Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan


लौटते वक्त पायलट ने तेजी से बोट चलाते हुए हम बहुत जल्द किनारे पर बा दिया। यहां हमारी अगले टूर के लिये प्रतीक्षा हो रही थी। एक चेन खड़ी थी पहले से यात्री बैठे थे, हमारे बैठते ही वेन चल पड़ी। हमारा टूर की गाईड व न की ड्राइवर एक महिला थी। हम लोग वन्य जीवन देखने जा रहे थे जहां खासकर मालूओं की शरणगाह में कुछ समय व्यतीत करने वाले थे।
अलास्का ग्लेशियरों, सेमन मछलियों व व्हेलों के साथ साथ भालूओं के प्रदेश के रूप में भी जाना जाता है। यहां तीनों तरह के भालू पाये जाते हैं। काले भालू और सफेद भालू बस्तियां कम तथा जंगल अधिक होने के कारण भालुओं का अनायास ही कहीं भी दिख जाना यहां सामान्य बात है। ग्रामीण बस्तियों में रहने वालों को भालुओं से रक्षा करने के उपाय करने जरूरी हैं। हर परिवार इस बात का ध्यान रखता है कि खाने पीने की कोई भी वस्तु घर के बाहर या आस पास बिखरी नहीं पड़ी रहे। कचरा पात्रों तक में इस तरह की वस्तुएं डालने से रोका जाता है। भालु इतने चतुर होते हैं कि वे कचरा पात्रों तक से वस्तुएं निकाल लेते हैं। कई घरों के बाहर बिजली के तार लगा कर उनमें करन्ट छोड़ दिया जाता है जिससे भालू दूर रहें।
ग्रामीण क्षेत्रों में घूमते हुए कभी भी भालुओं से सामना हो सकता है। प्रशासन द्वारा इस तरह के ज्ञात क्षेत्रों में सड़क पर बोर्ड लगे होते हैं जिन पर भालुओं से सतर्क रहने को कहा जाता है। उदयपुर में भी इन दिनों तेन्दुओं के बस्तीयों में घुसने की घटनाएं बढ़ गई है तथा कई स्थानों पर रोड साईन्स के साथ साथ पेन्थर के बोर्ड भी लगे हैं। एसा ही एक बोर्ड देबारी के घाटे में भी दिखाई देता है।
भालू कहीं नजर भी आ जाये तो शोर करने की सलाह दी जाती है, शोर से भालू भड़कता नहीं और आक्रमण नहीं करता है। काले भालू यहां कम नजर आते हैं क्यूंकि ये घने जंगलों में ज्यादा पाये जाते हैं जबकि भूरे भालू कहीं भी दिख जाते हैं। नर की अपेक्षा मादा मालू ज्यादा आक्रामक होती है, खासकर तब जब वह अपने बच्चों के साथ होती है। भालूओं के फोटो लेना खतरनाक हो सकता है इसलिये दूर से ही जूम करके फोटो लेने की सलाह दी जाती है। भालुओं को सड़कों पर चलने की आदत होती है इसलिये कहीं भी मछलियों या जानवरों के अवशेष नजर आयें तो समझ लेना चाहिये कि आसपास में जरूर कहीं भालू हैं।
पर्यटकों को जो हिदायतें दी जाती है उनमें से एक जानकर अत्यन्त पुरानी कहानी याद आ गई। यह हिदायत है कि भालू से अगर सामना हो जाए तो एसा जताओ जैसे आप मर गये हो। बचपन में दो दोस्तों सोहन और मोहन के भालू से सामने की एक कहानी बहुत लोकप्रिय थी। इसमें एक दोस्त मरने का अभिनय कर ही भालू से अपनी जान बचाता है।
हमारी महिला गाईड का नाम जेसिका था। उसे अलास्का और यहां के लोगों के बारे में बहत जानकारी थी। वह एक स्वाभिमानी एकल माता थी। एकल माता अर्थात सिंगल मोम, वो स्त्रियां जो अकेली ही अपनी संतान को पालती पोसती बड़ा करती है। अमरीकी जन जीवन में सिंगल मोम को बहुत आदर और सम्मान के साथ देखा जाता है। कभी जिन स्त्रियों को हिकारत और अपमान के साथ देखा जाता था, सामाजिक मान्यताओं ने उससे एकदम विपरीत रूप अपना कर अब उन्हीं स्त्रियों के लिये अप्रतिम सम्मान दर्शाना शुरू कर दिया है।
अमेरिका क्या, आजकल हर जगह विवाह पूर्व युवतियों का गर्भवती हो जाना सामान्य बात हो गई है। पुरुष अक्सर अपनी जिम्मेदारी से मुँह मोड़ युवती को गर्भपात कराने की सलाह दे देते हैं। युवती नहीं मानती तो वे उसका साथ छोड़ देते हैं। ऐसे में युवती बच्चे को जन्म देती है और उसे पालती पोसती है। समाज पहले एसी युवतियों का तिरस्कार करता था मगर अब परिस्थितियां बदल गई हैं। समाज, सरकार, मित्र सम्बन्धी अब एसी युवतियों को श्रद्धा व सम्मान के साथ देखते और इनसे सहानुभूति रखते हैं। यही कारण है कि अमेरिका में सिंगल मोम्स अपनी एक शख्सियत विकसित हो गई है। चुनावों में पार्टियां इनके लिये प्रावधानों की घोषणा तक करती है। सिंगल मोम कठोर परिश्रम कर अपने बच्चे को पालती है, शिक्षित करती है इस कारण हर कोई उसकी सहायता करने को तत्पर रहता है। चुनाव में जिस तरह नेता दलितों के घर खाना खा कर वोट हासिल करते है इसी तरह यहां नेता सिंगल मोम्स के घर जाते हैं।
