shikahr parishad
हरजिंदर… शुरुआत ही सफलता के साथ हुई। जी-20 (G-20) शिखर सम्मेलन (Shikhar Summit) के पहले ही सत्र में इसका कुनबा बढ़ गया। अफ्रीकी संघ (African Union) को स्थायी सदस्य बनाए जाने के साथ ही अब अगली बार यह जी-21 (G-21) कहलाएगा। अफ्रीकी संघ के शामिल होने का अर्थ यह है कि जी-20 में अब एक ऐसा संगठन जुड़ गया है, जिसके सदस्य 55 देश हैं। यूरोपीय संघ (European Union) पहले ही जी -20 का हिस्सा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने जब अध्यक्ष पद से इसकी घोषणा की और अफ्रीकी संघ के अध्यक्ष अजाली असौमानी (Ajali Asoumani) को गले लगाया, तो असौमानी की प्रसन्नता देखने लायक थी। वह कोमोरोस
(Comoros)
नाम के एक छोटे से अफ्रीकी देश राष्ट्रपति हैं। हिंद महासागर (Indian Ocean) के एकदम आखिरी छोर पर बसा कोमोरोस द्वीप इतना छोटा देश है कि दुनिया के नक्शे पर उसे खोजना भी मुश्किल काम है। जी- 20 के साथ जुड़े कार्यक्रमों में जिन विश्व नेताओं के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने द्विपक्षीय वार्ता की है, उनमें असौमानी भी एक हैं।
इससे हम यह भी समझ सकते हैं कि भारत की विश्व दृष्टि में अफ्रीका की अहमियत किस कदर बढ़ रही है। यहां एक और बात का जिक्र जरूरी है कि भारत ने इस सम्मेलन में जिन गैर सदस्य देशों को अतिथि का दर्जा दिया, उनमें नाईजीरिया भी है। यह तो खैर पूरी दुनिया ही स्वीकार कर रही है कि अफ्रीका को नजरंदाज करके विश्व अर्थव्यवस्था के भविष्य के बारे में नहीं सोचा जा सकता। जब अफ्रीकी संघ को शामिल किए जाने की खबर आ रही थी, तब किसी ने भी सोचा नहीं था कि एक और बड़ी सफलता इंतजार कर रही है। पिछले साल जब जी-20 का शिखर सम्मेलन बाली में हुआ, तब उसके घोषणापत्र को अंतिम रूप देने में इंडोनेशिया को काफी पापड़ बेलने पड़े थे। यूक्रेन से टकराव पर रूस की निंदा करने का मामला इस कदर फंस गया था कि अंतिम समय तक यही डर था कि घोषणापत्र जारी भी हो पाएगा या नहीं । यही आशंकाएं दिल्ली घोषणापत्र को लेकर भी थीं। रूस और चीन कह रहे थे कि जी -20 एक आर्थिक मंच है, यह भौगोलिक राजनीति का मंच नहीं है, इसलिए इसमें यूक्रेन युद्ध का जिक्र होना ही नहीं चाहिए, जबकि पश्चिमी देशों का कहना था कि इस युद्ध का जिक्र ही नहीं, बल्कि इसके लिए रूस की निंदा भी जरूरी है। एक राय यह भी थी कि जी - 20 भले ही आर्थिक मंच है, लेकिन युद्ध आर्थिक विकास में सबसे बड़ी बाधा बनता है, इसलिए इसका जिक्र जरूरी है। फिर कुछ चेतावनियां भी थीं कि अगर उनके पक्ष को इसमें जगह नहीं मिली, तो वे सहमति नहीं देंगे। भारत को एक साथ कई तल्खियों को साधना था और सबके हितों का भी ध्यान रखना था। एक ऐसा दस्तावेज तैयार करना था, जो किसी को चुभे भी न और उसमें आने से कोई बात बचे भी न । परदे के पीछे की तमाम मशक्कत के बाद भारतीय राजनयिक ऐसे घोषणापत्र को तैयार करने में कामयाब रहे, जिसमें सभी की पूरी सहमति थी। बेशक कुछ आलोचनाएं भी हो रही हैं। कहा जा रहा है कि नई दिल्ली घोषणापत्र में वह तेवर नहीं है, जो बाली घोषणापत्र में था। यह आलोचना भी है कि सबको खुश करने के चक्कर में इसे चूं चूं का मुरब्बा बना दिया गया है, मगर ऐसा घोषणापत्र संभव भी नहीं था, जिसमें तलवारें तनी दिखाई दें। अंतरराष्ट्रीय मंच सहमतियों को एकजुट करके आगे बढ़ने के लिए होते हैं। यहां असहमतियों को तूल देने का अर्थ होता है आगे बढ़ने का रास्ता रोकना। पहले ही दिन घोषणापत्र को अंतिम रूप दे दिए जाने का अर्थ यह भी था कि आगे के सत्रों में पर्यावरण जैसे मुद्दों पर बिना तनाव बात हो सकी।
