैसे यह एहसास होता गया कि सशस्त्र वामपंथी आंदोलनों के केंद्र आदिवासी इलाकों में चल रही हथियारबंद लड़ाइयां केवल शांति-व्यवस्था का प्रश्न नहीं हैं और उनसे निपटने के लिए भूमि सुधार के साथ सदियों से उपेक्षित इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक शिक्षा, चिकित्सा, सड़कें और रोजगार के संसाधन पहुंचाना पुलिस कार्रवाइयों से अधिक आवश्यक है, वहां हिंसा की घटनाओं में तेजी से कमी आती गई है। संघर्ष अब विकास के मॉडल को लेकर है, जिसमें जमीन के अंदर छिपे खनिजों के दोहन के लिए जंगल की जमीन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंपने की बात होती है और सशंकित आदिवासी उजड़ने की आशंका के चलते इसके खिलाफ संघर्ष करते हैं, लेकिन अब विकास के आधुनिक मॉडल के खिलाफ आंदोलन आमतौर से शांतिपूर्ण हो गए हैं और इन्हें लोकतंत्र के ढांचे में सुलझाया जा सकता है।
कश्मीर में मौजूदा हालात ऐतिहासिक कारणों की उपज हैं। यह एक संवेदनशील मुद्दा है, जिससे निपटने के लिए उतनी ही संवेदनशीलता की जरूरत होगी। पहले तो हमें यह स्वीकारना होगा कि एक भू-भाग से अधिक महत्व वहां रहने वाले लोगों का होता है। यह समझना इसलिए भी जरूरी है कि कश्मीर का मुद्दा उस विभाजन से जुड़ा है, जिसके यह पीछे अवधारणा थी कि हिंदू और मुसलमान, दो अलग राष्ट्र हैं और ये साथ नहीं रह सकते। पड़ोस में एक नया देश इसी आधार पर बन भी गया, पर हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने इस अवधारणा को सिरे से खारिज कर दिया और यह मानते हुए कि राष्ट्र सिर्फ धर्म के आधार पर नहीं बनते हैं, खुद को धर्मनिरपेक्ष संविधान दिया था । कश्मीर इसी अवधारणा को बार-बार परखने की भूमि है।
पिछले कुछ वर्षों में हिंसा में महसूस कर सकने वाली कमी आई है, पर यह मानना कि हाल-फिलहाल पूरी तरह शांति कायम हो जाएगी, खुद को छलना होगा । अनंतनाग की हालिया घटना अंध-राष्ट्रवाद की लहर पैदा कर सकती थी, पर उससे उपजा कोई दुस्साहस आत्मघाती ही होता, इसलिए हमारा उससे बचना अच्छा ही रहा । यह मानते हुए कि ऊपर से ठंडी राख नजर आने वाली कंडे की ढेरी में नीचे कहीं आग की कुछ चिनगारियां भी बची रह सकती हैं, हमें भविष्य के बारे में नए सिरे से सोचना होगा ।
अब समय आ गया है कि जम्मू-कश्मीर में हिंसा को सहनीय स्तर तक सीमित रखते हुए, वहां राजनीतिक प्रक्रिया शुरू की जाए । जल्द ही अनुच्छेद 370 को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला भी आ जाएगा। उसके बाद राज्य का दर्जा बरकरार करते हुए वहां चुनाव कराने चाहिए। खबरों के अनुसार, विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन का काम खत्म होने के कगार पर है। यह भी सुनिश्चित होगा कि चुनाव पूरी ईमानदारी से हों। 1987 के भ्रष्ट आम चुनाव ही 1989 में भड़के विद्रोह के तात्कालिक कारण बने थे । चुनकर आए जन-प्रतिनिधियों को ही राज्य में शांति बहाली और पुनर्निर्माण का काम सौंपा जाना चाहिए। लोकतंत्र किसी भी सैनिक कार्रवाई से बेहतर विकल्प है।
Editorial

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