Yatra Vrutant-Suresh Goyal-Pratahkal-Rajasthan
पिकअप वाहन ने वापस हमें उसी चौक में छोड़ दिया। यहां उपर पहाड़ पर जाती केबल ट्राम फिर दिखाई दी। यहां से पैदल चलते हुए हम जहाज की तरफ अग्रसर हुए। राह में बड़ी बड़ी सोवेनीर शोप्स थी पर्यटक यादगार के रूप में कुछ न कुछ खरीदने को उमड़े जा रहे थे। अलास्का नाम छपे हुए टी शर्ट्स और केप्स की धड़ाधड़ बिक्री हो रही थी। हमने भी कुछ देर यहां व्यतीत कर छोटी मोटी खरीददारी की।
जून हमारी यात्रा का उत्तरतम भाग था। जहाज को जितना दूर आना था आ चुका था, अब यहां से हमारी लौटने की यात्रा शुरू होने वाली थी। अभी तो यात्रा का तीसरा दिन ही था, चार दिन और शेष थे। अलास्का चूंकि मूलत: रूसी प्रदेश था इसलिये रूस का प्रभाव यहां नजर आता है। रूसी आर्थोडोक्स चर्चों की यहां उपस्थिति उसी का संकेत थी।
थोड़ी देर इधर उधर दुकानों पर देखा-देखी कर हम वापस जहाज में लौट आये दिन को जहाज से उतरने पर जो ढेर सारी स्टालें और चहल पहल नजर आ रहीं थी वे सब गायब थी। चारों तरफ सन्नाटा था। गेंग प्लेक चढ कर हम जहाज में पहुँचे। यहां सबसे पहले प्रत्येक यात्री को सेनेटाइज़र से अपने हाथ साफ करने को कहा जा रहा था ताकि किसी तरह का संक्रमण जहाज के अन्दर नहीं पहुंचा पुनः हमारे कमरों के चाबी कार्ड तथा साथ लाया सामान स्केन कर आगे जाने दिया। गया।
खाने का वक्त हो गया था, आज तो डिनर टेबल भी बुक नहीं कराई थी। साथ का सामान, जेकेट, टोपे वगैरा सब कमरों में रख कर डाइनिंग रूम में पहुँच गये। अधिकांश यात्री अभी भी बाहर ही थे इसलिये टेबलें खाली मिल गई। खाकर वापस उपरी डेक में पहुँच गये। जहाज जूनू बन्दरगाह छोड़ने लगा था। शीघ्र ही हम आबादी क्षेत्र से दूर जाते हुए बीच समुद्र में पहुँच गये। समुद्र शांत था। हम लोग खुले डेक पर बैठे थे जहां शीतल हवाओं के झाँके शरीर में सिहरन पैदा कर रहे थे।
जहाज के अन्य हिस्सों में दैनन्दिन गतिविधियां पूर्ववत जारी थी, सिर्फ कैसीनो ही बन्द था। अब हम वापस जिधर से आये थे उधर ही दक्षिण दिशा में अग्रसर थे। आते वक्त तो जहाज एकदम खुले समुद्र में यात्रा करते हुए सीधे जूनू पहुँच गया था मगर वापसी में हम अलास्का के किनारे किनारे जा रहे थे। अलास्का के किनारों के पास ही कई छोटे छोटे द्वीप अवस्थित है। जहाज अलास्का के किनारे और इन द्वीपों के बीच में से होकर ही गुजर रहा था इसलिये दोनों तरफ निरन्तर पहाड़ों की श्रृंखला नजर आ रही थी।
डेक से कमरे में लौट कर सो गये। प्रीति को विभिन्न कार्यक्रम देखने का शौक था, वह उसी में व्यस्त हो गई। अगले दिन 17 अग. हो गया था। हमारी जहाज यात्रा का चौथा दिन शुरू हो गया। जहाज पूरे दिन और पूरी रात समुद्र में ही चलने वाला था। अगले दिन सुबह हम सिटका में उतरने वाले थे।
आज रात को जहाज में एक गाला डिनर का आयोजन किया गया था। सभी यात्रियों से सूट-बूट और टाई पहन कर अपने श्रेष्ठ परिधानों में आने को कहा गया था। महिलाओं को भी सुन्दर से सुन्दर वस्त्र पहन सज धज कर आने को कहा गया था। जहाज में दो तीन दिन एक ही तरह की गतिविधि के कारण नीरसता आ जाती है। इस नीरसता में रस भरने के लिये ही इस तरह के आयोजन रखे जाते हैं। गाला • डिनर के बारे में यात्रियों को बुकिंग के समय ही बतला दिया जाता है ताकि वे अपने साथ श्रेष्ठ परिधानों की एक जोड़ी जरूर ले कर आएं। मुनीश ने मुझे भारत में ही फ़ोन कर दिया था तो मैंने साफ कह दिया था कि मैं टाई बांधने वाला नहीं, न मेरे पासको सूट है। मैं पेन्ट शर्ट लेकर आउंगा, वही पहन लूंगा। मैंने पूरी जिन्दगी कभी नही लगाई तो अब जीवन के इस संध्याकाल में एसा नहीं कर पाउंगा। टी ने यही कह कर बात समाप्त की कि ज्यादा से ज्यादा यही होगा कि हम डिनर में नहीं लेंगे। मुझे यह बात जंच गई।