इस तरह के सम्मेलनों में अपनाए गए घोषणापत्र आते हैं और चले जाते हैं। कुछ तात्कालिक चर्चा के बाद वे इतिहास का विषय बन जाते हैं। शायद यही हश्र दिल्ली घोषणापत्र का भी होगा, लेकिन यह बात हमेशा याद की जाएगी कि भारत के राजनय ने तमाम तनावों के बीच भी सहमति का खाका खींचने में बड़ी आसानी से कामयाबी हासिल कर ली।
यह भी मुमकिन है कि दिल्ली में हुए जी-20 के शिखर सम्मलेन को आगे जाकर उतना न याद किया जाए, जितना कि उसी दौरान हुए कुछ दूसरे समझौतों के लिए याद किया जाएगा। खैर, शनिवार को भारत से यूरोप तक पश्चिम एशिया होकर जाने वाले जिस आर्थिक गलियारे को घोषणा हुई, वह परियोजना बहुत महत्वाकांक्षी है। इस कॉरिडोर को बनने में लंबा वक्त लग सकता है, लेकिन यह इस रास्ते में पड़ने वाले देशों को बहुत बड़ी उम्मीद बंधाने वाली परियोजना है। एक दशक पहले चीन ने इसी तरह की एक योजना बनाई थी, जिसे वन बेल्ट, वन रोड का नाम दिया गया था। चीन उस मार्ग को आधुनिक सड़क का रूप देना चाहता है, जिस मार्ग से कभी रेशम के कपड़े यूरोप और पूरी दुनिया में पहुंचते थे । में शुरू इस योजना को लेकर जो उत्साह था, वह पिछले कुछ समय में ठंडा पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। यह परियोजना चीन से मिलने वाले आसान आर्थिक कर्ज पर आधारित थी, लेकिन पिछले कुछ समय में चीन से आर्थिक कर्ज लेने वाले देशों का जिस तरह से दीवाला पिटा है, उसके बाद बहुत से देशों की इसमें दिलचस्पी कम हो गई है।
जी-20 सम्मेलन के दौरान जिस गलियारे की घोषणा हुई है, उसकी तह में चीन की वन बेल्ट, वन रोड परियोजना के सबक भी हैं। दुनिया के बहुत से देश उस प्राचीन मार्ग को आधुनिक रूप देना चाहते हैं, जिससे कभी भारत के मसाले यूरोप और पूरी दुनिया तक पहुंचते थे। वैसे, इसे किसी एक देश से मिली आर्थिक मदद या कर्ज के आधार पर तैयार नहीं किया जाएगा। अभी तक जो सूचना है, उसके हिसाब से इसके रास्ते में पड़ने वाले देश आर्थिक सहयोग करेंगे। हालांकि, अमेरिका इसके रास्ते में नहीं है, मगर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने जिस उत्साह से भाग लिया, वह बताता है कि अमेरिका भी इसमें अपना हित देख रहा है।
दिल्ली (Dehli) में जिस तरह का मजमा जुटा वैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की सफलता अक्सर उनके सुचारू रूप से संपन्न हो जाने से ही आंकी जाती है। ज्यादातर वे अपनी भव्यता और तस्वीरों के लिए याद किए जाते हैं, लेकिन इस जी -20 सम्मेलन को उसकी कुछ ठोस उपलब्धियों के लिए भी याद किया जाएगा। कुछ वे उपलब्धियां, जो सम्मेलन स्थल पर मिलीं और कुछ वे, जो इस दौरान हुई दूसरी बैठकों में मिलीं।
Editorial

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