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आचार्य महाश्रमण के सानिध्य में क्षमापना दिवस का आयोजन
By EditorialPublished on
संयम, साधना, जप, तप, त्याग के पर्यूषण (Paryushana) पर्व में संवत्सरी महापर्व के उपरान्त बुधवार को आचार्यश्री महाश्रमण (Acharya Mahashraman) के सानिध्य में धर्मसंघ ने क्षमापना दिवस मनाया। अपने आराध्य से धर्मसंघ ने क्षमायाचना कर आशीर्वाद व पाथेय प्राप्त किया तो आचार्य महाश्रमण ने भी धर्मसंघ से खमतखामणा कर स्नेहाशीष की बरसात कर दी।

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मुंबई । संयम, साधना, जप, तप, त्याग के पर्यूषण (Paryushana) पर्व में संवत्सरी महापर्व के उपरान्त बुधवार को आचार्यश्री महाश्रमण (Acharya Mahashraman) के सानिध्य में धर्मसंघ ने क्षमापना दिवस मनाया। अपने आराध्य से धर्मसंघ ने क्षमायाचना कर आशीर्वाद व पाथेय प्राप्त किया तो आचार्य महाश्रमण ने भी धर्मसंघ से खमतखामणा कर स्नेहाशीष की बरसात कर दी।
बुधवार को आचार्य महाश्रमण के मंगलपाठ के बाद आरम्भ हुआ क्षमापना का कार्यक्रम। जैन विश्व भारती के अध्यक्ष अमरचंद लूंकड़, पारमार्थिक शिक्षण संस्था के बजरंग जैन, अमृतवाणी के अध्यक्ष रूपचंद दूगड़, तेरापंथ महिला मण्डल मुम्बई की विमला कोठारी, प्रेक्षा इण्टरनेशनल के गौरव कोठारी, तेरापंथी सभा मुम्बई के नवरतनमल गन्ना, अणुव्रत समिति मुम्बई के रोशनलाल मेहता, भोजनशाला संयोजक महेन्द्र तातेड़, तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम मुम्बई के राज सिंघवी, आवास व्यवस्था संयोजक संदीप कोठारी, चातुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष मदनलाल तातेड़ ने आचार्यश्री व चारित्रात्माओं से खमतखामणा की।
साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभा व साध्वीवर्या सम्बुद्धयशा ने संबोधित किया। मुख्यमुनि महावीरकुमार ने आचार्यश्री के जीवन से प्रेरणा लेने प्रेरित किया। साध्वीप्रमुखा व साध्वीवर्या सहित उपस्थित समस्त साध्वियों ने वंदन कर क्षमायाचना की। आचार्यश्री ने भी सभी से खमतखामणा की।
आचार्य महाश्रमण ने कहा कि आचार्य भिक्षु, आचार्य परंपरा, गुरुदेव तुलसी, आचार्य महाप्रज्ञ के श्रीचरणों में वंदन, स्मरण, स्तवन करता हूं। आगम में प्रश्न किया गया कि क्षमापना से जीव क्या प्राप्त करता है? उत्तर दिया गया कि क्षमापना से जीव प्रह्लाद भाव पैदा करता है। किसी से किसी प्रकार की बात हो जाए और उससे खमतखामणा हो जाए तो प्रह्लाद और पवित्रता भाव प्राप्त हो सकता है। इससे मैत्री भाव भी प्राप्त हो सकता है और जो जीव मैत्री भाव को प्राप्त कर विशोधि को प्राप्त कर लेता है, फिर वह निर्भय भी हो जाता है।
मैं सबको क्षमा देता हूं और सभी जीव मुझे क्षमा दें। सब प्राणियों के प्रति मेरे मन में मैत्री भाव है। किसी के प्रति मेरे मन में वैर भाव न हो। द्वेष की ग्रंथी को काटने अथवा खोलने की विधा है। आदमी को क्षमापना के द्वारा ग्रंथी को खोल दिया जाए। अच्छी बात तो और हो कि गांठ पड़े ही नहीं, ऐसा भी प्रयास होना चाहिए।
आचार्यश्री ने साध्वीप्रमुखा, साध्वीवर्या व मुख्यमुनि आदि से पृथक्-पृथक् खमतखामणा की तो सभी ने आचार्यश्री को सविधि वंदन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। मंगल पाथेय के उपरान्त साधु-साध्वियों ने परस्पर खमतखामणा की। साध्वियों की ओर से साध्वी जिनप्रभा व साधुओं की ओर से मुनि दिनेशकुमार ने खमतखामणा के क्रम को पूर्ण किया। श्रावक समाज की ओर से किशनलाल डागलिया आदि संग श्रावक-श्राविका समाज ने आचार्यश्री से तथा समस्त चारित्रात्माओं से खमतखामणा किए।

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