जेसिका ने जब बताया कि वह सिंगल मोम है तो सबकी उसके प्रति सहानुभूति हो गई। उसका बच्चा अभी हाई स्कूल में पढ़ रहा था। उसके लालन पालन के लिये वह तीन तीन नौकरियां करती थी। वेन ड्राइवर और गाईड का कार्य अतिरिक्त था। जेसिका को अपने अलास्कन होने पर बहुत गर्व था। उसने बताया कि हम लोगों को सीखाया जाता है कि जिस भूमि पर आप रह रहे हैं उसी के सहारे कैसे जीवन यापन करें। अलास्का के भीषण मौसम के कारण इसके द्वार आठ लिये दुनिया से बन्द हो जाते हैं। इन आठ महीनों में लोगों को इस भूमि के गुजारा करना पड़ता है।
जेसिका वेन चलाते हुए ही ये सारी बातें कर रही थी। एक नदी के किनारे। सबको उतारा और बताया कि किस तरह जल जीवन पर यहां के लोग करते हैं। मछलियां तो आजीविका का साधन है ही, मगर एसी ढेर सारी अचीजें भी है जिनकी जानकारी हो तो लोग भूखे नहीं मरें। उसने नदी किनारे से छोटे पत्थर उठा कर हमें बताया, हाथ में लेते ही एसा लगा जैसे पत्थर में हो रही है, ये पत्थर नहीं वरन समुद्री जीव थे। इसी तरह उसने छोटे छोटे कड़े उठाकर बताये। इसी जगह उग रहे पौधों में से एक को उखाड़ कर उसने कि यह क्या है, सामान्य सा पौधा था, उसमें कोई खास बात नजर नहीं आ रही थी, वापस पौधा अपने हाथ में लेकर उसने उसका एक भाग निचोड़ा तो मोटा मोटा तरल पदार्थ निकलने लगा। उसने कहा कि यह तरल पदार्थ चर्म रोगों के लिये योगी है।
जेसिका हमें अलास्का का वन्य जीवन दिखाने लाई थी, उसने क्षमा मांगते हुए कहा कि मैंने आपका थोड़ा सा समय लिया। उसने अब सबका ध्यान उस स्थान की तरफ खीचा जहां से ये तीनों चीजें उठाई थी, उसने बताया कि ये तीनों डीजें सिर्फ एक फुट के स्थान से ली गई थी। इस एक फीट में इतनी सम्पदा है तो पूरे अलास्का में कितनी होगी। जिसे इसका ज्ञान है वह दुनिया से कट जाने के बाद श्री अलास्का में रह सकता है। सब लोग उसकी बातों से बहुत प्रभावित एक आम अलास्कावासी के कठिनाईपूर्ण जीवन का एहसास किया। पर्यटन तो कुछ सालों से बढ़ा है, पहले तो यह भी नहीं था। हुए और हम लोग वापस वेन में बैठे। अब तक तो बस्ती क्षेत्र में थे, शीघ्र ही जंगल आ गया। जंगल में किसी भी क्षण कहीं भी भालू दिखाई दे सकता था इसलिए सब खिड़कियों से बाहर निगाहें रख रहे थे। घने जंगल के बीच से गुजरते हुए एक तरफ पहाड़ तो दूसरी तरफ समुद्र के दर्शन हो रहे थे। शीघ्र ही हम एक विशाल प्रांगण में पहुँच गए। यह एक तरह का पार्क नज़र आ रहा था। यहां पहले से कई वाहन खड़े थे व यात्रियों की रेलमपेल नजर आ रही थी।
यह फोट्र्स ओफ दी बेयर नाम का स्थान था। एक तरह से यह भालुओं का शरणस्थल व पुनर्वास का केन्द्र था। एसा माना जाता है कि अलास्का में मधुआरों, सोना खोजने आने वालों या समुद्री यात्रियों के आने से पहले भालू ही राज करते थे। ज्यू ज्यू उनका साम्राज्य सीमित होता जा रहा है अधिक से अधिक भालुओं के बच्चे अनाथ हो रहे हैं. घायल हो रहे हैं। कई बार भालुओं के अनाथ बच्चों को सरकारी अधिकारियों द्वारा गोली मार दी जाती है ताकि उनकी परवाह नहीं करनी पड़े। भालुओं के पुनर्वास की कोई सरकारी व्यवस्था नहीं है ऐसे में स्वयंसेव संगठनों द्वारा भालुओं के संरक्षण हेतु इस पुनर्वास केन्द्र की स्थापना की गई थी। पर्यटकों द्वारा टिकट खरीद कर एकत्र होने वाली राशि तथा दान से ही यह केन्द्र चलता था।
Editorial

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