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अलास्का जहाज यात्रा 18 : बर्फ के उपर दौड़ती कुत्ता गाड़ी की रोमांचक सवारी
By EditorialPublished on
थोड़ी ही देर में हेलीकोप्टरों के पंखों की आवाज आने लगी तो जान में जान आई। शीघ्र ही आकाश में उड़ते हेलीकोप्टर नजर आने लगे। एक एक करके ये उतरते रहे और इनसे यात्री बाहर निकलते रहे। जब सब हेलीकोप्टर खाली हो गये तो हमें बैठने को कहा गया। वापसी की यात्रा बहुत छोटी रही। आते वक्त तो समूचे ग्लेशियर व पहाड़ों का दर्शन करवाते लाया गया था। जाते वक्त हमें सीधे एयरपोर्ट पर ले जाया गया। इस बार हमें जूनू के दर्शन करने को मिले। पूरा शहर तट पर ही बसा था। उपर से तो बहुत छोटा सा नजर आ रहा था।

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थोड़ी ही देर में हेलीकोप्टरों के पंखों की आवाज आने लगी तो जान में जान आई। शीघ्र ही आकाश में उड़ते हेलीकोप्टर नजर आने लगे। एक एक करके ये उतरते रहे और इनसे यात्री बाहर निकलते रहे। जब सब हेलीकोप्टर खाली हो गये तो हमें बैठने को कहा गया। वापसी की यात्रा बहुत छोटी रही। आते वक्त तो समूचे ग्लेशियर व पहाड़ों का दर्शन करवाते लाया गया था। जाते वक्त हमें सीधे एयरपोर्ट पर ले जाया गया। इस बार हमें जूनू के दर्शन करने को मिले। पूरा शहर तट पर ही बसा था। उपर से तो बहुत छोटा सा नजर आ रहा था।
एयरपोर्ट पर पहुँच कर जूते, लाईफ बेल्ट वगैरा उतार कर वापस सौंपे। राजा ने भी अपना जेकेट उतार कर पुराना वाला पहन लिया। हम जो सामान ले कर आये थे वह एक लोकर रूम में रखवा दिया था। इसी में राजा का जेकेट भी रख दिया था। यह सब लेकर हम उसी वाहन में चढ़ गये जो हमें लेकर आया था।
एक ग्लेशियर देखने में ही हमारा दिन पूरा हो गया था। वैसे जूनू में देखने की ढेर सारी चीजें हैं। इनमें कुत्तों से खींची जाने वाली स्लेड गाड़ी प्रमुख है, इसका टिकट 500 डालर प्रति व्यक्ति होता है जो हमारे बूते की बात नहीं थी, मगर कई पर्यटक इसका आनन्द लेने इतना खर्च उठाते ही हैं। टिकिट का खर्चा एक बार हम भले तो भी इसकी सवारी बहुत खतरनाक होती है, मेरे जैसे बूढ़े को तो इसमें बैठने की अनुमति भी नहीं देते। ग्लेशियर पर 10 मिनट तो रुकना गया, इतनी देर वहां कैसे रुकते।
भेडियों जैसे दिखने वाले हस्की कुत्तों से चलने वाली स्लेड गाड़ियां आर्कटिक जैसे बर्फीले प्रदेशों में परिवहन का साधन रही हैं। चाहे उत्तरी ध्रुव की खोज हो या दक्षिणी ध्रुव की, इनमें स्लेड गाड़ियों का जम कर उपयोग हुआ था। सदी के प्रारम्भ में जब अलास्का में सोने की खोज की होड़ मची थी तब भी गाड़ियों ने अपनी उपयोगिता सिद्ध की थी।
आधुनिकता के प्रवेश के साथ परिवहन के क्षेत्र में इन स्लेड गाड़ियों की काने ही कम हो गई हो मगर अब इनका उपयोग पर्यटन हेतु जमकर होने है। चाहे अलास्का हो, कनाडा हो या ग्रीनलेण्ड। यहां के बफीले क्षेत्रों का तब तक पूर्ण नहीं होता जब तक स्लेड गाड़ी का आनन्द नहीं उठा लिया जाय। अलास्का में तो आजकल स्लेड रेसिंग का विश्व कप आयोजित होने लगा है। दुनिया भर से लोग अपनी अपनी स्लेड गाड़ी व अपने अपने कुत्ते लेकर आते हैं और इस रेस में भाग लेते हैं। रेस बहुत खतरनाक होती है, इस दौरान कई कुत्ते मर जाते है तो कई बार प्रतिस्पर्धियों ने भी अपनी जान गंवाई है। रेस का टी.वी. पर सीधा प्रसारण होता है जिसे लोग दिलचस्पी से देखते हैं।
बीसवीं सदी के प्रारम्भ तक ये भेडिये कुत्ते डाक पहुँचाने के काम में आते थे। 1920 में जाकर हवाई जहाज से डाक भेजे जाने लगी। इससे पूर्व जब नावें, घोड़े, ट्रेन सब बन्द हो जाते थे तो 8-10 कुत्तों की यह गाड़ी ही इस काम को अंजाम देती थी। एक औसत स्लेड कुत्ते का वजन 25 किलो होता है मगर कई कई कुत्ते 30 किलो के उपर के भी होते हैं। ये 45 कि.मी. प्रति घंटे की गति तक स्लेड गाड़ी को खींच सकते हैं। भयंकर ठंड बर्दाश्त करने के लिये इनके शरीर पर बालों के फर की दोहरी परत होती है जिससे वे हिमपात को शरीर से दूर रख पाते हैं।
