Pratahkal-Acharya Mahashraman
मुंबई । आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) के सानिध्य में पर्यूषण महापर्व का दूसरा दिन स्वाध्याय दिवस के रूप में आयोजित हुआ। मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान मुनि जयेशकुमार ने तीर्थ और तीर्थंकर विषय पर अभिव्यक्ति दी। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशा ने दस धर्मों में क्षांति और मुक्ति धर्म पर आधारित गीत का संगान किया। मुख्यमुनि महावीरकुमार ने क्षांति-मुक्ति धर्म को व्याख्यायित किया। समणी प्रणवप्रज्ञा ने स्वाध्याय दिवस के संदर्भ में गीत का संगान किया। साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभा ने स्वाध्याय दिवस पर जनता को उद्बोधन दिया।
आचार्य महाश्रमण ने भगवान महावीर (Bhagwan Mahavir) की अध्यात्म यात्रा का क्रम प्रारम्भ करते हुए कहा कि भगवान महावीर की आत्मा ने तीर्थंकर बनने और मोक्ष प्राप्त से पूर्व अनंत-अनंत बार जन्म ग्रहण किया था। उनका ही नहीं, बल्कि सभी मनुष्यों की आत्मा अब तक अनंत-अनंत बार जन्म-मृत्यु के चक्र से गुजर चुकी है। स्वाध्याय दिवस पर उन्होंने कहा कि स्वाध्याय से ज्ञान का विकास होता है। 12 प्रकार के तपों में दसवां तप स्वाध्याय होता है। स्वाध्याय के समान कोई तप नहीं होता है। ज्ञान के विकास और ज्ञान की प्राप्ति का सशक्त माध्यम है स्वाध्याय। प्रवचन देना और सुनना भी स्वाध्याय है। संयम रूपी शरीर को स्वाध्याय से पोषण मिलता रहे। श्रावक-श्राविकाओं को भी स्वाध्याय से लाभ प्राप्त होता रहे।
प्रवास व्यवस्था समिति अध्यक्ष मदनलाल तातेड, मुख्य प्रबंधक मनोहरलाल गोखरू, महामंत्री सुरेंद्र कोठारी, महेश बापना, कोषाध्यक्ष गौतम कोठारी के मार्गदर्शन में पर्यूषण आयोजन में पूरी टीम लगी हुई है।
Editorial

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