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अलास्का जहाज यात्रा 20 : लहरों के थपेड़ों से डोलती नाव में बैठते जान निकली
By EditorialPublished on
18 अग, 16 को जहाज की यात्रा का पांचवां दिन हो गया। सुबह 8 बजे ही हम सिटका उत्तरने वाले थे इसलिये सब जल्दी उठ गये। नाश्ता इससे पहले ही कमरे में मंगवा लिया था। कुछ ब्रेड और फल साथ भी ले लिये। दिन भर बाहर रहने वाले थे 4 बजे से पहले लौटने भी नहीं वाले थे और तब तक खाना भी बन्द हो जाने वाला था। एक दिन पूर्व ही हमने फूड सुपरवाइजर पीटर से बात कर ली थी, उसने कहा कि वह हमारे लिये खाना अलग रख लेगा।

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18 अग, 16 को जहाज की यात्रा का पांचवां दिन हो गया। सुबह 8 बजे ही हम सिटका उत्तरने वाले थे इसलिये सब जल्दी उठ गये। नाश्ता इससे पहले ही कमरे में मंगवा लिया था। कुछ ब्रेड और फल साथ भी ले लिये। दिन भर बाहर रहने वाले थे 4 बजे से पहले लौटने भी नहीं वाले थे और तब तक खाना भी बन्द हो जाने वाला था। एक दिन पूर्व ही हमने फूड सुपरवाइजर पीटर से बात कर ली थी, उसने कहा कि वह हमारे लिये खाना अलग रख लेगा।
सिटका समुद्र किनारे बसा एक छोटा सा नगर है वहां की आबादी 8 हजार के लगभग है। यहां आने के लिये नार्वे या जहाज या सिर्फ हवाई मार्ग ही विकल्प है। सिटका छोटे छोटे द्वीपों का समुह है। घने जंगल और समुद्र के बीच अवस्थित होने के कारण यह पर्यटन के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है।
जहाज से उतरे तो तट पर कोई खास गतिविधि नजर नहीं आई। एक प्रतीक्षालय जैसा बड़ा सा हाल सामने नजर आ रहा था। यहां जाने के लिये लकड़ी सीढीयां काफी ऊंची थी। बाहर निकलने का यही एकमात्र हॉल के अन्दर ढेर सारे लोग नजर आ रहे थे, इनकी स्थिति बहुत नहीं हो रही थी, शायद नाविक या मछुआरे रहे होंगे।
बाहर ही शटल बसें आ-जा रही थी। इन्हीं में से एक बस में हम बैठ अन्य यात्री भी इन्हीं बसों में बैठ रहे थे। नगर तट से कुछ दूरी पर था यह जाने का एकमात्र साधन ये बसें ही थीं। बसे यहां के नगर प्रशासन द्वारा चलाई जाती हैं।
अमेरिका तथा अन्य कई देशों में भी पर्यटकों के इस तरह के निशुल्क को देख अचरज होता है कि भारत में तो पर्यटकों के प्रति इस तरह की कहीं दिखाई नहीं देती। पर्यटक से पैसा वसूलने का कोई मौका न तो नीय प्रशासन, न ही सरकारें छोड़ती हैं।
बस घने जंगलों में से गुजरते हुए आगे बढ़ रही थी। रास्ते में कहीं कोई मकान गोदाम नजर आ जाता था, या पेड़ों के झुरमुट से झाकता समुद्र का पानी दिख जाता था। न तो कोई वाहन सड़क पर नजर आ रहा था न ही कहीं एक व्यक्ति के भी दर्शन हुए। राह में कहीं किसी पेड़ पर कोई उल्लू या ईगल बैठा होता था तो बस रोक कर पर्यटक उसे देखने लगते।
बस शीघ्र ही एक बस्ती में पहुँच गई। यहां भी समुद्र का किनारा था। लहरें तेजी से उठती शोर मचा रही थी, आवाज इतनी तेज थी कि एक दूसरे की बात भी सुनाई नहीं दे रही थी। यहां फुटपाथ पर ही अलग अलग टूर कम्पनियों के गाईड में बोर्ड लिये खड़े थे। सिटका अपने जंगलों और व्हेल मछलियों के लिये प्रसिद्ध था। यात्री इन्हीं स्थानों को देखने के लिये यहां बुकिंग करवा रहे थे।
प्रीति ने हमारी बुकिंग पहले ही करवा ली थी लेकिन यह पता नहीं लग पा रहा था कि किससे सम्पर्क करना है। यहीं एक लड़की खड़ी थी जो व्हेल देखने के टिकट बेच रही थी। इससे बात की तो इसने प्रति टिकिट 175 डालर मांग लिये। प्रीति ने उससे कहा कि हमने तो 125 डालर में ही बुकिंग करवा रखी है, उसे फोन मैं मेसेज दिखाया तो वह लड़की कहने लगी कि प्रीति की उसीसे बात हुई थी और उसने बुकिंग की थी।
उसने हमें एक तरफ ठहरने को कहा। हम 4 लोग थे, एक नाव में 6 लोग तक जा सकते हैं इसलिये वह इस तलाश में थी कि दो लोग और मिल जायें तो हमारे साथ ही भेज देगी। हमें ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा। एक दम्पति आ गये तो सब लोगों को समुद्र किनारे बंधी एक स्पीड बोट की तरफ बढ़ने का इशाना किया गया।