जहाज पर आने के बाद हमने पूछ लिया था कि कोई सूट बूट टाई में नहीं आये तो उसे डिनर में प्रवेश मिलेगा या नहीं, इस पर उन्होंने कहा कि कोई अनिवार्यता नहीं है मगर आपके पास ये हैं तो हमारी प्रार्थना है कि आप जरूर पहन कर आये। मैं तो मैं राजा तक के पास कोई सूट-टाई नहीं थे। वो तो पिछले 35 तालों से अमेरिका में है फिर भी यहां का रंग उस पर नहीं चढ़ा था- ऐसी का देसी ही था। आज भी वो दिन भर कैसे निकल गया पता ही नहीं चला। खुले डेक पर ठंडी हवाओं का आनन्द लेने बैठ जाओ तो वक्त का पता ही नहीं चलता। अगले दिन सुबह 8 बजे ही सिटका में लंगर डालने वाला था। सभी यात्रियों से जल्दी उठकर तैयार हो जाने को बता दिया गया था ताकि सिटका के अधिकाधिक दर्शनीय स्थलों का आनन्द लिया जा सके।
डिनर का वक्त हो गया, न मेरे पास और न ही राजा के पास कोई विशेष वस्त्र है। हम रोज के कपड़ों में ही पहुँच गये। प्रीति ने अत्यन्त सुन्दर वस्त्र पहने थे। वह बहुत आकर्षक लग रही थी। मुनीश ने सूट-बूट-टाई धारण की थी, वह भी मे अत्यन्त स्मार्ट दिख रहा था। इन दोनों के साथ हम दो ढीलम ढाले अजीब सा विरोधाभास उपस्थित कर रहे थे। मेट्रे डे ने हमारे वस्त्रों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया वरन एसे स्वागत किया जैसे हम कोई शहजादे हैं। अपने ग्राहकों को प्रसन्न रखने की नीति की यह पराकाष्ठा थी। मार्केटिंग के छात्रों को इससे बहुत सीखने की जरूरत है।
एक वेटर हमें अपने टेबल तक ले गया। चारों तरफ अत्यन्त सुन्दर वस्त्रों में महिलाएं अपनी उपस्थिति का अहसास करा रही थी। पुरूष भी एक से बढ़िया एक डिनर सूट पहने थे। रोज की नीरसता की जगह उल्लास का वातावरण था। हर कोई अपनी प्रसन्नता जाहिर कर रहा था। स्त्रियां अपनी प्रशंसा सुन फूली नहीं समा रही। थी। बेटर भी अलग वेष में थे। खाना भी खास था। मेरे लिये तो भारतीय व्यंजन ही आया मगर इसमें भी विशिष्ठता रखने की कोशिश की गई थी। खाने के बाद आयोजित मनोरंजन कार्यक्रम भी छांट कर इस दिन के लिये खास रखे गये थे। अलग अलग देशों के नृत्यों के कार्यक्रम ने सबका मन मोह लिया, हालांकि भारतीय नृत्य या गीत का अभाव खला। जहाज चूंकि हालेण्ड की कम्पनी का है इसलिये यूरोपीय प्रभाव ही ज्यादा नजर आ रहा था। इसके साथ ही दम्पत्तियों के लिसलिये अलग से कार्यक्रम आयोजित था। यह हास्य व्यंग्य से परिपूर्ण था। पति-पत्नीयाँ को अलग अलग अपने हमराहियों की कमियों व विशेषताओं के बारे में बताने को कहा जा रहा था। इसका सबने भरपूर आनन्द लिया।
इसी तरह एक बार रूम में बने डान्स फ्लोर पर कराओके कार्यक्रम आयोजित था। यहां यात्री अपनी अपनी पसन्द के गीत गा रहे थे और आर्केस्ट्रा उस गीत की धुन बजा रहा था। जहाज पर विभिन्न देशों के लोग थे, सब अपने अपने देश के लोकप्रिय गीत गा रहे थे। तभी हमारे बीच इन्द्रा आ गई, उसने हमसे कोई भारतीय गीत गाने को कहा मगर कोई तैयार नहीं था। उसने अन्य कई भारतीयों से भी निवेदन किया था कि कम से कम एक गीत तो कोई हमारे देश का गाए। जब कोई आगे नहीं आया तो मैंने इन्द्रा से कहा कि तू ही हिम्मत कर कुछ गा दे। वहां ऐसे ऐसे लोग भी गाना गा रहे थे जिन्हें एक लाईन भी पूरी याद नहीं थी फिर भी उनके प्रयासों की सभी तालियां बजा कर स्वागत कर रहे थे।
Editorial

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