Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan
केन्द्र बहुत ही सावधानी से बनाया गया था। पर्यटक भालुओं को अच्छी तरह से देख भी सके और उनके नजदीक भी नहीं पहुँच सके इस बात का पूरा ध्यान रखा गया था। इस हेतु समुचे स्थल में एक बड़ी सी बालकनी बनाई गई थी, नीचे विशाल प्रांगण था जिसमें भालू रख हुए थे। इनके लिये छोटा सा जलाशय, झूल, पेड़, जंगल गुफा आदि बनाये गये थे। बालकनी के साथ एक पुल भी था जो भालुओं के प्रांगण के एकदम बीचो बीच निकलता था। यहां खड़े होकर यात्री भालुओं प्रत्येक गतिविधि को देख सकते थे, उनके चित्र ले सकते थे।
प्रांगण में चार पांच भालू नजर आ रहे थे, इससे ज्यादा भी हो सकते हैं जो इधर उधर गुफा में या कहीं सुस्ता रहे हों। एक बहुत बड़ा भालू था तो एक छोटा सा बच्चा भी था। इन भालुओं को नाम दिये हुए थे तथा प्रत्येक की जीवनी भी बोर्ड पर लगा रखी थी। कौन सा भालू कब, कहां किन परिस्थितियों में मिला। यहां एक मादा भालू टोबी थी। टोबी व उसके दो भाई डेढ साल की उमर के थे जब यहां लाये गये थे। उनकी मां डस्ट बिन में से एक प्लास्टिक की थैली खा लेने से मर गई थी तभी लावारिस हालत में इन्हें यहां लाया गया था।
एक अन्य मादा स्मोकी की मां को किसी अधिकारी ने गोली मार दी थी तब वह किसी के घर के बाहर डस्ट बिन के अन्दर छुपी पाई गई थी। इसी तरह यहां के प्रत्येक भालू का इतिहास है जिसे पढकर पर्यटकों की भालुओं के प्रति सहानुभूति उपज जाती है।
हम लोग भी अन्य पर्यटकों की तरह बालकनी में पहुँच गये और भालुओं की हरकतें देखने लगे। पर्यटकों को स्पष्ट निर्देश हैं कि वे भालुओं को छेड़ें नहीं, खाने पीने की चीजें उन्हें फेंके नहीं क्यूंकि केन्द्र द्वारा प्रत्येक को उसके समय अनुसार नदिया जाता है। यहां काले तथा भूरे, दोनों तरह के भालू थे। कोई लोट रहा तो कोई इधर से उधर जा रहा था। दर्शकों हेतु बने पुल की दोनों तरफ लोग खड़े। एक भालू को बार बार दोनो तरफ जाने में ही मजा आ रहा था। एक बच्चा भी भारत के लिये झूला बना था, वह झूले पर झूलते हुए सबका मन मोह रहा था। कभी वह झूलता कभी गेंद से खेलता।
सभी लोग मंत्र मुग्ध हो इनकी गतिविधियां देख रहे थे, बच्चों की प्रसन्नता का पारावार नहीं था। किसी की यहां से जाने की इच्छा नहीं होती थी मगर सबको पारस जहाज पर भी पहुँचना था, अन्य स्थान भी देखने थे। कुछ देर और यहां रूक कर हम नीचे उतर गये। वेन में हमारे साथ जो अन्य यात्री आये थे वे अभी तक उपर है। इस भूख भी लगने लगी थी। प्रीति ने अपने झोले से नमकीन, ब्रेड, फल • वगैरा निकाल निकाल कर अन्नपूर्णा की तरह सबकी क्षुधा शांत की ।
शीघ्र ही हम यहां से वापस रवाना हो गये। कई लोग आगे भी जा रहे थे जो भीषण जंगल था, वहा भालू आदि जंगली जानवर दिखाई पड़ जाते थे। जंगल में कई बार बड़े बड़े भालू नजर आ जाते हैं। इन्हें ग्रीजली बेयर कहते हैं। ये रींछ या भालू 8-10 फुट तक ऊंचे होते हैं, इनकी एक ही झापड़ से आदमी का दम निकल जाता है। हमने वह टूर नहीं लिया और वापस उसी जगह आ गये जहां से रवाना हुए थे। यह सिटका का डाउन टाउन इलाका था। छोटा सा बाजार था, पर एकदम साफ सुधरा वापस जहाज पर जाने के लिये शटल बसें चल रही थी मगर अभी समय था इसलिये हम थोड़ी देर यहां के बाजार में घूमते रहे। पास ही एक म्यूजियम था। प्रीति को इस तरह की चीजों का बहुत शौक था। वह मुनीश को लेकर उसमें घुस गई। मैं और राजा एक जगह बैठकर थकान उतारने लगे। अलास्का के आदिवासियों के इतिहास के निरूपण में टोटम पोल्स की अहम भूमिका है। ये लकड़ी के खंभे होते हैं जिन पर तरह तरह के चित्र खुदे होते हैं। प्रत्येक चित्र के अन्दर एक कहानी छुपी होती है जो आदिवासियों के इतिहास से सम्बन्धित होती है। चित्र अलग अलग काल की कहानियां निरूपित करते हैं। इन कहानियों को समझने के लिये भी जबर्दस्त शोध होती है।
