Women's Reservation Bill India

अवधेश कुमार…मोदी करने के लिए बाद किया जाएगा।
सरकार को कई ऐतिहासिक पहल इसी कड़ी में एक नया अध्याय जुड़ा है महिलाओं को विधार्थी संस्थाओं में समुचित प्रतिनिधित्व देने की पहल का नए संसद भवन में पहला भाषण देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने जैसे ही कहा कि हम नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, तभी साफ हो गया कि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व वाले आरक्षण का सपना साकार होने जा रहा है। यह आरक्षण 15 वर्षों के लिए होगा। संसद चाहे तो इसे आगे बढ़ा सकती है। जैसे ही संकेत मिला कि विशेष सत्र में मोदी सरकार महिला आरक्षण विधेयक पारित करने की कोशिश करेगी, विपक्ष ने श्रेय लेने के लिए रणनीति के तहत मांग शुरू कर दी। लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी के पुराने संसद भवन में भाषण के बीच टोकते हुए सोनिया गांधी ने चार- बार 'वूमेन रिजर्वेशन' शब्द प्रयोग किया इसका उद्देश्य इतना ही था कि लोकसभा के रिकार्ड में दर्ज हो जाए कि इसकी मांग कांग्रेस की ओर से हुई और सोनिया गांधी ने अपने नेता को यह विषय रखने के लिए बोला आज कांग्रेस इसका श्रेय लेने का प्रयास कर रही है, लेकिन सच यही है कि संप्रग सरकार के दौरान कांग्रेस की सर्वेस रहीं सोनिया गांधी महिला आरक्षण विधेयक पारित नहीं करा पाई। तब उनके गठबंधन के साथियों ने ही इस विधेयक की राह रोक दी थो 2010 में यह राज्यसभा में पारित हुआ, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ पाई।
पहली बार संयुक्त मोर्चा सरकार के दौरान 1996 में महिला आरक्षण विधेयक लाया गया और तबसे इसकी नियति अधर में लटकी रही। अब चाहे जो राजनीतिक बयानबाजी से लाया नहीं जा सकता कि महिलाओं को शीर्ष पर उचित प्रतिनिधित्व दिलाने का संकल्प मोदी सरकार ने ही दिखाया। संयोग देखिए कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पुणे में आयोजित समन्वय समिति की बैठक में भी संघ की शताब्दी योजना के अंतर्गत महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने का निर्णय हुआ है। यह धारणा को वस्त करता है कि भाजपा और संघ महिला विरोधी है। आरक्षण की व्यवस्था स्थायी नहीं हो सकती, किंतु यदि देश को अपनी क्षमताओं के अनुरूप विकसित करने के साथ ही लोकतंत्र को सर्वप्रतिनिधिमूलक बनाना है तो आधी आबादी का समुचित प्रतिनिधित्व होना ही चाहिए। सामान्य व्यवस्था में यह संभव नहीं हो रहा तो संतुलन कायम होने तक आरक्षण चाहिए प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि आजादी के बाद से संसद में करीब 7,500 सदस्यों का प्रतिनिधित्व हुआ, जिनमें महिलाओं की संख्या करीब 600 रही। यानी 18 प्रतिशत से भी कम लोकसभा में अभी सर्वाधिक 15.21 प्रतिशत यानी 82 महिला सदस्य हैं। राज्यसभा में 13.23 प्रतिशत यानी 31 महिला सदस्य ।
इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन के अनुसार वैश्विक स्तर पर महिला सांसदों का औसत 26 प्रतिशत है। अभी किसी विधानसभा में 15 प्रतिशत महिला विधायक नहीं है। अधिकतम 14.44 प्रतिशत छत्तीसगढ़ में 13.70 प्रतिशत बंगाल में 12.35 प्रतिशत झारखंड में 12 प्रतिशत राजस्थान में 11.66 प्रतिशत उम्र में तथा दिल्ली और उत्तराखंड में 11.4 प्रतिशत है। कर्नाटक जैसे बड़े राज्य में महिला विधायक 3.4 प्रतिशत हैं। ये आकडे महिला आरक्षण की आवश्यकता दर्शाते हैं।
