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अलास्का जहाज यात्रा 21 : व्हेलों की नाचती पूंछे देख मन प्रसन्न हो गया।
By EditorialPublished on
आकाश में घिर रहे बादल धीरे धीरे नीचे आने लगे, एसा लगने लगा जैसे जल्दी ही ये हमें अपने आगोश में ले लेंगे, इसी के साथ टप टप कर वर्षा का क्रम शुरू हो गया। पायलट के चेहरे पर परेशानी की लकीरें उभर उठीं। हमसे ज्यादा निराशा उसे हो रही थी कि वह हमें व्हेल दिखा नहीं पाया। वर्षा तेज नहीं हुई, इसी तरह टप टप चलती हुई कब बन्द हो गई पता ही नहीं चला।

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आकाश में घिर रहे बादल धीरे धीरे नीचे आने लगे, एसा लगने लगा जैसे जल्दी ही ये हमें अपने आगोश में ले लेंगे, इसी के साथ टप टप कर वर्षा का क्रम शुरू हो गया। पायलट के चेहरे पर परेशानी की लकीरें उभर उठीं। हमसे ज्यादा निराशा उसे हो रही थी कि वह हमें व्हेल दिखा नहीं पाया। वर्षा तेज नहीं हुई, इसी तरह टप टप चलती हुई कब बन्द हो गई पता ही नहीं चला।
स्पीड बोट में हमारे साथ जो यात्री था वह घूमन्तू था। पिछले एक महीने से वह सिटका की खाक छान रहा था। उसके पास बहुत ही बढ़िया केमरा था। उसे समुद्र के बारे में बहुत जानकारी थी। बादल छंटने लगे थे, प्रकाश बढ़ रहा था. अचानक इस घूमन्तू ने एक तरफ इशारा करते हुए कहा- देखो ओटर!
ओटर समुद्री उदबिलाव होता है। डिस्कवरी और एनीमल प्लेनेट जैसी चैनलों पर ये अक्सर दिखाये जाते हैं। इसके बिलावों जैसी बड़ी बड़ी होती है • और बड़े से दांत होते हैं। ओटर का नाम सुनते ही हम सबका ध्यान उधर चला गया, मगर तब तक वह डूबकी लगा चुका था। पायलट ने नाव उधर ही मोड़ दी। उसका मानना था कि जरूर यहां कई ओटर होंगे। हम उस दिशा में बढ रहे थे तभी वापस एक ओटर ने समुद्र से मुँह निकाला और वापस डूबकी लगा दी। हम लोग अपने अपने मोबाइलों से उसका फोटो खींचें उसके पहले पलक झपकते ही यह घटना घट गई।
घुमन्तू का केमरा एसा था जिसमें वीडियो की तरह लगातार स्थिर चित्र आ जाते थे। वीडियो में तो चल चित्र होते हैं, उन्हें देखने के लिये वीडियो को पोज करना पड़ता है, मगर इस केमरे में एक एक पल का स्थिर चित्र आ रहा था, जिस तरह सिनेमाघरों में दिखाई जाने वाली फिल्मों की रील होती है, उसमें स्थिर चित्रों की फ्रेमें होती है। यह केमरा भी वैसा ही था घूमन्तू के केमरे में ओटर का शानदार चित्र आ गया था। उसने हमें बताया तो सब खुश हो गये। चलो, व्हेल नहीं तो कम से कम ओटर तो दिखाई दिया।
पायलट अब इसी इलाके में नाव घुमाता रहा, शायद और ओटर नजर आ जायें, इस बीच सभी नाव के बाहर के छोटे से खुले हिस्से में खड़े हो गये थे। मैं खिड़की से ही बाहर का दृश्य देख रहा था तभी खिड़की के बाहर मुझे कुछ काला काला नजर आया, मैं कुछ कहूँ उसके पहले ही हमारी नाय पूरी तरह से हिल गई जैसे किसी ने नीचे से उसे झटका दिया हो। बाहर खड़े मुनीश प्रीति वगैरह भी संतुलन नहीं रख पाये और एक दूसरे पर गिरने लगे। सभी क्या हुआ, क्या हुआ के स्वरों में चीख पड़े।
पायलट ने बताया कि एक व्हेल हमारी बोट के नीचे से निकल गया, मैंने भी पुष्टि की कि मुझे खिड़की से बाहर काला काला कुछ नजर आया था। व्हेल नीचे से ही पानी के अन्दर गायब हो गया था। अब सबकी उम्मीदें बढ़ गई। यह तो निश्चित हो गया कि इस इलाके के अन्दर व्हेल है। सब अब उस दिशा में देखने लगे जिधर व्हेल गया था, अचानक व्हेल ने पानी से अपना मुँह निकाला और एक धार छोड़ी, मानों सबको अलविदा कह रहा है। धार छोटे से फव्वारे जैसी थी जिसे देख सबकी बांछें खिल गई। एसा लगता है जैसे व्हेल अपनी थूथन से पानी का फव्वारा छोड़ता है मगर वैज्ञानिकों का मानना है कि व्हेल के सिर के उपर एक छेद होता है जिससे वह पानी छोड़ता है।