स्लेडिंग की सवारी के लिये भी पर्यटकों को हेलीकोप्टरों द्वारा ही स्लेड केम्प पर ले जाया जाता है। स्लेड चूंकि भारी बर्फ में ही चलती है इसलिये ये केम्प बहुत ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियरों के समतल मैदान में अवस्थित होते हैं। यहां तक पहुँचने के लिये हेलीकोप्टर 35 मिनट लेते हैं। तापमान शून्य से बहुत कम होता है। इसलिये भारी भरकम गर्म वस्त्रों से शरीर को डाटे रखना जरूरी है।
हेलीकोप्टर जब आकाश में होता है तभी चारों तरफ ग्लेशियर ही ग्लेशियर नजर आते हैं जिससे पर्यटकों का आनन्द दुगुना हो जाता है। उपर से ही स्लेड शिविर की गतिविधियां नजर आने लगती है। पर्यटकों के अलावा ढेर सारे कुत्ते दौड़ती हुई स्लेड गाड़ियां व तम्बू दिखाई देते हैं।
हम लोग जिस ग्लेशियर को देखने गये थे वहां तो छोटा सा समतल क्षेत्र था मगर यहां बहुत लम्बा चौड़ा समतल क्षेत्र होता है। एक तरफ तम्बू लगे दिखाई देते हैं. जिनमें ढेर सारे कुत्तों के दड़बे होते हैं। जिन कुत्तों को सवारी के काम में लेना होता है। उनकी मालिश की जा रही होती है, इन्हें खिलाया पिलाया जा रहा होता है। ये कुत्ते इतने जबरे होते हैं कि कोई कुत्ता भौंकने लगे तो पर्यटक की जान निकल जाये। जीभ निकाल कर अपने पैने दांत दिखाते हुए, आग्नेय नेत्रों से जब ये भौंकता है तो एकदम दरिन्दे सा लगता है। यहां के गाईड पहले ही बता देते हैं कि कुत्तों से डरने की जरूरत नहीं, भोंकना उनका स्वभाव है।
स्लेड गाड़ी की सवारी करते हुए कोई पर्यटक अगर खुद कुत्तों की सम खींचना चाहे तो गाईड उसे प्रशिक्षण देते हैं कि यह किस तरह करना चाहिये। कई पर्यटकों को रास खींचने में मजा आता है। मुझे याद है जब मैं छोटा था और परिवार के साथ बाहर घूमने जाता था तब तांगों में सवारी करते थे। तांगे वाला कई बार घोड़ों की रास हमें पकड़ा देता था तो मजा आता था। घोड़े तो अपनी गति से चलत रहते मगर हमें यह अहसास होता कि हम ही चला रहे। बाद में डींग भी हांकते कि हमने वहां तांगा चलाया।
कुत्ता गाड़ी में कम से कम 6 कुत्ते होते हैं। कई गाड़ियों में 8 भी होते हैं। जिसे गाड़ी चलाने का शौक हो उसे खड़ा रहना पड़ता है वरना गाईड ही रास संभालता है और पर्यटक एक छोटी सी बेन्च पर बैठ जाते हैं। गाड़ी लगभग 4 कि.मी. का चक्कर लगा कर वापस वहीं आ जाती है जहां से शुरू होती है। गाड़ी की गति ज्यादा तेज नहीं रखी जाती वैसे पर्यटक चाहे तो इसकी गति कम भी रखी जाती है ताकि वह आसानी से सवारी कर सके। गाड़ी में बैठने वालों को चारों तरफ बर्फ ही बर्फ नजर आता है। चक्कर लगाकर गाड़ी वापस आधार शिविर आ जाती है और इसमें प्रतीक्षारत पर्यटक बैठ जाते हैं। एसी एक साथ कई गाड़ियां चलती रहती हैं। पर्यटकों को वापस हेलीकोप्टर में बिठाकर नीचे एयरपोर्ट पर छोड़ दिया जाता है।
जिस तरह हमने मेन्डेनहाल ग्लेशियर का टूर लिया था उसी तरह हमारे साथी रेवनकर दम्पत्ति ने सी प्लेन का टूर लिया था। ये एक छोटे से समुद्री विमान मैं उड़े थे। सी प्लेन का रनवे पानी होता है। बहुत साल पहले, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अपनी राजसमन्द झील को भी इसी तरह के रनवे के लिये प्रयुक्त किया जाता था। हवाई पट्टियां होती नहीं थी, इस कारण झीलों, नदियों की सतह को ही नये के काम में लिया जाता था।
लोग यहां की प्रसिद्ध टाकू नदी से विमान में बैठे और विमान के पानी पर दौड़ते हुए हवा में उपर उठने का रोमांच अनुभव किया। विमान इन्हें 5 विभिन्न ग्लेशियरों के उपर से उड़ान भरते हुए ले गया। विमान से इन ग्लेशियरों की गहरी नीली खाईयां देख कर अभूतपूर्व आनन्द की अनुभूति हुई। हिमाच्छादित पहाड़ों के उसे गुजर हुए यहां के प्रसिद्ध टोंगास राष्ट्रीय वन क्षेत्र के उपर से भी यह उड़े। इसके टूर की सफलता की उस वक्त सीमा नहीं रही जब इन्हें वन में विचरते भालू नजर आ गये। अलास्का में भालू बहुतायत से पाये जाते हैं। हर पर्यटक की अभिलाषा रहती है कि भालू देखने को मिल जाये। बचपन में तो हमें शहर में ही भालू खेल देखने को मिल जाता था, गुलाब बाग में भी बहुत भालू थे इसलिये भालू कोई अजूबा नहीं था मगर यहां भालू देखने की एसी दीवानगी देखकर अचरज होता था। जंगल में उपर से भालू देखकर ही इनकी प्रसन्नता का पारावार नहीं था।

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