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मितव्ययी नवाचार की हमारी कहानियां
By EditorialPublished on
भारत (Bharat) ने विगत 23 अगस्त को अपने चंद्रयान- 3 (Chandrayan-3) लैंडर (Lander) को चंद्रमा (Chandrama) के दक्षिणी ध्रुव (South Pol) के पास उतारने वाले पहले देश के रूप में इतिहास (History) रचा। उसने ऐसा उस लागत पर किया, जो अन्य देशों द्वारा इसी तरह के अभियान पर खर्च की जाने वाली लागत का एक छोटा-सा हिस्सा है। चंद्रयान- 3 मिशन की लागत करीब 6.15 अरब रुपये है, जो रूस के चंद्र अभियान या नासा के नियोजित रोवर से काफी कम है या यहां तक कि अंतरिक्ष से संबंधित हॉलीवुड की अधिकांश ब्लॉकबस्टर फिल्मों की लागत से भी काफी क
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पत्रलेखा चटर्जी... भारत (Bharat) ने विगत 23 अगस्त को अपने चंद्रयान- 3 (Chandrayan-3) लैंडर (Lander) को चंद्रमा (Chandrama) के दक्षिणी ध्रुव (South Pol) के पास उतारने वाले पहले देश के रूप में इतिहास (History) रचा। उसने ऐसा उस लागत पर किया, जो अन्य देशों द्वारा इसी तरह के अभियान पर खर्च की जाने वाली लागत का एक छोटा-सा हिस्सा है। चंद्रयान- 3 मिशन की लागत करीब 6.15 अरब रुपये है, जो रूस के चंद्र अभियान या नासा के नियोजित रोवर से काफी कम है या यहां तक कि अंतरिक्ष से संबंधित हॉलीवुड की अधिकांश ब्लॉकबस्टर फिल्मों की लागत से भी काफी कम है- क्रिस्टोफर नोलन द्वारा सह-लिखित, निर्देशित और निर्मित 2014 की एपिक साइंस फिक्शन फिल्म 'इंटरस्टेलर' का बजट 16.5 करोड़ डॉलर था।
वैश्विक अंतरिक्ष समुदाय में भारत के एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभरने के पीछे एक बड़ा कारण कम लागत में प्रभावी अंतरिक्ष अभियान संचालित करने की इसकी उल्लेखनीय क्षमता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) (ISRO) की 'मितव्ययी इंजीनियरिंग' का दर्शन दक्षता एवं सरलता पर केंद्रित है। चंद्रमा पर अपनी सफलता के बाद भारत ने विगत दो सितंबर को अपनी पहली सौर वेधशाला भी लॉन्च की, और सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) जरिये आदित्य एल- 1 (Aditya L-1) प्रोब को अंतरिक्ष में भेजा। यह सफलता भी बहुत कम बजट में हासिल की गई।
कम लागत में अंतरिक्ष अभियानों को संचालित करने के मामले में भारत की उपलब्धियां निर्विवाद रूप से प्रशंसनीय हैं, लेकिन हमें चुनौतियों को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए। वैश्विक स्तर पर अंतरिक्ष अभियानों की होड़ बढ़ रही है और ज्यादा से ज्यादा देश एवं निजी कंपनियां इस मैदान में कूद रही हैं। भारत को इस प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए नवाचार करते रहना चाहिए और मितव्ययी तरीके से अनुकूलन करना चाहिए। इसके लिए, हमें यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि इसरो अपनी शीर्ष प्रतिभा को बनाए रखे और उसके पास अगली पीढ़ी के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को विकसित करने के लिए पर्याप्त संसाधन हों, जैसा कि कई विशेषज्ञ बताते हैं ।
इसरो को आज जो सफलताएं मिल रही हैं, वे दशकों पहले उच्च शिक्षा के उच्च गुणवत्ता वाले संस्थानों में किए गए निवेश का परिणाम हैं। जब हम अपने शीर्ष वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की सफलता का आनंद उठाते हैं, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पिरामिड के निचले हिस्से में हालत अब भी खराब हैं। देश भर में बुनियादी शिक्षा की गुणवत्ता में भारी असमानता है, जबकि कई राज्यों में काफी कुछ हो रहा है। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अधिक से अधिक भारतीयों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा मिले, ताकि हमारी नींव मजबूत हो ।