अब तो पायलट को भी जोश आ गया। कहने लगा जरूर इस इलाके में और भी व्हेल नजर आयेंगे। उसके कहनेभर की देर थी कि जिस दिशा में हम आगे बढ़ रहे थे उसके ठीक विपरीत पानी से निकलती हुई व्हेल की पूंछ नजर आई। पायलट ने वापस नाव मोड़ी और उस इलाके के पास आया। काफी देर तक नाव इधर उधर घुमाता रहा मगर कही कुछ नजर नहीं आया।
समुद्र में हमें काफी देर हो चुकी थी सिटका में अन्य स्थान देखने के भी टिकिट ले रखे थे, वापस जाने की जल्दी थी मगर यहां और व्हेल देखने जी ललच रहा था। हम इस उहापोह में ही थे कि पायलट ने पीछे मुड़कर, मुह पर उगली रखते हुए हम अपने बगल की तरफ इशारा किया। उसकी खिड़की के बाहर ही एक व्हेल था आवाज सुनकर वो भाग जाता इसलिये उसने सबको चुप रहने को कहा। हम सब उसे देखने दूसरी तरफ की खिड़की की तरफ झुके मगर इससे नाव का संतुलन बिगड़ गया, पायलट चीख पड़ा कि सब एक तरफ मत झुको। यह बात उसने यात्रा शुरू करने के पहले ही बता दी थी कि नाव का संतुलन बनाये रखना जरूरी है। उसके एसा कहते ही हम तीन लोग वापस अपनी तरफ बैठ गये। इस सब का असर यह हुआ कि व्हेल वापस पानी में विलीन हो गया।
पायलट इधर उधर नाव घुमाता रहा। हम समुद्र में और दूर निकल गये। अचानक एक के बाद एक तीन व्हेलों की पूंछें समुद्र में उभरती नजर आई, एसा लगा जैसे पानी के भीतर कोई नाच चल रहा हो। पहली मछली की पूंछ बाहर निकली, उसके साथ ढेर सारा पानी उछल कर समुद्र में गिरा, इसकी छपाक की आवाज सुनकर ही सबका मन प्रसन्न हो गया। एक छपाक के बाद दूसरा और उसके बाद तीसरा। यह सब इतने कम समय में घटित हो गया कि पता ही नहीं चला। किसी के केमरे में चित्र आया किसी के नहीं घूमन्तू के केमरे में तो चित्रों की श्रृंखला थी। सबने उससे विनती की कि वह अपने द्वारा लिये गये चित्र व्हाट्स अप करदे। वह प्रोफेशनल फोटोग्राफर था और अपनी कृतियों का कापीराईट खता था। सबको भारी कीमत में ये चित्र बेचता था। उसने हम से क्षमा मांगते हुए चित्र लें से इन्कार कर दिया। हम भी उसकी मजबूरी समझते थे। उसके कैमरे में चित्र देख कर ही सन्तोष कर लिया। चित्र इतने शानदार थे कि यकीन ही नहीं होता था कि हमने ये अभी अभी अपनी आंखों के सामने घटित होते देखे हैं।
हम व्हेल बहुल क्षेत्र में आ गये प्रतीत होते थे। अब थोड़े थोड़े अन्तराल कभी इस दिशा में तो कभी उस दिशा में व्हेल अपनी पूंछें निकाल कर पानी उछालती रही। पूंछ इतनी बड़ी थी कि कल्पना कर सकते थे कि पूरी मछली कितनी बड़ी होगी। अब कहीं कहीं व्हेल अपना मुँह निकाल कर पानी का फव्वारा छोड़ते भी नजर आये।
धोड़ी ही देर में इतने व्हेल देख लिये कि सबको संतुष्टि हो गई। अ की चिन्ता हो गई। समुद्र में बहुत दूर निकल आये थे। लौटने में टाईम लगने वाला था। लगता था भाग्य हमारे उपर पूरी तरह मेहरबान था। पहले तो उसने हमें ब तरसाया मगर अब अपनी झोली खोल दी थी। एक के बाद एक व्हेल तो नजर आ है। रहे थे एक सील भी देखने को मिल गई। मुझे तो यकीन ही नहीं हुआ लेकिन ज पानी में तैरते हुए उसे देखा तो मान गये। यह काफी देर तक हमारे बोट के साथ साथ चलती रही इसलिये इसे जी भर कर देखने का आनन्द आ गया।
पायलट को भी अब अगली सवारी की चिन्ता होने लगी। दिन भर में ये लोग भी तीन चार ट्रिप कर लेते हैं। नाव मोड़ कर वह समुद्री तट की तरफ चल पड़ा। में वापसी में हम उसी इलाके से गुजरे जहां ओटर नजर आया था। रास्ते में एक जगह पानी से एक चट्टान उभरी नजर आ रही थी। यहां कुछ पेड़ भी थे। घूमन्तू को एक पेड़ पर कुछ नजर आया तो उसने नाव धीमी करने को कहा। हम सब भी उस पेड़ की तरफ देखने लगे तो उस पर एक छोटा सा पक्षी बैठा नजर आया। घूमन्तू उसका फोटो खींचने लगा। मैंने सोचा इस पक्षी में ऐसा क्या है। उसने अपना खींचा हुआ चित्र बताया तो सब अचरज करने लगे। दर से जो छोटा सा पक्षी नजर आ रहा था वह बहुत बड़ा बाल्ड ईगल था। इतना बड़ा ईगल कम ही देखने को मिलता है। मैं मन ही मन उस घूमन्तू की प्रतिभा और पैनी नजर का कायल हो गया।

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