यह पूरी राजनीतिक व्यवस्था की विफलता है कि महिलाओं को शीर्ष नीति निर्माण में सम्मानजनक प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया। जबकि पिछले लोकसभा चुनाव में पुरुषों की तुलना में महिलाओं ज्यादा मतदान किया। महिलाओं को सम्मान देने के प्रति वैचारिक और संस्कारिक प्रतिबद्धता के बिना संकल्प पैदा होना संभव नहीं था। प्रधानमंत्री ने कहा कि माता बहनों ने सदन की गरिमा बढ़ाई है। उन्होंने महिलाओं के हर क्षेत्र में योगदान को भी रेखांकित किया।
भाजपा ने पार्टी में 33 प्रतिशत महिलाओं के प्रतिनिधित्व की घोषणा सबसे पहले की थी । यह मांग थी कि पार्टियां अपने संगठन में महिलाओं को एक तिहाई जगह अवश्य दें, लेकिन पार्टियों ने आज तक इस न्यूनतम अर्हता को पूरा नहीं किया ।
यह स्वीकारने में कोई संकोच नहीं कि अधिकांश दलों में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व देने का ईमानदार संकल्प है ही नहीं । इसका मूल कारण संस्कारगत है। सनातन संस्कृति में महिलाओं और पुरूषों के बीच कभी भेदभाव नहीं रहा। ऋवेदकालीन सभा और समितियों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की बात है । पश्चिम ने अपनी व्यवस्था के अनुरूप भारतीय इतिहास और संस्कृति को भी पितृसत्तात्मक बता दिया, जबकि भारतीय समाज में स्त्री शक्ति को हर क्षेत्र में सम्मान और कई में पुरूषों से ऊंचा स्थान दिया गया । ऋवेद में शिक्षा ग्रहण करने के पूर्व बालक-बालिकाओं के समान रूप से यज्ञोपवित संस्कार का उल्लेख है।
बाहरी आक्रमण के बाद हमारी सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं में बाध्यकारी बदलाव हुए, जिनमें महिलाएं मुख्य भूमिकाओं से पीछे हटती गईं। भारत में आठवीं सदी के पूर्व पर्दा प्रथा का प्रमाण नहीं मिलता। संपत्ति में महिलाओं की हिस्सेदारी के स्पष्ट नियम थे । गणना करें तो देवों से ज्यादा देवियों की संख्या मिल जाएगी। विद्या, धन, शक्ति और शांति की अधिष्ठात्री देवियाँ ही हैं। भारतीय सनातन संस्कृति से ओतप्रोत संगठन या सरकार महिलाओं को पुरूषों की तुलना में न हीनतर मान सकती है, न हेय स्थान दे सकती है। इसलिए इसकी प्रेरणा विकसित देशों से न होकर अपनी विरासत से मिली है। महिलाओं को समुचित सम्मान देने की प्रतिबद्धता से ही तीन तलाक के विरूद्ध कानून बन सका । यह केवल वर्तमान संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली के अंतर्गत की गई व्यवस्था नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति में महिलाओं की नेतृत्वकारी, व्यवस्था निर्माण एवं संचालन की भूमिका को पुनर्स्थापित करना है, किंतु इसमें अगर दलितों, जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता तो वास्तविक लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। इसलिए उनके लिए आरक्षण के अंदर आरक्षण की व्यवस्था उचित होगी ।
कुल मिलाकर, नारी शक्ति वंदन अधिनियम की पहल से भारत में एक नए इतिहास का निर्माण होने जा रहा है। इसका उद्देश्य तभी सार्थक होगा जब सक्षम एवं योग्य महिलाओं को राजनीति में आगे आने का स्वाभाविक अवसर मिले।
Editorial

Editorial

Next Story