आदिवासियों की अलग अलग प्रजातियों के अलग अलग टोटम पोल्स होते हैं। इन्हें चित्ताकर्षक रंगों में रंगा जाता है। कई खंभों के रंग उतर जाते हैं तो उनका संरक्षण करने उन्हें पुन: रंगा जाता है। ये पोल्स कई साल पुराने है। कई कई तो दो सौ साल पहले तक के हैं। जल्द ही दोनों निकल कर बाहर आ गये तो हमने वापस शटल पकड़ ली। दोपहर चार बजे तक वापस जहाज में पहुँचना अनिवार्य था, हम पहुँचे तब तक चार बजने ही वाली थी।
जहाज में चढ़ते ही सीधे केफेटेरिया में पहुँचे। खाना घन्टे भर पहले ही बन्द हो चुका था, अब तो चाय-नाश्ते की तैयारियां चल रही थी। एक दिन पूर्व हमने पीटर को हमारे लिये खाना रखने को तो कहा था मगर उसे याद भी रहा होगा कि नहीं यही सोचते इटेलियन सेक्शन में उसके लिये पूछा तो वहां मौजूद वेटर के पास हमारा खाना रखा हुआ था। पीटर ने लंच के दौरान ही यहां रखवा दिया था और निर्देश दे दिया था कि हमारे आते ही यह खाना दे दिया जाय। हम लोग जहाज की इस कुशल व्यवस्था के कायल हो गये। पीटर कहीं नजर नहीं आ रहा था, मिलेगा तब धन्यवाद दे देंगे सोच कर हम खाना टेबल पर ले आये। सभी के लिये भारतीय सब्जियां व रोटी वगैरा थी। हमने जी भर कर भोजन किया तब तक लोग चाय नाश्ते के लिये भी आना शुरू हो गये थे। हम लोग खाना खा कर खुले डेक में आकर बैठ गये। इस बीच जहाज भी रवाना हो गया था। हल्के हल्के हवा के झोंकों में यहां बैठना अत्यन्त सुखद लग रहा था। डेक के बीचों बीच स्वीमींग पुल था, उसकी मरम्मत हम जहाज पर पहले दिन चढे तब से जारी थी। एक व्यक्ति, जब देखो तब इसी काम में लगा नज़र आता था।
जहाज के एक तरफ पानी था तो दूसरी तरफ पहाड़ियां व उनके नीचे जंगल नजर आ रहा था, तभी लाउडस्पीकर पर घोषणा हुई कि सामने के जंगलों में कुछ भालू दिखाई दे रहे हैं, अधिकांश लोग अभी अभी जी भर कर भालू देख कर आये थे फिर भी यह घोषणा सुनते ही सभी डेक के उस हिस्से पर पहुँच आंखें आंखें फाह फाड़ भालू देखने लगे! हम तो वहीं बैठे थे, मैंने भी उधर देखा मगर मुझे तो कुछ दिखाई नहीं दिया। लोग जरूर वो रहा यो रहा कह कर एक दिशा में इंगित कर रहे - थे। कुछ के पास दूरबीन थी तो वे बता रहे थे कि भालू का पूरा परिवार है। थोड़ी ही देर में वे जंगल में ओझल हो गये तो सब वापस अपने अपने पुराने काम पर लौट गये।
जहाज पर अन्यत्र एक्यूपंक्चर पर वर्कशोप चल रही थी। कई यात्री इसमें व्यस्त हो गये। एक्यूपंक्चर से किस तरह शरीर के विभिन्न भागों में लाभ उठाया जा सकता है उसका प्रशिक्षण कुछ विशेषज्ञ लोग दे रहे थे। पूल साईड पर भी हाट बाजार लगा हुआ था। जहाज धीरे धीरे बीच समुद्र में पहुँच गया। चारों तरफ अथाह जल राशि। इसी बीच किसी ने दूर एक मछली को उछलते हुए देखा, उसने कहा है तो किसी अन्य ने कहा डोल्फीन नहीं यह तो व्हेल था। यह बहस चल रही थी कि समुद्र मे पानी की एक तुरी छूटती नजर आई। जरूर यह किसी व्हेल रा छोड़ी गई पानी की धार ही थी। अब तो सब उत्सुकता से उधर देखने लगे। वह व्हेल ही था, अब उसने अपनी पूछ उठाकर छपाक से पानी उछाला तो की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
जहाज के केप्टन की इधर नजर नहीं गई थी या शायद व्हेल को सतर्क नहीं करने के लिये वह इसकी घोषणा नहीं कर रहा था मगर डेक पर मौजूद लोगों को आग लगते ही सब उधर दौड़ पड़े। स्पीड बोट तो सबके एक तरफ झूमने से डगमगा राई थी मगर जहाज तो इतना बड़ा था, एक तरफ के डेक पर इतने लोगों के लूमने से श्री इस पर कोई असर नहीं पड़ा। जहाज आगे बढ़ा तो कुछ और व्हेल नजर आ गये। सबको मजा आ गया। जो नजारा देखने के लिये हमने इतनी जोखिम मोल ली थी, इतना वक्त बरबाद किया, पैसा खर्च किया वो सब यहा मुफ्त में मिल रहा था। एक द्वार और व्हेल देखने का आनन्द उठा लिया। जिन लोगों ने सुस्ती कर जहाज नहीं हा था उन्हें भी यहां बैठे बिठाये व्हेल देखने को मिल गये जहाज आगे बढ़ता रहा तो यह नजारा पीछे छूट गया।
Editorial

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