बोट किनारे पर बंधी हुई थी लेकिन हवाएं इतनी तेज चल रही थी कि बोट भी पानी पर उछल रही थी। इसे देख कर ही मेरे प्राण सूखे जा रहे थे। जहाज तो इतना बड़ा होता है कि पता ही नहीं चलता कि हम पानी में है या नहीं, मगर छोटी सी नाव थी, इसमें भी हम सिर्फ छः लोग और एक नाविक, उपर से पानी इतना उछल रहा, मुझे तो तैरना भी नहीं आता। मैंने अपने डर का इजहार किसी से नहीं किया और भगवान का नाम लेकर आगे बढ़ा।
नाव तक जाने के लिये एक रेम्प बना हुआ था, इसका उतार भी सहज नहीं था, उछलते पानी से यह गीला भी हो गया था, फिसलने का खतरा बहुत था। एक हाथ से रेलिंग पकड़ कर और दूसरा हाथ राजा को थमा मैं धीरे धीरे रेम्प से नीचे उतरा। नाव पर चढ़ने के लिये एक पाटिया लगा रखा था। नाव इतनी हिल रही थी कि इस पर चढ़ने का संतुलन बनाना भी मुश्किल हो रहा था। स्पीड बोट का पायलट भारी भरकम व्यक्ति था। उसने मुझे थाम कर नाव में चढ़ाया। बाकी सब लोग तो अत्यन्त चपलता से चढ़ गए।
हम सभी को लाईफ जेकेट पहना दिये गये नाव के दो हिस्से थे, एक तो केबिन था जिसमें 6 लोगों के बैठने की सीटें बनी हुई थी, दोनों तरफ कांच की बड़ी बड़ी खिड़कियां थी जिससे बाहर समुद्र का दृश्य आसानी से दिखाई देता था। खिड़कियों के शीशे खिसकाये जा सकते थे ताकि बाहर के फोटो आसानी से लिये जा सकें।
बोट का दूसरा हिस्सा खुला था। यहां तीन चार लोग एक साथ खड़े होकर खुले समुद्र को आसानी से देख सकते थे। पायलट अत्यन्त जिन्दा दिल और खुश मिजाज था। उसने बताया कि वह अलास्का के मूल लोगों का वंशज है। रूसीयों और अमेरीकियों के आने से पहले जो आदिवासी यहां रहते थे उन्हें क्लिनकिट कहते थे। वह इसी जाति का वंशज था। उसे इस बात का बहुत गर्व था कि उसके पूर्वजों से यह जमीन अमरीकियों ने खरीदी बात बात में अलास्का पर उसके लोगों के अधिकार का यह गर्व परिलक्षित हो रहा था। उसने बताया कि 1867 में जब अमेरिका ने रूस से अलास्का खरीदा था तब उसके कागजातों पर हस्ताक्षर सिटका में ही किये गये थे।
होलीवुड की प्रसिद्ध कोमेडी फिल्म दी प्रपोजल की शूटिंग भी सिटका में ही साड़ा बुलोक और रोन रेनोल्डस की फिल्म में मुख्य भूमिकाएं हैं। हुई थी। यह फिल्म मेरी देखी हुई है. टी.वी. पर अक्सर आती रहती है, मजेदार है।
स्पीड बोट शुरू करने से पहले पायलट ने हमे सुरक्षा निर्देश दे दिये। इन्हें सुन जी और धड़कने लगा। समुद्र आन्दोलित था, नाव डगमगा रही थी, मैंने जी कड़ा करके पायलट से पूछ ही लिया कि एसे समुद्र में हम कैसे जा पायेंगे। पायलट बोटिंग कराता है। ऐसे छोटे मोटे तूफान तो यहां की दैनन्दिन घटनाएं है। समुद्र अगर ने कहा यह तो कुछ भी नहीं है, इससे भी ज्यादा हवाओं के बीच वह यात्रियों को शान्त रहे तो बोटिंग का भी मजा नहीं आता है। उसने बताया कि कुछ दिन पहले ही सिटका आने वाले 3 क्रूज जहाजों की यात्रा रद्द कर दी गई थी। लगभग 4500 यात्री सिटका देखने से वंचित रह गये थे। वो तो वंचित हुए ही, हमारी रोजी रोटी पर लात अलग से पड़ गई।
इसके साथ ही उसने नाव शुरू कर दी। स्पीड बोट का अगला हिस्सा पानी के उपर निकलता रहता है और पिछला हिस्सा पानी की सतह पर रहता है। नाव एकदम उछल कर तेजी से आगे बढ़ने लगी। आसमान बादलों से आच्छादित था, किसी भी क्षण वर्षा की संभावना नजर आ रही थी। नाव अपनी तेज गति से समुद्र में आगे कुछ भी अप्रिय अनुभूति नहीं हुई तो मेरे जी को शांति मिली। अब मैं भी उत्साह से समुद्र की तरफ देखने लगा। सभी की निगाहें इधर उधर समुद्र में लगी हुई थी कि कहीं कोई व्हेल नजर आ जाये।
विभिन्न एटीएम में जाल कई मामले दर्ज हैं। पुलिस ने बिछाया और कड़ी मशक्कत के कहा कि उसका साथी भी बिहार कर का मूल निवासी है उसकी पायलट नाव को काफी आगे तक ले गया, मगर कहीं कोई व्हेल का नामों निशां नहीं, हम लोग इतना पैसा खर्च कर यहां आये थे, सब बेकार हो गया। हम लोगों की निराशा देख पायलट ने कहा कि कभी कभी एसा होता है कि एक भी व्हेल मछली नजर नहीं आती जबकि कभी इतनी नजर आ जाती है कि पर्यटक फोटो खींचते खींचते परेशान हो जाते हैं। पायलट ने बताया कि इसी स्थान पर पिछले हफ्ते कई व्हेल नजर आये थे इसलिये वो यहीं लेकर आया। समुद्र विशाल हैं, कई बार व्हेल इधर से उधर चले जाते हैं। उसने कहा कि वह अब नाव को दूसरी दिशा में ले जाता है, शायद वहां व्हेल दिखने को मिल जायें।

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