भारत के मितव्ययी नवाचार की कहानी दूसरे कई अन्य क्षेत्रों तक फैली हुई है। भारत को फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड ( दुनिया का दवाखाना) के रूप में जाना जाता है। भारत में तैयार होने वाली सस्ती जेनेरिक दवाओं ने दुनिया भर में लाखों लोगों को बचाने में मदद की है । सिपला के डॉ यूसुफ ख्वाजा हामिद ने प्रतिदिन एक डॉलर में एड्स की दवाएं बेचने के लिए बिग फार्मा के साथ मुकदमा लड़ा और इस तरह अफ्रीका में लोगों की जान बचाई। हामिद एक भारतीय वैज्ञानिक हैं और वर्ष 1935 में उनके पिता ख्वाजा अब्दुल हामिद द्वारा स्थापित एक जेनेरिक फार्मास्यूटिकल्स कंपनी सिपला के गैर- कार्यकारी चेयरमैन हैं। उनके पिता ख्वाजा अब्दुल हामिद महात्मा गांधी और स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरित थे । द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब भारतीय सैनिकों की ओर से दवा की मांग बढ़ी और यूरोप के दवा निर्माताओं हाल के महीनों में, भारतीय स्वास्थ्य से आपूर्ति घट गई थी, तब सिपला कंपनी ने अधिकारियों ने ऐसी स्थिति से निपटने के ही मलेरिया के इलाज के लिए कुनैन और लिए कई उपाय शुरू किए हैं, जिनमें निर्यात पेचिश (आंतों की सूजन के साथ खूनी दस्त ) से पहले कफ सिरप के परीक्षण की मांग के इलाज के लिए सुइयां उपलब्ध कराई थीं।
वर्ष 2001 में यूसुफ हामिद ने एक श्रृंखला / विक्रेताओं आदि में डिजिटल अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा और मानवीय संगठन फुटप्रिंट तैयार करना तथा बेहतर विनिर्माण (डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स) को एड्स से लड़ने प्रथाओं (जीएमपी) का पालन न करने के लिए प्रति रोगी प्रतिदिन लगभग एक वाली विनिर्माण कंपनियों पर नकेल कसना डॉलर के हिसाब से दवाओं की पेशकश शामिल है। लेकिन अब भी बहुत कुछ किए करके वैश्विक दवा उद्योग को हिलाकर रख जाने की जरूरत है। मसलन, भारत को यह दिया था। वह वैश्विक फार्मास्युटिकल सुनिश्चित करना होगा कि यहां नकली और दिग्गजों द्वारा बेची जाने वाली समान दवाओं घटिया दवाओं के लिए कोई जगह नहीं की लागत का करीब पांच फीसदी ही था है । उस पेशकश ने एड्स के इलाज की तस्वीर ही बदल डाली। नतीजतन बड़ी दवा कंपनियों को अपनी एड्स की दवाओं की कीमत कम करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
बिग फार्मा ने हामिद पर अपनी कमाई बढ़ाने के लिए दूसरों की 'बौद्धिक संपदा' का दोहन करने और भविष्य की दवाओं में निवेश को कम करने का आरोप लगाया। हालांकि, दुनिया भर में लाखों लोग उन्हें एक बेहतर उद्देश्य के लिए लड़ने वाले योद्धा के रूप में देखते हैं।
लेकिन भारत अपनी अब तक की उपलब्धियों पर ही इतराता नहीं रह सकता। इसे गुणवत्ता और मितव्ययी नवोन्मेषी के रूप में अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करनी होगी। हाल के दिनों में भारत से जुड़ी दूषित (घटिया) दवाओं की बाढ़ आ गई है। एक वर्ष से भी कम समय में अफ्रीका और मध्य एशिया में कम से कम तीन गंभीर मामले सामने आए, जिसने सस्ती जेनेरिक दवाओं के विश्वसनीय स्रोत के रूप में भारत की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भारतीय जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता को लेकर चिंता जताता रहा है। यह बहुत ही गंभीर मामला है, क्योंकि मौतें हुई हैं।
एक मितव्ययी नवप्रवर्तक के रूप में भारत के पास बताने के लिए शानदार कहानियां हैं, जिसे संसाधनों की कमी वाली दुनिया नजर अंदाज नहीं कर सकती है, लेकिन जैसे कि हम कहानी बताते हैं, हमें अपने भीतर निरीक्षण भी करना चाहिए और जमीनी स्तर पर चुनौतियों का समाधान करना चाहिए ।

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